इंटरनेट पर मशरूम की तरह बढ़ती पोर्न साइटों पर अपनी चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस पर लगाम कसने के लिए समाधान ढूंढने को कहा है।
हालांकि केंद्र सरकार ने इस संबंध में अपनी लाचारी व्यक्त करते हुए कहा कि अगर हम एक साइट बंद करते हैं, तो दूसरी शुरू हो जाती है।
देश में पोर्नोग्राफी की बढ़ती समस्या पर दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस आरएम लोढ़ा ने कहा, 'इंसानी दिमाग और तकनीक कानून से कहीं तेज चलती है।
कानून को भी तकनीक के अनुसार अपनी स्पीड बढ़ानी होगी। सरकार की ओर से कोर्ट में पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एल नागेश्वर राव ने हलफनामा पेश करते हुए कहा कि जब एक साइट बंद होती है, तो उसी तरह की कई अन्य साइटें खुल जाती हैं।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार इन साइटों पर नियंत्रण करने के लिए विदेशों में स्थित सर्वरों को भारत लाने की कोशिश में है।
सुप्रीम कोर्ट में देना होगा जवाब
उन्होंने कोर्ट के समक्ष सरकार की लाचारी व्यक्त करते हुए कहा, 'हम एक साइट को ब्लॉक करते हैं, तो दूसरी खुल जाती है। देश में कई छिपे हुए सर्वर भी हैं और इन पर नियंत्रण करना काफी मुश्किल हो गया है।
सभी सोशल मीडिया वेबसाइटों के सर्वर विदेशों से ऑपरेट हो रहे हैं। राव ने कहा कि बच्चों को इस तरह की साइटों से दूर रखने के लिए 'पेरेंटल कंट्रोल सॉफ्टवेयर' मुहैया कराने चाहिए।
हालांकि पीठ ने केंद्र से कहा कि इस समस्या का कुछ न कुछ हल तो ढूंढना ही होगा। पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा, 'इंटरनेट पर उपलब्ध पोर्न सामग्री को रोकने के लिए कानून, तकनीक और सरकार को मिलकर काम करना होगा। इस तरह की साइटों को रोकने के लिए नियम हैं और कुछ न कुछ तरीका तो ढूंढा जाना चाहिए।
20 करोड़ से ज्यादा पोर्न वीडियो मौजूद
इंदौर के एडवोकेट कमलेश वासवानी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि भले ही पोर्न सामग्री देखना अपराध नहीं है, लेकिन इस पर प्रतिबंध लगना चाहिए क्योंकि महिलाओं के खिलाफ अपराध के पीछे यह एक मुख्य कारण है।
याचिका में कहा गया कि कड़े इंटरनेट कानून के न होने से लोग पोर्न वीडियो देख रहे हैं और बाजार में 20 करोड़ से ज्यादा पोर्न वीडियो या क्लिपिंग मौजूद है। इन्हें आसानी से इंटरनेट के जरिए डाउनलोड किया जा सकता है।
सर्वोच्च अदालत ने केंद्र को निर्देश दिए हैं कि आईटी एक्ट की धारा 88 के तहत सलाहकार समिति के समक्ष याचिका की सामग्री को पेश किया जाए ताकि वह इस समस्या के समाधान के लिए उचित सलाह दे सके।
याद रहे कि सर्वोच्च अदालत ने पिछले साल 18 नवंबर को डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्युनिकेशन को नोटिस जारी कर पोर्न वेबसाइटों, खासतौर से चाइल्ड पोर्नोग्राफी को ब्लॉक करने पर जवाब मांगा था।