21 दिसंबर को खबर आई कि अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए दो ट्रक भर पत्थर पहुँचे हैं। राम जन्मभूमि न्यास प्रमुख महंत नृत्य गोपालदास ने कहा कि मोदी सरकार से उन्हें ‘सिग्नल’ मिला है कि ‘अब’ मंदिर बनेगा। भाजपा के कथित सांप्रदायिक एजेंडे के विरोध का झंडा उठाने का दावा करने वाली समाजवादी पार्टी से उम्मीद की गई होगी कि मुलायम, अखिलेश सहित अन्य नेता भाजपा-विहिप के खिलाफ गरजेंगे, शिलाओं को उतरने से रोकने पर कार्रवाई होगी, स्थानीय प्रशासन कोई कार्रवाई करेगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
खबर आई कि उत्तर प्रदेश सरकार ने गृह मंत्रालय से कहा कि वह स्थिति पर नजर रखे। क्या इतना भर करके पार्टी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ रही है? पार्टी प्रवक्ता गौरव भाटिया ने मुझे याद दिलाया कि पत्थर तराशने का काम बहुत पहले से चल रहा है और उन्होंने मुझे जानकारी के लिए जिला प्रशासन के पास जाने के लिए कहा। जिला मजिस्ट्रेट अनिल ढींगरा ने फोन नहीं उठाया। पार्टी नेता नरेश अग्रवाल ने कहा कि कोई व्यक्ति अपने घर या विवादित स्थल से 100 किलोमीटर दूर पत्थर तराशने लगे, उसे क्यों बिना बात महत्व दिया जाए।
सवाल यह कि क्या पार्टी सीधा जवाब देने से बच रही है? क्योंकि अगर ऐसा है, तो राज्य में इस आशंका को बल मिल रहा है कि सरकार भाजपा को लेकर बेहद नरम है और पार्टी 2017 चुनावों को ध्यान में रखकर हिंदुओं के प्रति उदार दिखना चाहती है। पार्टी के भीतर के लोगों और विश्लेषकों के अनुसार जिस तरह तरह भाजपा ने 2014 लोकसभा चुनाव में 80 में से 71 सीटों पर जीत दर्ज की, उससे सपा में चिंता है और पार्टी विकास के नारे के अलावा ‘मुल्ला मुलायम’ की छवि बदलना चाहती है।
मुसलमानों की मजबूरी
विश्लेषकों के अनुसार समाजवादी पार्टी जानती है कि मुसलमानों के पास उनके अलावा विकल्प नहीं है और इसका सुबूत यह कि 2013 मुजफ्फरनगर दंगों में अभियुक्तों के खिलाफ राज्य सरकार की कथित कमजोर कार्रवाई के बावजूद 2014 लोकसभा चुनाव में 58 प्रतिशत (स्रोत: सीएसडीएस) मुसलमानों ने सपा को वोट दिया। ऐसे में अगर सपा ‘साफ्ट हिंदुत्व’ अपना भी रही है, तो उसका नुकसान पार्टी को नहीं होगा?
सरकार द्वारा मानसरोवर यात्रियों को सब्सिडी देने की योजना और समाजवादी श्रवण यात्रा के तहत बुजुर्गों को हिंदू तीर्थस्थानों पर भेजने की सरकारी योजना को विश्लेषक उसी रणनीति के तहत देख रहे हैं। ये आरोप पुराने रहे हैं कि जब सरकारें मुसलमानों को हज के लिए सब्सिडी दे सकती हैं तो हिंदुओं को क्यों नहीं। पार्टी का कहना है कि लोगों की मांग के अनुसार प्रदेश सरकार निर्णय लेती है और इसमें सांप्रदायिक कुछ भी नहीं। वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी के मुताबिक समाजवादी पार्टी को लगता है कि उन्हें हिंदुओं के प्रति भी उदार होना चाहिए। वह कहते हैं, "कैलाश मानसरोवर यात्रा में प्रति यात्री 50 हजार सब्सिडी की घोषणा का प्रचार नहीं हुआ।
इसके अलावा यूपी के 60 पार बुजुर्गों को खासकर महिलाओं को उन्होंने तीर्थयात्रा पर निशुल्क भेजना शुरू किया। उन्हें कपड़े, बिस्तर, खाना, कंबल दिया जाता है। इससे पार्टी को लगता है कि उसकी मुस्लिम समर्थक पार्टी की छवि में परिवर्तन होगा।” लेकिन नरेश अग्रवाल 'सॉफ्ट हिंदुत्व' की बात नकारते हुए कहते हैं, "जब तक उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी है भाजपा मुसलमानों का कुछ नहीं कर सकती। जब-जब सवाल आया कि भाजपा को कौन रोकेगा, तब-तब समाजवादी पार्टी और मुलायम सिंह सबसे आगे खड़े दिखाई दिए हैं।"
