मुजफ्फरनगर और शामली की सांप्रदायिक हिंसा ने युवाओं के भविष्य को अंधकार की और धकेल दिया है। नौकरी के लिए दौड़ लगा रहे युवाओं की प्रैक्टिस पर ब्रेक लग गया है।
दंगे के खौफ का असर आसपास के जिलों में भी देखा जा रहा है। मेरठ की बात करें तो यहां के युवा भी सुबह सवेरे और शाम को दौड़ लगाने से डर रहे हैं।
मुजफ्फरनगर, शामली और बागपत जिला पुलिस भर्ती में अग्रणी माने जाते हैं। पुलिस और आर्मी की भर्ती के लिए यहां के युवा फिजिकल टेस्ट पास करने के लिए सुबह-शाम सड़कों पर दौड़कर पसीना बहाते हैं।
27 अगस्त को छेड़छाड़ की घटना के बाद छिड़ी जंग ने सात सितंबर को इस कदर विकराल रूप धारण कर लिया कि दोनों जिले सांप्रदायिक आग में बुरी तरह झुलस गए।
दंगे में नामजदगी का डर
हालात सामान्य होने के बाद अब दंगे में नामजदगी का खेल शुरू हो गया है। बड़ी संख्या में युवाओं की नामजदगी से चारों तरफ कोहराम मचा है। कुछ दिन बाद ही सूबे में पुलिस की भर्ती होनी है।
भर्ती के लिए हजारों युवा सुबह शाम दौड़ लगा रहे थे, लेकिन नामजदगी के चलते कुछ तो भर्ती से ही वंचित हो गए हैं और जो बचे हैं वे खौफ और डर के कारण प्रैक्टिस नहीं कर पा रहे हैं।
मेरठ में भी पड़ रहा असर
दंगे का असर मेरठ जनपद में भी पड़ा है। यहां भी प्रैक्टिस कर रहे युवाओं में डर और खौफ है।
पुलिस भर्ती की तैयारी में जुटे पाथौली गांव के युवकों ने बताया कि वे पुलिस और आर्मी की भर्ती के लिए सुबह चार बजे दौड़ने जाते थे।
जब से मुजफ्फरनगर और शामली में दंगा हुआ है उनके घर वाले भी डर गए हैं। कई दिन से प्रैक्टिस बंद है। शाम को कुछ देर के लिए गांव के नजदीक ही दौड़ लगाकर काम चला रहे हैं।