कांग्रेस ने कर्नाटक के 71 वर्षीय नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को लोकसभा में पार्टी का नेता नामित कर उस पार्टी कैडर को निराश कर दिया है। कैडर उम्मीद लगाए बैठा था कि उपाध्यक्ष राहुल गांधी संसद के भीतर और बाहर पार्टी का चेहरा होंगे।
वफादार रहे कैडर को उम्मीद थी राहुल अपने पैरों पर फिर से खड़े होने की कोशिश कर रही पार्टी में नई ऊर्जा का संचार करेंगे। यह एक बार फिर संकेत देता है कि राहुल गांधी अपने कंधों पर जिम्मेदारी लेने और विरोधियों से निपटने से बच रहे हैं।
कांग्रेस ने लोकसभा में खड़गे के रूप में एक विनम्र और पुराने चेहरे को आगे कर यह संदेश देने की कोशिश की है कि पार्टी दलितों को अहमियत देती है। खड़गे दलित समुदाय के नेता हैं। हालांकि खड़गे को बड़े वक्ता के रूप में नहीं जाना जाता है और उनको लोकसभा में पार्टी का नेता बनाया जाना करारी हार से पस्त कांग्रेस की सदन में कमजोर रणनीति को दर्शाता है।
यह बड़ा सवाल है कि भविष्य में होने वाले चुनावों में यह फैसला पार्टी को कितना फायदा पहुंचाता है?
राहुल गांधी को लेनी चाहिए जिम्मेदारी
पार्टी नेता और कैडर अब मानने लगा है कि राहुल गांधी अपने कंधों पर जिम्मदारी लेने से बच रहे हैं। इससे राहुल के उस तर्क के प्रति कैडर और उन लोगों में गलत संदेश जा सकता है जिसमें वह कहते हैं कि वह पार्टी फिर से मजबूत करने के लिए ज्यादा समय देना चाहते हैं।
पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी पर इस बात के लिए तगड़ा दबाव था कि वह या तो खुद को या राहुल को लोकसभा में नेता के रूप में नामित करें। इससे पहले सोनिया को कांग्रेस संसदीय दल का अध्यक्ष फिर से चुना गया था, वह 1998 से ही इस पद पर हैं।
अध्यक्ष चुने जाने के ही साथ सोनिया को पार्टी ने इस बात के लिए अधिकृत कर दिया कि वह दोनों सदनों के नेता को नामित करें। पार्टी नेता यह तय मान रहे थे कि सोनिया लोकसभा में नेता के पद पर खुद को नामित नहीं करेंगी, क्योंकि 2004 और 2009 में भी उन्होंने खुद को इस पद से दूर रखा था।
'कांग्रेस नेतृत्व के पूर्ण दिवालिए होने का संकेत'
एक पूर्व मंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता का कहना है, ‘खड़गे को लोकसभा में पार्टी का नेता नामित करना कांग्रेस नेतृत्व के पूर्ण दिवालिया होने का संकेत देता है। हम किस तरह का संकेत देना चाहते हैं?
पहले से ही राहुल के पार्टी नेतृत्व की क्षमता को लेकर सवाल उठ रहे हैं, इस नए फैसले से इससे निपटने में कोई मदद नहीं मिलेगी।’ एआईसीसी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है, ‘कांग्रेस के नेतृत्व के लिए जरूरी है कि वह पार्टी नेताओं और कैडर पर ध्यान केंद्रित करे। ऐसा लगता है कि पार्टी में और लोगों के बीच संपर्क खत्म हो गया है।
इसका उदाहरण है कि राहुल गांधी विधानसभा चुनाव से पहले मशविरे के लिए सीमांध्र और तेलंगाना के बुजुर्ग नेताओं से नहीं मिले और पार्टी के प्रभारी जयराम रमेश को बिना जमीनी हकीकत जाने मनमाने ढंग से फैसले लेने पड़े, इसका जो नतीजा आया वह सबके सामने है। दोनों राज्यों में ही कांग्रेस बुरी तरह हारी।’
बंटी है कांग्रेस
कांग्रेस इस मुद्दे पर बंटी हुई है। वरिष्ठ नेता जहां सोनिया के नाम की वकालत करते हैं वहीं पार्टी के युवा नेता राहुल गांधी का समर्थन कर रहे हैं।
सोनिया जल्द ही राज्य सभा में विपक्ष के नेता और दोनों सदनों के उप नेताओं व चीफ व्हिप के नामों की घोषणा कर सकती हैं। पूर्व पीएम मनमोहन सिंह पहले ही राज्य सभा में विपक्ष के नेता पद को लेकर अनिच्छा जता चुके हैं।