दादरी घटना पर नहीं की ठोस कार्रवाई
मुजफ्फरनगर दंगे और दादरी में गोमांस पर हत्या जैसी घटनाओं पर प्रदेश सरकार की कथित कमजोर प्रतिक्रिया और संदिग्धों के खिलाफ मात्र बयानबाजी को विश्लेषक उसी चश्मे से देख रहे हैं। भाजपा के योगी आदित्यनाथ, संगीत सोम, साक्षी महाराज, महेश शर्मा आपत्तिजनक बयान देते हैं और प्रदेश सरकार मूकदर्शक बनकर या तो हल्के-फुल्के बयान देकर फर्ज अदायगी कर देती है। इस पर नरेश अग्रवाल का सीधा जवाब है, "हम किसी की हैसियत बढ़ाना नहीं चाहते। हम किसी को चर्चा का बिंदु नहीं बनाना चाहते।"
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर असमर बेग का मानना है कि भाजपा नेताओं के विवादास्पद बयानों से समाजवादी पार्टी को भी फायदा होता है। वे कहते हैं, "भाजपा नेताओं के बयानों से मुसलमान सपा के झंडे के नीचे इकट्ठे होते हैं। दोनों ही पार्टियों को इससे फायदा होता है। इसलिए सपा भाजपा को बर्दाश्त करती है। मुलायम सिंह यादव एक बार भी मुजफ्फरनगर नहीं गए, इसके बावजूद 58 प्रतिशत मुसलमानों ने सपा को 2014 चुनाव में वोट दिया, जो आज तक का सबसे ज्यादा वोट था।”
प्रोफेसर बेग के मुताबिक सपा ने अल्पसंख्यक हितों के लिए कुछ नहीं किया, इसके बावजूद मुसलमानों ने सपा को वोट दिया क्योंकि मुसलमानों को लगा कि सपा उनके लिए सबसे बेहतर है। वह कहते हैं, “बसपा पर मुसलमानों को भरोसा नहीं है। मुजफ्फरपुर दंगों के दौरान बीएसपी सीन से गायब थी। कांग्रेस यूपी में है नहीं, तो मुसलमानों के पास विकल्प क्या हैं? इसलिए मुसलमानों ने सपा को वोट दिया। दादरी मामले में भी मुसलमानों को लगता है कि दोषियों के खिलाफ आरोपों को हल्का करने की कोशिश हो रही है।”
ओवैसी की शिकायत
एक तरफ जहां बिहार में जीत और भाजपा की करारी हार के बाद लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार भाजपा-विरोध के मुखिया नजर आते हैं, महागठबंधन से आखिरी मौके पर अलग होने वाले मुलायम सिंह यादव कमजोर दिखते हैं। हैदराबाद के सांसद और एमआईएम प्रमुख असदउद्दीन ओवैसी को उत्तर प्रदेश में सभा करने की इजाजत न देने को विश्लेषक समाजवादी पार्टी की रणनीति का हिस्सा मानते हैं।
ओवैसी ने बीबीसी को बताया, “मुझे पहले अनुमति दी गई, फिर रद्द कर दी गई। कभी मुझसे कहा जाता है कि जगह छोटी पड़ जाएगी, कभी कहते हैं कि ट्रैफिक जाम होगा, कभी कहते हैं कि धार्मिक त्योहार है। फिर कभी कहते हैं कि आपके भाषण की वजह से कुछ गड़बड़ हो जाएगी। हम पार्टी के कार्यक्रम को लेकर पब्लिक मीटिंग करना चाहते थे।” हालांकि बिहार में ओवैसी कुछ खास नहीं कर पाए। उन्हें 2017 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है।
वह कहते हैं, “हमारी संस्था बिहार से ज्यादा उत्तर प्रदेश में मजबूत है। हम उम्मीद कर रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में बिहार से अच्छा प्रदर्शन करेंगे। जनवरी के अंत से मैं गांवों-शहरों में जाऊंगा और लोगों से मिलूँगा। तीन या चार सीटों पर जो उपचुनाव होंगे, उनमें से दो सीटों पर हम चुनाव लड़ेंगे।” आखिर सपा क्यों ओवैसी को प्रदेश से दूर रखना चाहती है? कहीं पार्टी को यह डर तो नहीं कि मुसलमान ओवैसी को सपा से हटकर एक दूसरे विकल्प के तौर पर देख सकते हैं?
