लोकसभा में नेता विपक्ष के पद और राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति और बर्ख़ास्तगी का सवाल पहले भी सुप्रीम कोर्ट में उठा है।
इसी के साथ इन सवालों के इर्द-गिर्द देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विमर्श एक नई शक्ल में शुरू हुआ है। सरकार भले ही फिलहाल राज्यपालों को बदल दे, पर आने वाले वक्त में यह काम आसान नहीं रहेगा।
दिल्ली में नरेंद्र मोदी की सरकार के बनने के बाद पहली खबरें थी कि अब राज्यपालों की बारी है। पहले भी ऐसा ही होता रहा है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को काम देने के लिए राज्यपाल का पद सबसे उचित माना जाता है।
इसके बाद ख़बर आई कि छह राज्यपालों को सलाह दी गई है कि वे अपने इस्तीफ़े दे दें। कुछ ने इस्तीफ़े दिए और कुछ ने आना-कानी की। ताज़ा मामला महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल के शंकरनारायणन का है, जिनका तबादला मिज़ोरम कर दिया गया था।
उन्होंने वहां जाने की बजाय इस्तीफा देना उचित समझा। हाल में कमला बेनीवाल वहीं लाने के बाद हटाई गईं थीं। इस मायने में मिज़ोरम काला पानी साबित हो रहा है।
शीला दीक्षित ने भी दिया इस्तीफा
इस बीच, केरल की राज्यपाल शीला दीक्षित ने भी मिज़ोरम तबादला किए जाने की खबरों के बीच इस्तीफा दे दिया है। सोमवार को गृहमंत्री से उनकी मुलाकात के बाद उनके इस्तीफे से जुड़ी अटकलें शुरू हो गई थीं।
हालांकि कुछ सियासी हलकों में माना जा रहा था कि वे लड़ने के मूड में हैं, लेकिन आख़िरकार उन्होंने इस्तीफे का रास्ता चुना। मौजूदा परिदृश्य में राज्यपाल का पद राजनीति की ज़बर्दस्त जकड़ में है।
विवादों का लम्बा इतिहास
दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री और केरल की पूर्व राज्यपाल शीला दीक्षित। राज्यपालों की राजनीतिक भूमिका को लेकर क्लिक करें भारतीय इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं।
लंबे अरसे तक राजभवन राजनीति के अखाड़े बने रहे। अगस्त, 1984 में एनटी रामाराव की सरकार को आंध्रप्रदेश के राज्यपाल रामलाल की सिफ़ारिश पर बर्ख़ास्त किया गया।
उत्तर प्रदेश में रोमेश भंडारी, झारखंड में सिब्ते रज़ी, बिहार में बूटा सिंह, कर्नाटक में हंसराज भारद्वाज और गुजरात में कमला बेनीवाल के फ़ैसले राजनीतिक विवाद के कारण बने।
केवल शोभा का पद नहीं
अनेक मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपालों की भूमिका की आलोचना भी की है। जब राजनेता-राज्यपाल का मुकाबला दूसरी रंगत के मुख्यमंत्री से होता है तब परिस्थितियाँ बिगड़ती हैं।
सन 1994 में तमिलनाडु में मुख्यमंत्री जे जयललिता और राज्यपाल एम चेन्ना रेड्डी के बीच टकराव का नुकसान प्रशासनिक व्यवस्था को उठाना पड़ा था। हाल में बिहार और झारखंड में विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों के बीच टकराव देखा गया।
केवल शोभा का पद नहीं
मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी के साथ कमला बेनीवाल। कुछ लोग मानते हैं कि राज्यपाल का काम महल में रहना, विधान सभा और सम्मेलनों को कभी-कभार संबोधित करना, परेडों का मुआयना करना, राज्य के अतिथियों के साथ दावतों में शरीक होना और सरकारी दस्तावेजों पर दस्तख़त करना है।
संघीय व्यवस्था में राज्य-कार्यपालिका के औपचारिक प्रमुख के रूप में राज्यपाल काम करता है, खासतौर से इस झंझावाती राजनीति के दौर में। यह शोभा का पद होता तो इसे बनाए रखने की कोई जरूरत नहीं थी।
कौन खींचेगा लक्ष्मण रेखा?
यह एक संस्था है, जो हमारी संघीय व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। उससे जुड़ी व्यवस्थाओं को साफ और पारदर्शी बनाने का यह बेहतर वक्त है।
राज्यपालों की नियुक्ति और बर्ख़ास्तगी क्या केवल राजनीतिक आधार पर होनी चाहिए? क्या लोकतांत्रिक संस्थाओं की मर्यादा की रक्षा के लिए कोई लक्ष्मण रेखा नहीं होनी चाहिए? कौन खींचेगा यह रेखा? और यह खींच भी दी गई तो इसका पालन हो, ये कौन सुनिश्चित करेगा?
