मोहनदास करमचंद गांधी आज भी आधुनिक दुनिया में भारत का सबसे बड़ा बौद्धिक निर्यात हैं। गौतम बुद्ध के बाद शायद सबसे बड़ा नाम, लेकिन भारत में उन पर सवाल उठाने वालों की कमी नहीं।
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नाथूराम गोडसे का नाम भारत के इतिहास में जिस तेज़ी से आता है, वैसे ही चला भी जाता है। छाया से निकलकर छाया में ग़ायब। बीच में तीन गोलियाँ चलने की आवाज़...फिर पिस्तौल, फिर हाथ और फिर एक चेहरा। जैसा रिचर्ड एटनबरो की फ़िल्म में दिखाया गया।
नाथूराम गोडसे का नाम फिर छाया से निकला है और सुर्ख़ियाँ बनाने लगा है। कोई गोडसे को राष्ट्रभक्त बता रहा है, कोई चौराहे पर मूर्ति लगाने की मुहिम छेड़ता है, कोई नौजवानों की मोटर साइकिल रैली निकालने की पेशकश कर रहा है।
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मोदी की चुप्पी
कोई गांधी की हत्या को एक बड़े वैचारिक कृत्य की तरह देख रहा है, कोई गोडसे को शहीद का दर्जा देने का नारा उछाल रहा है। तर्क और विवेचना से ज़्यादा शोर की तरह। यह एक दिलचस्प नज़ारा है कि प्रधानमंत्री मोदी विदेशों में और लाल क़िले से भी महात्मा गांधी का बखान करते नहीं थकते।
साथ ही उन लोगों पर सख़्ती बरतते भी नहीं दिखते जो उसी गांधी की हत्या करने वाले के गुण गा रहे हैं। महात्मा गांधी के विचारों को कमतर आँकने और उनकी नीयत पर संदेह करने की कोशिशें इस देश में पहले भी होती रही हैं।
विचारों को काटने के लिए तर्क की ज़रूरत पड़ती है और जब ऐसा नहीं हो पाता, तो हमला विचार पर नहीं, व्यक्ति पर होता है। वरना क्या ज़रूरत थी एक बूढ़े कृशकाय अहिंसक और शांतिप्रिय व्यक्ति को गोली मारने की।
त्रासदी
महात्मा गांधी कांग्रेस के अन्य नेताओं के साथ। उस गांधी को जिसे ख़ुद उनकी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में अनेक बार हाशिये की तरफ़ खिसकते हुए देखा गया।
क्या एक अहिंसक व्यक्ति की त्रासदी यही होती है कि उसके साथ हर तरह की हिंसा की छूट सबके पास होती है और उसके पक्ष में कोई भी खड़ा होता दिखलाई नहीं देता, न देश, न सरकार, न राजनेता?
क्या अहिंसा और शांतिप्रियता की अपनी विडंबना ये है कि दूसरों का बचाव तो कर सकती है, पर ख़ुद अपना नहीं। आम चुनावों के बाद इस तरह की बातें फिर उठी हैं।
सोशल मीडिया में गोडसे को खास तौर पर एक महानायक, एक शहीद और भारत माता के सच्चे सपूत की तरह पेश किया जाता है। उन मजबूरियों का हवाला भी दिया जाता है जिनके तहत गांधी को मारे बिना देश को बचा पाना मुश्किल था।
विनायक दामोदर सावरकर(बीच में माला पहने हुए) और उनके दाएं तरफ़ नाथूराम गोडसे। उस कथानक में गांधी कुछ रहस्यमय कारणों से भारत के हितों को ताक पर रखने वाले खलनायक हैं और गोडसे भारत के तारणहार। मंशा पिस्तौल का घोड़ा दबाने वाले का महिमामंडन है या फिर गांधी को नीचा दिखाने की कोशिश, समझना मुश्किल नहीं है।
शायद समझना ज़रूरी ये है कि ऐसा क्या है गोडसे में और क्यों एक नया राष्ट्रनायक बनाने की कोशिश हो रही है। ख़ास तौर पर तब जब गांधी के दक्षिण अफ़्रीका से लौटने के सौ साल पूरे हुए हैं और भारत का लोकतंत्र एक नया अध्याय लिखने की शुरुआत कर चुका है।
क्या ये सब इसलिए हो रहा है कि पिछले आम चुनाव के नतीजों को हिंदू जनमत की अभिव्यक्ति के तौर पर देखा जा रहा है, जिसके बूते भारतीय जनता पार्टी स्पष्ट बहुमत पा सकी।
खलनायक से महानायक कई लोग इसे भारत विभाजन की प्रक्रिया का अंतिम हिस्सा भी कह रहे हैं (पाकिस्तान मुसलमानों के लिए, भारत हिंदुओं के लिए)। क्या गोडसे को खलनायक से महानायक बनाने की कोशिश के पीछे उस विचारधारा को सर्वोपरि साबित करने की मंशा है जिसने गोडसे को पिस्तौल की लिबलिबी दबाने के लिए उकसाया और नैतिक आधार दिया।
क्या ऐसा इसलिए हो रहा है कि कभी गांधी की पार्टी रही कांग्रेस का जनाधार अपने न्यूनतम स्तर पर है? गोडसे को छाया से निकालकर एक गहरी पड़ताल करने की कोशिश बीबीसी ने की है। गांधी की जिंदगी जितनी खुली किताब थी, गोडसे की जिंदगी न तो साफ़ है, न पारदर्शी। गोडसे को लेकर जो सवाल हैं, उनकी जाँच भी है, विश्लेषण भी और रिपोर्ताज भी। रेडियो और वेबसाइट दोनों पर। गांधी की हत्या के 67 साल बाद इस बार फ़ोकस नाथूराम गोडसे पर।