केंद्र सरकार से उनके रिश्ते अच्छे रहें
समाजवादी पार्टी नेता नरेश अग्रवाल कहते हैं, "जिस तरह भाजपा के साथ उन्होंने (ओवैसी ने) रोल अदा किया, जिस तरह बिहार में मुसलमानों ने उनका बहिष्कार किया, बेहतर होगा कि वह हैदराबाद देखें। उन्हें उत्तर प्रदेश से क्या मतलब? वो जिस तरह से भाषण देते हैं, उससे हिंदू मुस्लिम झगड़ा हो जाएगा।" यहां यह बात भी ध्यान रखनी जरूरी है कि राज्य सरकारें चाहती हैं कि केंद्र सरकार से उनके रिश्ते अच्छे रहें। चाहे सीबीआई का भय हो, राज्य की आर्थिक जरूरतें पूरी करने की बात हो, राज्यों को केंद्र से मधुर रिश्तों की दरकार होती है।
मुलायम सिंह यादव और उनकी पार्टी के केंद्र सरकार से रिश्तों को लेकर भी ऐसी ही बातें होती हैं। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष मिश्रा मानते हैं कि जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएगा, भाजपा और सपा में एक दूसरे के प्रति व्यवहार में भी बदलाव दिखेगा। वह कहते हैं, “भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश सबसे महत्वपूर्ण प्रदेश है। चार-पांच महीने बाद देखिएगा कि भड़काऊ बयानों के खिलाफ तीखी कार्रवाई हो सकती है। उसके बाद सारी राजनीति खुलकर होगी। दंगों के समय भाजपा और सपा ने आपसी लड़ाई में संकोच नहीं किया था। जब फाइनल लैप होगा, उसमें किसी प्रकार का संकोच, मर्यादा नहीं होगी।”
आशुतोष मिश्रा के मुताबिक जब ध्रुवीकरण की कोशिश भाजपा की ओर से होगी तो “आजम खान बातें करेंगे। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने सफलता का स्वाद ले लिया है। लोग पुरानी चीजें भूल जाएंगे। जब अभद्र बातों का प्रयोग शुरू होगा, तब लोग भूल जाएंगे कि भाजपा और सपा के बीच छिपी समझ थी।” समाजवादी पार्टी नेता इस मुद्दे पर बात करने से कतराते हैं। पार्टी का मुखिया होने के नाते सारे फैसले मुलायम सिंह लेते हैं और इस सोच के पीछे भी उन्हीं की रणनीति मानी जा रही है।
बदलता स्टैंड
मुलायम सिंह के राजनीतिक इतिहास को देखें तो उन्होंने पूर्व में भी कई बार स्टैंड बदले हैं। बिहार में महागठबंधन की बात करने वाली सपा ने ऐन वक्त पर उससे मुंह मोड़ लिया था। ऐसे वक्त जब न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर कांग्रेस की मनमोहन सरकार पर खतरा था, सपा ने वामपंथी पार्टियों से अलग होकर कांग्रेस का साथ दिया था। 2012 में एक वक़्त राष्ट्रपति चुनने के मुद्दे पर ममता बनर्जी के साथ खड़े होने वाले मुलायम ने अलग जाकर आखिरकार प्रणब मुखर्जी का समर्थन किया था।
धर्मनिरपेक्ष राजनीति का दावा करने वाले मुलायम सिंह यादव ने कल्याण सिंह के साथ रिश्ता जोड़कर सबको चौंका दिया था। यानी मुलायम सिंह रणनीति बदलने में देर नहीं लगाते। नवीन जोशी कहते हैं, “वह (मुलायम) कई बार कहते हैं कि पार्टी का जन्म कांग्रेस विरोध के कारण हुआ था, लेकिन जब परमाणु संधि मामले में साथ देने की बात होती है, तो कांग्रेस के साथ हो लेते हैं।
जब उन्हें लगता है कि उन्हें कांग्रेस के समर्थन की जरूरत है, तो वह कहीं से लोहिया का उदाहरण लेकर आ जाते हैं कि इन परिस्थितियों में कांग्रेस का समर्थन भी लिया जा सकता है। रणनीति भी मुलायम तय करते हैं। उनकी वजह से परिवार एक है।” अयोध्या में मामला भड़का ही तब था, जब वहां बहुत सी शिलाएं कार्यशालाओं में तराशी जा रही थीं।