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अपनी ही सरकार गिराने पर आमादा केजरी?

Mon, 10 Feb 2014 04:13 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
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यूं तो जब आम आदमी पार्टी ने जब से दिल्ली की गद्दी संभाली, यहां की सियासत में उठापटक का दौर तभी से जारी था, लेकिन बीते कुछ दिनों में बवाल कुछ ज्यादा बढ़ गया है।
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दिसंबर में कुर्सी संभालने वाले अरविंद केजरीवाल की सरकार ने धमाकेदार शुरुआत करते हुए पानी-बिजली के मोर्चे पर बड़े ऐलान किए और बंगले-गाड़ी के विवादों में फंसने के बावजूद जैसे-तैसे इनसे बाहर निकलने में कामयाबी भी पाई।

मीडिया ने शुरुआत में 'आम आदमी' के सीएम अरविंद केजरीवाल की तारीफ करने में कोई कंजूसी नहीं बरती, लेकिन जब विवाद बढ़े तो सरकार ने शिकायत उठाई कि मीडिया उनके विरोध में खड़ा हो गया है। आलोचना करने वालों का कहना है कि आम आदमी पार्टी अब दिल्ली सरकार की जिम्मेदारी से अलग होना चाहिए, लेकिन ऐसा आखिर है क्यों?
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संविधान को ताक पर रखा

जो विवाद उन दिनों गर्म है, वह जन लोकपाल बिल से जुड़ा है। अरविंद केजरीवाल की ‌कैबिनेट ने इसे उप-राज्यपाल और केंद्र सरकार के पास भेजे पास कर दिया और यही से बवाल खड़ा हो गया।

संविधान के जानकारों का मानना है कि दिल्ली सरकार, बिना केंद्र की मंजूरी के ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकती। दिल्ली के मुख्यमंत्री ने जिन चार जानकारों से सलाह मांगकर उनके हवाले से दावा किया था, उनमें से दो ने बाद साफ किया कि उनसे जन लोकपाल बिल पर कोई चर्चा हुई ही नहीं थी।

केजरीवाल ने ऑटो महासभा में कहा, "ये लोग कहते हैं कि जन लोकपाल बिल पारित नहीं हो सकता। बिना केंद्र की मंजूरी के ऐसा करना मुमकिन नहीं है। यह सरकार न हो गई, अंग्रेजों की सरकार हो गई।" उम्मीद की जा रही थी कि आम आदमी पार्टी, केंद्र के साथ बातचीत कर कोई बीच का रास्ता निकालने की कोशिश करेगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

इस्तीफा देने को तैयार हैं केजरीवाल

रविवार आते-आते केजरीवाल ने इस सियासी मुद्दे का पारा आसमान पर पहुंचा दिया। शनिवार को उन्होंने कहा कि वह जन लोकपाल बिल पारित कराने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, क्योंकि वह सीएम बनने नहीं आए थे, बल्कि उनकी जंग भ्रष्टाचार के खिलाफ थी।

जब उनसे पूछा गया ‌कि क्या उनके मायने इस्तीफा देने से हैं, तो उन्होंने कहा, "इस निष्कर्ष पर आप पहुंचे हैं।" लेकिन रविवार को उन्होंने यही शब्द खुद अपने जबान से कह दिए। उन्होंने कहा कि अगर यह बिल पारित नहीं किया जाता, तो वह मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे देंगे।

इस सारे घटनाक्रम के पीछे की राजनीति भी कुछ-कुछ समझ आने लगी है। जैसे ही केजरीवाल ने यह बयान दिया, दिल्ली में उनकी सरकार को समर्थन दे रही कांग्रेस और भाजपा ने मोर्चा खोल दिया कांग्रेस ने कहा कि अगर सही संवैधानिक प्रक्रिया के तहत लोकपाल बिल को लाया जाता है, तो वह इसका समर्थन करेगी। भाजपा का कहना है कि केजरीवाल नाटक कर रहे हैं और वह इस बिल का साथ देने को तैयार है।

योगेंद्र यादव ने माना, जल्दबाजी दिखाई

इन दोनों दलों के अलावा आम आदमी पार्टी सरकार को समर्थन दे रहे जेडी-यू विधायक शोएब ‌इकबाल का कहना है कि उनका समर्थन सरकार को जारी है और इस्तीफा देना किसी समस्या का हल नहीं है।

हालांकि, एक अन्य निर्दलीय विधायक रामबीर शौकीन और आम आदमी पार्टी से बगावत कर बाहर निकाले गए विनोद कुमार बिन्नी ने सरकार से समर्थन वापस लेने का फैसला किया।

खुद आम आदमी पार्टी के 'चाणक्य' योगेंद्र यादव कह चुके हैं कि सीएम अरविंद केजरीवाल की सरकार कई बार जल्दबाजी में कदम उठाती है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इस सरकार को अपनी रफ्तार में कुछ संयम लाने की जरूरत है।

विवादों पर यह है AAP के चाणक्य की राय

जब केजरीवाल सरकार की गलतियों के बारे में पूछा गया, तो योगेंद्र यादव ने कहा, "मुझे लगता है कि हमने जरूरत से ज्यादा कोशिश की। तनाव और लोगों की निगाह में रहने के दबाव ने सरकार पर कृत्रिम प्रेशर बना दिया। हमें काफी कुछ सीखना है।"

