दिल्ली के प्रशांत विहार में रहने वाले 30 वर्षीय रोहन सड़क पर कुत्तों को देखकर रास्ता बदल लेते हैं। सब रोहन को डरपोक कहते हैं। रोहन डरते हैं कि कुत्ते के काटने से उन्हें रैबीज जैसी खतरनाक बीमारी हो सकती है और इससे उनकी मौत भी हो सकती है।
रोहन की तरह ज्यादातर लोग जिंदगी में किसी न किसी चीज से जरूर डरते हैं। सवाल यह है कि क्या यह डर सही है या सिर्फ हमारे दिमाग की उपज?
फोबिया यानी डर, हर व्यक्ति में पायी जाने वाली एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसके पीछे के कारणों की बात करें तो मन-मस्तिष्क में उठने वाले रहस्यमय भाव-संवेग को इसके लिए जिम्मेदार माना जा सकता है। कई बार तो डर इतना ज्यादा होता है कि व्यक्ति की मानसिक सूझबूझ और विवेक पर भी ताला लग जाता है।
ऊंचाई से नीचे देखने पर, अपरिचितों से रू-ब-रू होने पर, अंधेरे में या जंगल में सांप या खतरनाक जानवर देखने पर डरना आम बात है। हर व्यक्ति का फोबिया और उसकी परिस्थितियां अलग-अलग होती हैं।
हवाई सफर के दौरान कुछ लोगों को लगता है कि प्लेन क्रैश होने से उनकी मौत हो जाएगी, तो कुछ लोग इंजेक्शन के डर से इलाज ही नहीं कराते। ऊंची बिल्डिंग की छत पर जाने पर ऐसे लोगों को लगता है कि बिल्डिंग गिर जाएगी या फिर वो बिल्डिंग से गिर जाएंगे।
इंटरव्यू या पब्लिक मीटिंग में बोलने से पहले का डर भला कौन अनजान होगा। मगर समस्या उस समय होती है, जब मन किसी मामूली चीज या हालात से अनायास ही भय खाने लगता है।
हर रोज का यह डर हमारे व्यक्तित्व को खोखला बनाकर रख देता है। हालात ऐसे हो जाते हैं कि हम दूसरे लोगों का सामना करने और बातचीत करने में भी कतराने लगते हैं। चिंता और तनाव से प्रेरित होने वाला यह मनोविकार ही फोबिक डिसऑर्डर कहलाता है।
इसमें किसी खास चीज, स्थिति या गतिविधि के प्रति मन में आशंका बैठ जाती है। उस चीज का सामना होते ही तन और मन बेचैनी से घिर जाता है। दिल जोरों से धड़कने लगता है, सांस फूलने लगती है, हाथ-पैर कांपने लगते हैं और लगता है प्राण निकल जाएंगे।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ की एक रिपोर्ट के अनुसार सार्वजनिक स्थानों पर भी लोग डर के साये में रहते हैं। मसलन स्पोर्ट्स इवेंट, पुल, पब्लिक ट्रांसपोर्ट, ड्राइविंग या शॉपिंग करते हुए भी लोगो के मन में डर बना रहता है।
कभी सोचा है कि डर का यह भंडार आखिर हमारे भीतर कहां से आया है? मेडिकल साइंस से जुडे़ ब्रिटिश वैज्ञानिकों के अनुसार कुछ खास ब्रेन सेल्स मनुष्य को मानसिक रूप से कमजोर बनाते हैं। यही कमजोरी फोबिया का रूप लेती है, जिसे हम डर कहते हैं। मनोवैज्ञानिकों की मानें तो डर का सीधा संबंध हमारे आत्मविश्वास से जुड़ा होता है।
डर या फोबिया से बचने के लिए मेडिकल साइंस में ′कॉग्निटिव-बिहेवियरल थैरेपी′ को सबसे कारगर तरीका माना जाता है। इस थैरेपी के तहत व्यक्ति को कल्पना में अपने डर के करीब जाने को कहा जाता है। जैसे किसी को अगर कुत्ते के काटने से डर लगता है, तो उसे बताया जाता है कि कुत्ता इंसाना का सबसे अच्छा दोस्त है। मेडिटेशन, सांसों पर नियंत्रण और बेहतर नींद काफी हद तक डर से आपको दूर रख सकती है।
जो डर गया, समझो मर गया! यह सिर्फ फिल्मी डायलॉग नहीं है, बल्कि जिंदगी की हकीकत भी है। सवाल ये है कि डर क्या हमारे दिमाग की उपज है या फिर इसके पीछे सचमुच कोई रहस्य छिपा है।