उत्तर प्रदेश के नए राज्यपाल राम नाइक ने एक इंटरव्यू में कहा है कि राज्यपाल की भूमिका में पार्टी से ऊपर उठकर कार्य करने की आवश्यकता होती है। प्रदेश के राज्यपाल पद पर नियुक्ति की घोषणा के बाद उन्होंने 15 जुलाई को बीजेपी की प्राथमिक सदस्यता के साथ सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था।
वे कहते हैं कि राज्यपाल नियुक्त करने की जो परंपरा है सो है, पर नियुक्ति के बाद उन्हें पार्टी के हितों के ऊपर उठकर काम करना चाहिए। साथ ही वे यह कहते हैं कि यह राजनीतिक नियुक्ति है और केंद्र में सरकार बदलने के बाद राज्यपालों को खुद पद से हट जाना चाहिए।
सवाल है कि क्या यह बात व्यक्तियों के विवेक पर छोड़ी जानी चाहिए? हाल में उत्तराखंड के राज्यपाल अज़ीज़ कुरैशी का मसला अदालत में उठा है। राज्यपाल ने सवाल उठाया है कि मुझे नियुक्त राष्ट्रपति ने किया है। गृहमंत्री या सचिव मुझे हटाने वाले कौन होते हैं?
केंद्र का एजेंट भी नहीं
राज्यपालों के पद को लेकर अभी तक तीन बातें मानी जाती रहीं हैं। एक, यह शोभा का पद है। दो, इस पद पर नियुक्ति राजनीतिक आधार पर होती है और तीसरे हमारी संघीय व्यवस्था में राज्यपाल केंद्र का प्रतिनिधि है।
केंद्र सरकार उससे जैसे चाहे काम कराए। जब चाहे नियुक्त करे और जब चाहे हटाए लेकिन ये धारणाएं सुप्रीम कोर्ट के साल 2010 के एक फ़ैसले के पहले की परिस्थितियों के आधार पर बनी हैं।
राज्यपाल के पद का दुरुपयोग लगभग सभी सरकारों ने किया है। कांग्रेस को खासतौर से इसका श्रेय जाता है। यह काम पचास के दशक से चल रहा है जब केरल की सरकार को बर्ख़ास्त करने में राज्यपाल का इस्तेमाल किया गया।
राजनीतिक टीम का सदस्य
बिहार के गवर्नर पद पर बूटा सिंह का कार्यकाल विवादों से भरा रहा। 1977 में जनता पार्टी की सरकार ने और 2004 में यूपीए सरकार ने राज्यपालों की एकमुश्त बर्ख़ास्तगी की।
2004 में की गई बर्ख़ास्तगी के ख़िलाफ़ भाजपा के पूर्व सांसद बीपी सिंघल ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी, जिस पर मई 2010 में अदालत की संविधान पीठ ने कुछ दिशा-निर्देश जारी किए थे।
अदालत ने कहा कि यदि बर्ख़ास्त राज्यपाल अदालत आएंगे तो सरकार को अपने निर्णय का औचित्य बताना होगा। अदालत ने कहा कि राज्यपाल केंद्र सरकार का एजेंट नहीं है और न किसी राजनीतिक टीम का सदस्य है।
सक्रिय राजनेताओं की पनाहगाह भी नहीं
उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल रोमेश भंडारी के कार्यकाल में राज्य में संवैधिनक संकट खड़ा हो गया था। इसके पहले सरकारिया आयोग की सलाह थी कि राज्यपाल का चयन राजनीति में सक्रिय व्यक्तियों में से नहीं होना चाहिए। कम से कम केंद्र में सत्तारूढ़ दल का व्यक्ति तो कदापि नहीं।
आयोग की सलाह थी कि राज्यपालों का चयन केंद्र सरकार नहीं बल्कि एक 'स्वतंत्र समिति' करे। इसमें प्रधानमंत्री के अलावा लोकसभा अध्यक्ष, देश के उप राष्ट्रपति और राज्य के मुख्यमंत्री को भी होना चाहिए।
सरकारिया आयोग का यह भी कहना था कि संविधान निर्माताओं ने राज्यपाल को केंद्र के प्रतिनिधि के रूप में नहीं बल्कि संघीय व्यवस्था के एक महत्वपूर्ण सेतु के रूप में देखा था।
आयोग का ये भी मानना था कि पद छोड़ने के बाद उसकी नियुक्ति लाभ के किसी पद पर नहीं होनी चाहिए, लेकिन देश में सक्रिय राजनेता ही राज्यपाल बनते रहे हैं और राज्यपाल पद छोड़ने के बाद मंत्री पद पर नियुक्त होते रहे हैं।