भागदौड़ भरी लाइफ और आगे निकलने की होड़ में मानसिक तनाव होना आज एक आम समस्या बन चुकी है। इस मानसिक तनाव को हम डिप्रेशन के तौर पर भी देखते हैं, लेकिन कई मामलों में हम वास्तव में यह जान ही नहीं पाते कि यह मानसिक तनाव है या कुछ और।
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देखने में यह डिप्रेशन जैसी बीमारी ही लगती है, लेकिन डिप्रेशन से कुछ ज्यादा ही होती है। इस बीमारी में व्यक्ति खुश है या दुखी है पता करना मुश्किल ही होता है।
मेरठ मेडिकल कॉलेज में न्यूरो साइकेट्रिस्ट डॉ. सुबोध सोम कहते हैं, ''यह एक सामान्य मानसिक रोग है जिसका उपचार संभव है। दवाओं के द्वारा मानसिक रोग के एपिसोड को 1 से 2 हफ्तों में खत्म किया जा सकता है। मूड स्टेबलाइजर और एंटी डिप्रेसेन्ट दवाओं से उपचार किया जाता है। एक एपिसोड का पूर्ण उपचार होने के बाद भी कुछ समय तक दवा लेना आवश्यक है। शरीर के बाकी अंगों की तरह ही दिमाग भी बीमार हो जाता है, इसलिए मानसिक रोगी को समाज में हीन भावना से न देखकर उसे सहयोग करना चाहिए।''
क्या है बायपोलर डिस्ऑर्डर
बायपोलर डिस्ऑर्डर एक मानसिक बीमारी है। इस बीमारी में मरीज के मस्तिष्क का नियंत्रण बिगड़ जाता है। जब व्यक्ति ज्यादा खुश रहता है तो उसे 'मेनिया' कहते हैं।
'मेनिया' में मरीज का मन अधिक प्रसन्न होने के कारण वह खुद को बढ़ा-चढ़ाकर देखता है। अधिक सजना-संवरना, नई-नई चीजें खरीदना, नए काम शुरू कर देना, खुद को शक्तिशाली या अधिक धनी मानने लगना। जब मरीज को ऐसा करने से रोका जाता है तो वह अत्याधिक गुस्सा या मारपीट भी करने लगता है।
'मेनिया' के कारण मरीज में रिस्क बिहेवियर बढ़ जाता है जिससे रोगी अधिक नशा करना, जोखिमपूर्ण कामों को करने लगता है। नींद कम हो जाती है भूख अधिक लगती है और ज्यादा ताकत का एहसास इस स्थिति में होता है।
कुछ मामलों में मरीज ज्यादा पूजा पाठ भी करने लगता है और खुद को भगवान का अवतार भी समझने लगता है। इस रोग में दूसरी अवस्था होती है डिप्रेशन। इसमें रोगी उदास रहता है कम बात करता है, खुद को दोषी महसूस करता है, आत्मविश्वास की कमी हो जाती है अकेला महसूस करने लगता है, कम बोलता है और मन में आत्महत्या जैसे विचार आने लगते हैं।
ये हैं कुछ अहम कारण
आनुवांशिक - यह बीमारी आनुवांशिक भी होती है। यदि परिवार का कोई सदस्य इस बीमारी से पीड़ित होता है तो उसके बच्चों को यह बीमारी होने की आशंका अधिक होती है।
दिमागी असंतुलन - इस बीमारी में दिमाग के अंदर न्यूरोट्रांसमीटर जैसे डोपीमीन, सेरोटोनिन, या नोर-एड्रेनलीन आदि दिमागी केमिकल असंतुलित हो जाते हैं। इससे मूड को नियंत्रित करने वाला सिस्टम गड़बड़ा जाता है और मनुष्य इस रोग का शिकार हो जाता है।
आसपास का माहौल - इस बीमारी का एक प्रमुख कारण व्यक्ति के आसपास के माहौल को भी माना जाता है। परिवार के किसी व्यक्ति की असमय मौत, माता-पिता में तलाक, कोई दर्दनाक हादसा, या कोई बुरी घ्ाटना या कुछ असामान्य घटित होना भी इसका एक कारण माना जाता है।
नशा - अत्याधिक नशा भी इस रोग का एक प्रमुख कारण होता है। कई मामलों में यह रोग स्वयं भी हो सकता है।
ये हैं लक्षण
मूड बदलना - अचानक खुश होना या एकदम उदास होना। कभी-कभी दोनों लक्षण एक साथ नजर आते हैं। इस स्थिति को मूड एपिसोड कहा जाता है। इसमें रोगी के चिड़चिड़ा होने, अधिक आक्रामक होने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।
नींद का असमान्य होना - इस रोग में रोगी नींद को बेकार की चीज समझने लगता है और हमेशा जागते रहने की कोशिश करता है।
निराशा - व्यक्ति निराशावादी हो जाता है और यह निराशा उस पर लगातार हावी होने लगती है और वह खुद को असहाय महसूस भी करता है।
व्यवहार में बदलाव - इस रोग के कारण रोगी के व्यवहार में अचानक बहुत ज्यादा उत्साह या निराशा देखी जाती है। रोगी खुद को उच्चतर मानने लगता है या शक्तिशाली समझता है। जोखिमपूर्ण कार्य या व्यवहार करता है या एकदम निराश होकर एकाकी हो जाता है।
रोग की अवधि
यह एक ऐपिसोडिक रोग है। यह ऐपिसोड में आता है। एक मरीज में एक या अधिक ऐपिसोड हो सकते है। एक ऐपिसोड एक माह से नौ माह तक का हो सकता है। इस रोग में एक औसतन मरीज में तीन से छह तक एपिसोड होते हैं। इस दौरान मरीज कभी मानसिक रोगी हो जाता है और कभी ठीक हो जाता है।