हालांकि, उन्होंने साथ ही यह भी कहा, "लेकिन जल्दबाजी दिखाने के‌ लिए सरकार के सिर पर ठीकरा फोड़ने की जरूरत नहीं है, क्योंकि यहां मुख्यमंत्री ऐसे मुद्दे उठा रहे हैं, जो बीस साल पहले उठाए जाने चाह‌िए थे।"

योगेंद्र ने यह भी स्वीकार किया कि AAP सोमनाथ भारती के विवाद को लेकर जनता का नजरिया नहीं समझ सकी और उसे काफी कुछ सीखना है। उन्होंने कहा, "पार्टी इस तरह दिखी जैसे गलती करने वाले को बचा रही है। पहले दिन हमें तथ्य सामने रखने चाहिए थे, लेकिन हमने इस नजरिए को मजबूत होने दिया। हम आधी चीजें ऐसी करते हैं, जिन्हें पब्लिसिटी नहीं मिलनी चाहिए।"

शहीद का दर्जा चाहते हैं केजरीवाल?

सवाल उठना लाजिमी है कि आम आदमी पार्टी अब दिल्ली की गद्दी से उतरना चाहती है? जन लोकपाल बिल पर अरविंद केजरीवाल का किसी भी हद तक जाने और उसके बाद इस्तीफा देने की धमकी के क्या मायने निकाले जा सकते हैं।

उनकी पार्टी के नेता उप-राज्यपाल को कांग्रेस का एजेंट बताते हैं, लेकिन शाम में मीडिया के सामने उन्हीं के पार्टी के लोग माफी मांगते हैं और अगले रोज आशुतोष फिर अपना बयान दोहराते हैं। आखिर यह माजरा क्या है। क्या आम आदमी पार्टी दिल्ली में दोबारा चुनावों का सामना कर अपने बूते सरकार बनाना चाहती है। या‌ फिर यह सारी तैयारी लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और भाजपा से लड़ने के लिए अपने हाथ खोलने से जुड़ी है?

दरअसल, इन संभावनाओं में कुछ दम भी हो सकता है कि केजरीवाल खुद दिल्ली सरकार की जिम्मेदारी से बाहर होना चाहते हैं। लेकिन ऐसा नहीं कि वो यह दिखाना चाहेंगे कि यह नाकाम होने की वजह से हुआ। वो इसमें अपनी सरकार को संभवतः 'शहीद' का दर्जा दिलाना चाहते हैं।

अपने बूते सरकार बनाने की जुगत!

जाहिर है, अगर ऐसा होता है कि आम आदमी पार्टी लोकसभा चुनावों और शायद उसके साथ होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनावों में इस मुद्दे के साथ जनता के बीच उतरेगी कि उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल बिल के‌ लिए जंग लड़ी और नाकाम रहने में अपनी सरकार की बलि दे दी, क्योंकि उन्हें कुर्सी की कोई चाहत नहीं थी।

दिल्ली में सरकार बनाते वक्‍त भी आम आदमी पार्टी ने यही दांव खेला था और कामयाब भी रही। कांग्रेस और भाजपा से समर्थन लेने से साफ मना करने वाले अरविंद केजरीवाल की जब सरकार बनी, तो उसे कांग्रेस के आठ विधायकों का समर्थन हासिल था। लेकिन उन्होंने अलग अंदाज में समर्थन लिया।

केजरीवाल ने विधानसभा में आम जनता से जुड़े 18 मुद्दे सामने रखे और कहा कि जो भी विधायक इनके पक्ष में हैं, वे पार्टी लाइन से ऊपर उठकर उनका समर्थन करें। जाहिर है, ऐसी सूरत में कांग्रेस के पास कोई रास्ता नहीं रहा और भाजपा के हाथ सिवाय पछतावे के कुछ नहीं आया।
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भाजपा-कांग्रेस नहीं गिरने देंगी सरकार?

यह सही है कि दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने शुरुआत में जो कदम उठाकर वाहवाही बटोरी, वो अब विवादों में कहीं गुम सी हो गई है। उनकी सरकार ने राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़े मामलों में जांच तेज कराने का कदम उठाकर अपनी भ्रष्टाचार विरोधी छवि को कुछ मजबूत करने की कोशिश की।

और इसके बाद मुद्दा उठाया गया जन लोकपाल बिल का। और इसे पारित कराने के लिए इंदिरा गांधी स्टेडियम चुना गया, जहां जनता मौजूद रहे। दिल्ली की सियासत में अपनी तरह का अनोखा 'नाटक' चल रहा है।

बड़ी उम्मीदों और शिद्दत से सरकार बनाने वाले अरविंद केजरीवाल अपनी सरकार की कुर्बानी देने को तैयार हैं और उनके धुर-विरोधी, जो उन्हें जरा पसंद नहीं करते, वे उनकी सरकार किसी कीमत पर गिरने नहीं देना चाहता। इसमें उनका स्वार्थ है। जब तक दिल्ली में AAP की सरकार रहेगी, लोकसभा चुनावों में वह खुलकर बैटिंग नहीं कर सकेगी और उसकी तथाकथित गलतियों को कांग्रेस-भाजपा आगामी चुनावी रण में भुनाएगी!
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