भाजपा मिशन 272 तक पहुंचने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार है। यही वजह है कि जब पार्टी के पीएम पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार शुरू किया, तो विकास को सबसे आगे रखा गया।
लेकिन धीरे-धीरे प्रचार ने ध्रुवीकरण का रंग ले लिया। जब चुनाव अंतिम चरण में दाखिल हो चुका है, तो मोदी ने एक बार फिर लाइन बदलते हुए हिंदुत्व और जातिगत कार्ड खेल दिया। प्रियंका गांधी के हमले पर पलटवार करते हुए मोदी ने वोटों का भी पूरा ध्यान रखा।
मोदी के इस नए हमले से कांग्रेस सकते में थी और राहुल गांधी ने इसका जवाब बुधवार सवेरे दिया। लेकिन मोदी के इस कार्ड से सबसे ज्यादा गुस्सा मायावती को आया। उन्होंने खूब खरी-खोटी सुनाई। लेकिन मायावती को प्रियंका पर हमले की इतनी फिक्र क्यों हो गई? या कुछ और वजह है।
'निचली जाति' बनी सबसे बड़ा हथियार
नरेंद्र मोदी की अमेठी रैली के बाद उन्हें निशाने पर लेते हुए प्रियंका गांधी ने कहा, "अमेठी में मेरे पिता (राजीव गांधी) का अपमान हुआ है। यहां की जनता उन्हें माफी नहीं करेगी। उनकी नीच राजनीति का जवाब अमेठी का हर बूथ देगा।"
इस पर अगले रोज मोदी ने पलटवार किया। भाजपा के पीएम पद के दावेदार ने कहा, "मैं निचली जाति से आता हूं, इसलिए मेरा मजाक बनाया गया है। अगर मैंने राजीव गांधी के बारे में कोई झूठ कहा है, तो मुझे फांसी पर चढ़ा दीजिए। लेकिन निचले तबके के मेरे भाइयों का अपमान मत कीजिए।"
जाहिर है, मोदी ने पलटवार में ऐसा जातिगत कार्ड खेला कि एक बार को कांग्रेस भी परेशान हो गई। उसके नेताओं को एक तरफ प्रियंका का बचाव करना पड़ा, तो दूसरी तरफ मोदी के नए हमले का जवाब देना पड़ा। लेकिन उन पर सबसे तगड़ा हमला बहुजन समाज पार्टी की तरफ से हुआ।
मायावती को सताने लगा डर?
मायावती ने मोदी पर ‘नीच राजनीति’ को भुनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि वह इसे जाति से जोड़कर घटिया राजनीति कर रहे हैं। उन्होंने कांग्रेस पर भी हमला बोला।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने मोदी के इस बयान से बसपा के नुकसान का अंदाजा लगाकर चुप्पी साध ली। मायावती ने मंगलवार की देर शाम आनन-फानन में बुलाई गई प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि मोदी प्रदेश में अपनी पार्टी की खराब हालत देखते हुए घटिया किस्म के हथकंडे अपना रहे हैं।
कांग्रेस ने उनके बारे में नीची राजनीति का आरोप लगाया जिसे वह पूरे दिन भुनाते रहे। मायावती ने कहा कि इस घिनौनी राजनीति का कांग्रेस को तत्काल जवाब देना चाहिए था लेकिन उसने नहीं दिया।
रामदेव के बयान को रखा सामने
मायावती ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि नरेंद्र मोदी पिछड़े वर्ग का वोट पाने के लिए खुद को पिछड़ी जाति का व्यक्ति बता रहे हैं लेकिन अब तक इस बात का खुलासा नहीं किया कि वह किस जाति के हैं।
उन्होंने दोहराया कि कम से कम वह ये तो बताएं कि वह कुशवाहा हैं या नाई लेकिन मोदी सिर्फ घटिया हथकंडे अपना रहे हैं। इसके पहले भी मायावती ने मोदी के बयानों की निंदा की थी और अपनी जनसभाओं में दोहराया था कि दलित वर्ग किसी के झांसे में न आए।
बसपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि भाजपा दलित व पिछड़ा विरोधी है। उन्होंने तात्कालिक उदाहरण देते हुए कहा कि बाबा रामदेव यादव ने दलितों के प्रति आपत्तिजनक टिप्पणी की तो मोदी ने चुप्पी साध ली।
इसलिए भड़क रही हैं मायावती
मायावती के भड़कने की वाजिब वजह भी है। दरअसल, नरेंद्र मोदी का जातिगत कार्ड खेलने का जितना नुकसान कांग्रेस को होगा, उससे कहीं ज्यादा उनकी बहुजन समाज पार्टी को उठाना पड़ सकता है।
बुधवार को उत्तर प्रदेश की 15 सीटों पर वोटिंग हुई, जिनमें से एक पर भी भाजपा का कब्जा नहीं है। इनमें से कई सीटों पर निचली तबका अहम भूमिका अदा करता है।
मोदी ने डुमरियागंज में जातिगत कार्ड खेला, जहां पिछड़ा तबका काफी मजबूत है। यहां से जगदंबिका पाल मैदान में हैं, जो चुनावों से ऐन पहले कांग्रेस से भाजपा के पाले में आ गए।
बिहार-यूपी में पिछड़ा तबका बेहद अहम
चुनाव के अंतिम चरण भाजपा के लिए बेहद अहम हैं, क्योंकि इनमें बिहार और उत्तर प्रदेश की सीटें शामिल हैं। अगर भाजपा को केंद्र में सत्ता के करीब पहुंचना है, तो दोनों राज्य उसके लिए अहम है।
दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में बसपा का बड़ा दांव लगा है। आम तौर पर पिछड़ा वर्ग मायावती का वोटर माना जाता है और पिछले कई चुनावों में अपनी वफादारी दिखा चुका है।
लेकिन इस बार मोदी ने खुद को पिछड़ा बताकर नया कार्ड खेला, तो मायावती को डर सताने लगा कि कहीं उनके वोट बैंक में सेंध न लग जाए। कांग्रेस का हमला इसलिए हल्का-फुल्का रहा, क्योंकि ये वोट परंपरागत रूप से उसके खाते के नहीं माने जाते।
भाजपा ने खेला दलित कार्ड
दरअसल, भाजपा ने इस बार विकास और हिंदुत्व के अलावा दलितों को अपने पक्ष में करने के लिए कई दांव खेले। चुनावों से पहले लोक जनशक्ति पार्टी प्रमुख रामविलास पासवान, उत्तर प्रदेश के दलित नेता उदित राज और महाराष्ट्र में रामदास अठावले को अपने पाले में किया।
सियासी समर में इस तबके को अपने पाले में करने की कोशिश से बचना कितना भारी पड़ सकता है, यह भाजपा को समझ आ गया है। दूसरी तरफ मायावती हैं, जिनकी पूरी राजनीति इसी आधार पर टिकी है।
16 मई ज्यादा दूर नहीं है। अब देखना यह है कि साम, दाम, दंड, भेद की रणनीति पर अमल कर रही भाजपा अंतर पैदा कर पाती है या मायावती एक बार फिर सभी को चौंकाते हुए बाजी मार ले जाएंगी!