राजनीति विडंबनाओं और विरोधाभासों का पुलिंदा है। आमतौर पर लोकतंत्र से उम्मीद की जाती है कि इसमें हाशिए के लोगों को मुख्यधारा में शामिल किया जाएगा और समाजवाद इस बात का आभास पैदा कर पाएगा कि उनके साथ न्याय हो रहा है। पर हाल के दिनों में देखा गया है कि भारत में एक बिल्कुल दूसरी तरह की भाषा बोली जा रही है।
यह भाषा हाशिए पर खडे लोगों की नहीं है, यह मध्य वर्ग की भाषा है। यह न्याय की भाषा नहीं है, यह भाषा है एक पायदान से दूसरे पायदान तक पहुंचने की। ताकतवर और अधिक ताकतवर बनना चाहते हैं। अगर एक दबंग जाति जमीन के बडे हिस्से पर दबदबा बनाने में कामयाब हो जाती है तो फिर वो शिक्षा पर नियंत्रण करने की फिराक में लग जाती है।
जमीन, शिक्षा और चुनावी प्रणाली, सत्ता तक पंहुचने के तीन रास्ते हैं और दबंग जातियां इन तीनों पर अपना पूरा अधिकार स्थापित करना चाहती हैं। पाटीदारों का इतिहास इसका उदाहरण है। समाजविज्ञानियों का मानना है कि पाटीदार या पटेल एक बडी प्रभावशाली जाति के रूप में उभरे।
ये हैं पटेल!
उन्होंने जमीन पर नियंत्रण को राजनीति पर दबदबा कायम करने के लिए इस्तेमाल
किया।जनसांख्यिकी, राजनीति, दुनिया के तमाम जगहों पर उनकी फैलाव, ये सारे
उनकी शक्ति के साक्ष्य हैं। उनके बारे में मिथक यह है कि लेउवा और कडवा
समुदाय के लोग लव और कुश के वंशज हैं।
हालांकि ऐतिहासिक रूप से पाटीदार
अंग्रेजों की ईजाद हैं, जो अंग्रेजों के द्वारा शुरू किए गए जमीन की
पट्टीदारी व्यवस्था में फले फूले।वर्ण व्यवस्था में उनका ताल्लुक नीची जाति
से रहा है लेकिन उन्होंने खुद का संस्कृतीकरण किया। उनमें ज्यादातर लोग
शाकाहारी हैं।पटेल या पाटीदार समुदाय के लोगों ने भूमि और खेतीबाडी से बाहर
निकल कर व्यापार जगत में कदम रखा।
विदेशों में आज वे मोटल व्यवसाय का
पर्यायवाची बन गए हैं।अब सवाल यह उठता है कि जो जाति इतनी ताकतवर और
प्रभावशाली है, उसके लोगों में इतना गुस्सा क्यों है कि लाखों ने अहमदाबाद
शहर को पूरी तरह ठप कर दिया।राजनीति की गतिशीलता को कई स्तरों पर समझा जा
सकता है कि शक्ति कोई ऐसी मुद्रा नहीं है, जिसको हर जगह भुनाया जा सके।
दबदबा साफ नजर आता है
जमीन
के बल पर हमेशा बेहतर शिक्षा हासिल नहीं की जा सकती और न ही इसके बल पर
रोजगार हासिल किया जा सकता है।हताशा तब बढ जाती है जब ये दिखता है कि कुछ
पाटीदार मंहगी फीसों वाले बडे बडे कॉलेजों के मालिक बन बैठे हैं। इससे शुरू
होता है संघर्ष - उन मजबूत और कमजोर पाटीदारों के बीच, उनमें से एक जो
समुदाय के कमजोर लोगों के शोषण में तो कुछ गलत नहीं समझते लेकिन अपनी उस
शक्ति का इस्तेमाल व्यवस्था और शिक्षा में प्रतिनिधित्व को बढाने के लिए
कुछ नहीं करते हैं।
तथ्यों की पडताल करें तो राजनीति में, कॉलेज पर नियंत्रण
में, पटेलों का दबदबा साफ नजर आता है। लेकिन उसके उलट पटेल समुदाय की
शिक्षा में भागीदारी कम है और शिक्षा नौकरियां पाने का अहम जरिया है।इससे
गुस्से की भावना बढती है।
जो विरोध प्रदर्शन हुए उसमें गुस्सा साफ झलकता
है। इनका पहला गुस्सा तो सत्ता के नशे में चूर उन पटेलों से है जो युवाओं
के गुस्से को नहीं समझ पा रहे।दूसरे गुस्सा भारतीय जनता पार्टी से है, जो
पटेलों के दबदबे की वजह से ही सत्ता में पंहुची। पूरी बिडंवना इससे साफ हो
जाती है।गुजरात कैबिनेट में इतने सारे पटेलों के नाम गिनवाने का क्या फायदा
अगर वो आपके किसी काम का न हो?
तो ये है रणनीति
युवा पटेल इस बात को लेकर साफ हैं कि अगर
उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो कमल नहीं खिलेगा।तीसरी बात यह है कि यह
आरक्षण विरोधी आंदोलन नहीं है।पटेल यह चाहते हैं कि जाति और जाति-आधारित
आरक्षण का लाभ उन्हें मिले। वे आरक्षण व्यवस्था को तभी ध्वस्त करना चाहते
हैं जब वो उनके खिलाफ काम कर रही हो।
राजनीति में पादीदारों की पारंपरिक
स्थिति और समुदाय आधारित राजनीति से कोई काम नहीं बनेगा।हार्दिक पटेल
परस्पर विरोधी विचारधाराओं पर काम कर रहे हैं।वे ऐसा नया काडर बनाना चाहते
हैं जो उनका वफादार हो और वो मौजूद व्यवस्था में अपना बडा हिस्सा चाहते
हैं।आधुनिक मीडिया और युवाओं की ताकत प्रभावशाली जाति आधारित राजनीति को और
मजबूत ही करती है।
जब नए और पुराने के बीच का मतभेद खत्म हो जाएगा, चतुर
लोग मिल बैठ कर बात करेंगे, उस समय मोदी और शाह के इर्द गिर्द घूम रही
पिछडी जाति की राजनीति और मजबूत ही होगी।चुनाव आधारित राजनीति की यह
तार्किक परिणति है। यह भूमंडलीकरण का भी नतीजा है।पाटीदार समुदाय के लोग
जातिवादी हैं। पर भूमंडलीकरण की वजह से वे शिक्षा का महत्व समझते
हैं।
उन्होंने पहले जिस तरह जमीन पर नियंत्रण का फायदा उठाया, अब उसी तरह
शिक्षा का इस्तेमाल अपने हित में करना चाहते हैं।पटेलों के विरोध का मौजूदा
अर्थ यही है।आरक्षण के खेल का नियम बदल कर अपनी सत्ता को और मजबूत करने का
यह तरीका है।वे आरक्षण के जरिए हाशिए पर खडे लोगों की नहीं बल्कि पूरे
ओबीसी वर्ग के लोगों की ताकत बढाना चाहते हैं।ऊंची आकांक्षा रखने वाले समाज
में न्याय तभी काम करता है जब यह आपके हित में काम करे। मौजूदा राजनीति का
यही तर्क है।