अरविंद केजरीवाल को क्या हुआ है कि एकाएक उनकी लोकप्रियता का ग्राफ गिरता ही जा रहा है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के समय केजरीवाल ने जितनी तेजी से लोकप्रियता हासिल की थी अब उतनी ही तेजी से उनकी लोकप्रियता और समर्थक घट रहे हैं।
केजरीवाल को समझना होगा कि ऐसे वादे नहीं करने चाहिए, जिनका पालन वो खुद न कर पाएं। राजनीति में आने पर वीआईपी कल्चर खत्म करने का वादा करने वाले केजरीवाल खुद उसका पालन नहीं कर पाए। उनके मंत्रियों को गाड़ियां मिल गई और खुद उन्होंने बड़े बंगले की सिफारिश कर डाली।
मीडिया ऐसी चीजों को खंगालने में माहिर हो चुका है। यही नहीं केजरी जब गुजरात में नरेंद्र मोदी से मिलने से रोके गए तो उन्होंने कहा कि वो बतौर पूर्व मुख्यमंत्री मोदी से मिलने जा रहे थे। अब भला चुनावों के समय ऐसे खटराग और पदों की जरूरत क्या है।
जोश में खो देते हैं होश
विरोधी ही नहीं खुद केजरीवाल के नजदीकी भी कहते हैं कि केजरीवाल जोश में होश खो बैठते हैं। कई बार जोश में आकर केजरीवाल ऐसे फैसले ले बैठते हैं जिनसे खुद उनकी पार्टी भी इत्तेफाक नहीं रखती।
केजरीवाल के एनजीओ के सदस्य बताते हैं कि वो अक्सर जोश जोश में भूल जाते हैं कि उन्हें क्या कहना है और क्या नहीं। वो भूल जाते हैं कि राजनीति में कोई स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता।
याद होगा आपको दिल्ली चुनाव के से पहले केजरीवाल ने अपने बच्चों की कसम खाई कि भाजपा और कांग्रेस से समर्थन न लेंगे और न ही देंगे। लेकिन चुनाव बाद उन्होंने उसी कांग्रेस से समर्थन लिया।
मीडिया से नजदीकी भली ना...
मीडिया से संभलकर रहना केजरीवाल को नहीं आया। अन्ना के आंदोलन के समय मीडिया के हीरो बने केजरीवाल ये भूल बैठे कि मीडिया से दोस्ती और दुश्मनी कुछ भी सही नहीं।
पुण्य प्रसून वाजपेयी के साथ इंटरव्यू के बाद की गुफ्तगू यही खुलासा कर रही है कि केजरीवाल को बंद कमरे में भी सतर्कता बरतनी चाहिए।
पुराने दांव पेंच बेअसर
केजरीवाल राजनीति के नए खिलाड़ी हैं और इस लिहाज से उन्हें राजनीति के दांव पेंच की ज्यादा जानकारी नहीं है। इसके बावजूद वो चुनावी मौसम में राजनीति के सभी दांव आजमा रहे हैं।
अब केजरीवाल खिलाड़ी हैं लेकिन उनके दांव पुराने हैं। उनके हर दांव की काट किसी न किसी राजनीतिक दल के पास मौजूद है। जब तक वो दांव की राजनीति समझ पाते हैं, अगला नेता दांव खेल चुका होता है। यही सब कुछ लोकपाल बिल के समय विधानसभा में हुआ।
जनता भी केजरीवाल के रोज रोज के प्रपंच देखकर उकता गई है। पहले समर्थन देने और लेने से इनकार करना और फिर उसी दल से समर्थन लेना जिसका वो भरपूर विरोध कर रहे थे।
मोबाइल पर रायशुमारी करके सरकार बनाना, बिल को लेकर इस्तीफा, जंतर मंतर पर धरना मुख्यमंत्री को शोभा नहीं देता। खुद को साबित करने के लिए उन्हें मुख्यमंत्री पद पर बने रहकर वादे पूरे करने चाहिए थे न कि इस्तीफा देकर लोकसभा चुनाव की तैयारियां।
नहीं सुनते किसी की
केजरीवाल से जितने भी वफादार अलग हुए हैं सबकी शिकायत है कि केजरीवाल निरंकुश शासक की तरह पार्टी चलाते हैं। विनोद कुमार बिन्नी से लेकर हाल ही में पार्टी छोड़ने वाले अशोक अग्रवाल का भी यही आरोप है कि केजरीवाल भले ही जनता और समर्थकों की राय लेने का दंभ भरते हों लेकिन उन्हें करना वही है जो वो चाहते हैं।
टिकट बांटने का मसला हो या किसी के बारे में राय बनाने का मसला, केजरीवाल बंद कमरे में कुछ ही करीबियों से चर्चा करना पसंद करते हैं। ये रवैया राजनीति की बिसात में घातक साबित होता है और केजरीवाल के साथ ऐसा हो भी रहा है।