बीते दो दिनों के दौरान हुई अलग-अलग इलाकों में हुई बारिश की वजह से दिल्ली-एनसीआर में बृहस्पतिवार सुबह बेशक साफ-सुथरी और धूल रहित महसूस हुई हो। लेकिन हकीकत यही है कि राजधानी और उसके आसपास के इलाकों में प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि अगर हालात में सुधार नहीं हुए तो यहां की आबोहवा में बारिश से खुद को साफ करने की खूबी भी नहीं बचेगी। सबसे बदतर हालात निलंबित कणों (पीएम) के हैं। पिछले दस सालों की जिसका स्तर कमोवेश बढ़ता जा रहा है।
विशेषज्ञ की मानें तो इसकी बड़ी वजह सड़कों पर लगातार बढ़ता वाहनों का दबाव है। खास तौर से डीजल वाहन, जिनसे आबोहवा में निलंबित कण (पीएम-10 व 2.5) की मात्रा तेजी से बढ़ रही है।
मसलन, दिल्ली-एनसीआर में साल 2001 में पीएम-10 का वार्षिक औसत जहां 140 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था। वहीं वर्ष 2012 में यह 300 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गया। जबकि इसका मानक औसत महज 60 माइक्रोग्राम/ प्रति घन मीटर है। इसी तरह पीएम-2.5 की मात्रा भी तेजी भी बढ़ी है।
हालत बेहद खबराब
टेरी के वरिष्ठ वैज्ञानिक सुमित शर्मा बताते हैं कि हालात गंभीर हैं। लेकिन अभी भी रास्ते बंद नहीं हुए हैं। दुनिया के कई शहर इस समस्या से निकल चुके हैं। 1960 के दशक में कैलिफोर्निया की आबोहवा विश्व में सबसे खराब थी।
लेकिन बीते पांच दशकों में इस शहर के प्रदूषण स्तर में 90 फीसदी तक कमी लाई गई है। यह इसके बावजूद हुआ कि इस बीच वहां वाहनों की संख्या में 175 फीसदी और डीजल की खपत 225 फीसदी बढ़ी है। साफ है कि पर्यावरण प्रदूषण से बचने के लिए वैश्विक स्तर पर तकनीक मौजूद है। सरकार को इस दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
लगातार बढ़ रहा प्रदूषित शहरों का स्तर
वर्ष 2009 में जहां देश के 102 शहरों में पीएम और नाइट्रोजन आक्साइड की मात्रा मानक से ज्यादा थी। वहीं, 2012 तक ऐसे शहरों की संख्या 137 हो गई। इसी तरह वर्ष 2009 में 10 शहरों आबोहवा बेहद खराब थी, जबकि साल 2012 में इस श्रेणी के शहरों की संख्या 13 हो गई।
जहर का यूं बढ़ता ग्राफ
लगातार बढ़ रहा प्रदूषित शहरों का स्तर
वर्ष 2009 में जहां देश के 102 शहरों में पीएम और नाइट्रोजन आक्साइड की मात्रा मानक से ज्यादा थी। वहीं, 2012 तक ऐसे शहरों की संख्या 137 हो गई। इसी तरह वर्ष 2009 में 10 शहरों आबोहवा बेहद खराब थी, जबकि साल 2012 में इस श्रेणी के शहरों की संख्या 13 हो गई।
पीएम-10 का वार्षिक औसत
वर्ष पीएम-10
2001 140
2002 190
2003 160
2004 150
2005 160
2006 170
2007 150
2008 190
2009 250
2010 250
2011 280
2012 300
मानक-60 माइक्रोग्राम/घन मीटर
पीएम-2.5 का मासिक औसत
साल नवंबर दिसंबर जनवरी
2010-11 226.72(2010) 218.01(2010) 167.58(2011)
2011-12 224.14(2011) 230.77(2011) 162.25(2012)
2012-13 277.16(2012) 171.43(2012) 178.91(2013)
2013-14 187.39(2013) 163.76(2013) 183.29(2014)
मानक-40 माइक्रोग्राम/घन मीटर
एनसीआर में बृहस्पतिवार दोपहर बाद पीएम का स्तर
स्थान पीएम-2.5 पीएम-10
गुड़गांव 102 115
नोएडा 134 185
पूसा (दिल्ली) 166 156
स्रोत: सीपीसीबी, सफर, डीपीसीसी। पीएम की इकाई माइक्रोग्राम/घन मीटर है।
दिल्ली में खतरे की घंटी
गर्मी ने दिल्ली-एनसीआर में सांस और अस्थमा रोगियों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। बीते एक महीने में चढ़ते पारे ने दिल्ली की आबोहवा में ओजोन की मात्रा बढ़ा दी है। कई इलाकों में यह मानक से दो गुना तक ज्यादा है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने दिल्ली पॉल्युशन कंट्रोल कमेटी (डीपीसीसी) के ऑनलाइन मॉनीटरिंग स्टेशन से ओजोन की मात्रा का अध्ययन किया है। इसकी तस्वीर बेहद डरावनी है।
रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के आवासीय इलाके सिविल लाइंस में ओजोन का स्तर मानक से दो गुना ज्यादा है। एक महीने में इसकी मात्रा सबसे ज्यादा 250 माइक्रोग्राम/घनमीटर तक रही। यह मानक से 2.5 गुना ज्यादा है। आरकेपुरम, पंजाबी और मंदिर मार्ग की हालत भी जुदा नहीं है। चारों मॉनिटरिंग स्टेशनों पर ओजोन का स्तर तेजी से बढ़ा है।
सीएसई की कार्यकारी निदेशक अनुमिता राय चौधरी के मुताबिक, दिल्ली के लिए यह चेतावनी है। हालात इससे भी बदतर होते, अगर मार्च-मई में बीच-बीच में बारिश न होती। इसकी बड़ी वजह वाहनों से होने वाला प्रदूषण है। खास तौर से डीजल से चलने वाले वाहनों से, पेट्रोल के वाहन की तुलना में जिनसे तीन गुना ज्यादा नॉक्स निकलता है।
बेहद खतरनाक यह
कैसे बनती है ओजोन
ओजोन कहीं से खुद नहीं निकलती। नाइट्रोजन
के ऑक्साइड, सल्फर डाई आक्साइड और हाइड्रो कार्बन उच्च तापमान में क्रिया
करके ओजोन बनाते हैं। तापमान ज्यादा होने से ओजोन की मात्रा तेजी से बढ़ती
है। वहीं, सर्दियों में इसका स्तर नियंत्रित रहता है।
खतरनाक
ओजोनयुक्त वातावरण में कुछ घंटों के भीतर ही खराब होती है सेहत।श्वसन और अस्थमा के मरीजों को बड़ी दिक्कत।फेफेड़ों पर पड़ता है असर, ऊतक क्षतिग्रस्त होते हैं।सीने में दर्द, कफ की समस्या और सिरदर्द की परेशानी।ब्रोंकाइटिस और एम्फजीम के रोगियों की भी बढ़ी समस्या।ओजोन के ऑक्सीकारक होने से कोशिकाओं को भी नुकसान।ये एहतियात जरूरी
डीजल से चलने वाले वाहनों पर रोक।
वाहनों की संख्या में कमी लाने के लिए बड़े स्तर पर योजना।
ऐसे इलाकों में जहां के वातावरण में ओजोन बहुत ज्यादा है, वहां डीजल और पेट्रोल की जगह ग्रीन फ्यूल वाले वाहनों के चलने की हो इजाजत
हेल्थ बुलेटिन जारी हो, खास तौर से वहां के लिए जहां सांद्रण बहुत ज्यादा है।
घर के अंदर कमजोर पड़ रही आपके बच्चों की सांसे
घर से बाहर निकलते ही धूल-कण और प्रदूषित वायु का सामना होता है लेकिन घर के अंदर फैले प्रदूषण पर किसी की नजर नहीं जाती। वल्लभ भाई पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट की ओर से कराए गए सर्वे में सामने आया है कि दिल्ली के 80 से 90 फीसदी बच्चों को इंडोर पॉल्यूशन के बारे में जानकारी ही नहीं है। जबकि इसी वजह से बच्चों के फेफड़े पर असर पड़ रहा है और उनकी सांसें कमजोर हो रही हैं।
इंस्टीट्यूट के नेशनल सेंटर ऑफ रेसपेरेट्री के प्रमुख डॉ. राज कुमार ने बताया कि इंडोर एयर पॉल्यूशन से बच्चों की सेहत पर सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि दिल्ली को नौ जोन बांट कर करीब 4000 बच्चों से बातचीत करने के बाद एक रिपोर्ट तैयार की गई है। सर्वे को तीन श्रेणियों अपर, मिडिल और लोअर क्लास में बांटा गया था। पूछताछ में पता लगा कि 80 से 90 फीसदी लोगों को इंडोर पॉल्यूशन की जानकारी ही नहीं थी।
डॉ. राज कुमार ने बताया कि फ्रिज, एयरकंडीशनर, डियोड्रेंट, कीड़े मारने वाली लिक्विड, गीजर से निकलने वाली गैस, लकड़ी और स्टोव पर खाना बनाने की वजह से निकलने वाली गैस, हीटर चलाने अथवा दूसरे घरेलू उपकरणों के इस्तेमाल से इंडोर पॉल्यूशन काफी बढ़ा है। उन्होंने ने बताया कि निलंबित कण (पीएम)2.5 और 1 की वजह से न सिर्फ फेफड़ों पर असर पड़ रहा है बल्कि शरीर के दूसरे अंगों पर भी इसका असर पड़ रहा है। निलंबित कण 10 भले ही नाक तक ही रह जाती है। दिल्ली में पीएम-2.5 और एक का स्तर काफी बढ़ा हुआ है। इसकी वजह से फेफड़े का कैंसर, अस्थमा, एलर्जी, सांस संबंधी दूसरी बीमारियां हो रही हैं।
दिल्ली में पांच से दो को सांस संबंधी समस्या
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ट्यूबरक्लोसिस एंड रेसपेरेट्री डिजीज के डॉ. सुभाष मुंजाल ने बताया कि डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में हर पांच में दो लोग किसी न किसी तरह की सांस संबंधी बीमारी से पीड़ित हैं। उन्होंने कहा कि वायु प्रदूषण देश में होने वाली मौत का छठवां सबसे बड़ा कारण है।