शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे के निधन के बाद ये चर्चा एक बार फिर जोर पकड़ रही है कि उनकी विरासत कौन संभालेगा? हालांकि, इसी विरासत का प्रश्न उठ खड़ा होने पर महाराष्ट्र नव निर्माण सेना यानी मनसे का जन्म हुआ था। फिर ये सवाल दोबारा क्यों उठ खड़ा हुआ है? कहने वाले कहेंगे कि ये खबर बेचने वालों के दिमाग की उपज है, लेकिन चर्चा है तो बात करनी पड़ेगी। सच तो ये है कि प्रत्येक शिवसैनिक, मनसे कार्यकर्ता और मराठी मानुस आज विरासत के इसी प्रश्न पर चर्चा कर रहा है।
वो बात कर रहा है कि क्या मनसे और शिवसेना साथ आएंगे? अगर आएंगे तो राज ठाकरे कमान संभालेंगे या उद्धव ठाकरे और अगर दोनों साथ नहीं आए तो क्या बाला साहेब की राजनीतिक विरासत को शिवसेना बरकरार रख पाएगी या फिर राज ठाकरे की मनसे को वो दर्जा मिल जाएगा, जो बाला साहेब के समय में शिवसेना के पास रहा।
बाला साहेब जाने से पहले कार्यकर्ताओं से कह गए थे कि वे उनके बेटे उद्धव ठाकरे को वैसा ही प्यार दें जैसा उन्हें दिया करते थे। इससे उनकी इच्छा साफ है, लेकिन बात ये भी सच है कि बाल ठाकरे जाने से पहले राज की ताकत को सलाम कर चुके थे।
वैसे देखा जाए तो इस सवाल का जवाब खुद बाल ठाकरे ने विभिन्न मौकों पर भाषण, इंटरव्यू और सामना में लिखे अपने संपादकीय के जरिये पहले ही दे दिए थे...
शिवसेना खत्म हो जाएगी?
'मैं अब थक गया हूं। यह गांधी परिवार नहीं है, जिसे मैंने आप पर लादा हो। इसलिए कहता हूं, शिवसेना को संभालो। उद्धव को संभालो। यह आपकी पार्टी है।' ठाकरे ने यह बात इसी दशहरे पर एक रिकॉर्डेड संदेश में शिवसैनिकों से कहा था।
उद्धव संभाल लेंगे शिवसेना?
उद्धव पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष हैं लेकिन उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है आक्रामक न होना, जबकि शिवसेना की पहचान ही आक्रामकता है। पार्टी में ऐसे कई नेता हैं जो उद्धव का नेतृत्व शायद न स्वीकार करें। फिर, वह बीमार भी रहते हैं। संगठन को एकजुट रखना बीमार उद्धव के लिए आसान नहीं होगा।
क्या राज शिवसेना में लौटेंगे?
'राज, तुम जहां भी हो, फौरन मुंबई लौटो। उद्धव की तबियत खराब है। वह हॉस्पिटल में भर्ती है। उसे तुम्हारी जरूरत है।' 19 जुलाई को उद्धव की तबियत बिगडऩे पर बाल ठाकरे ने राज को फोन किया। इसके बाद से राज और उद्धव के बीच दूरियां कम हुई हैं।
क्या भाजपा से रिश्ते बने रहेंगे?
'राजनीति में रिश्ते कभी स्थायी नहीं होते। रिश्तों का चित्रण कैनवास के हिसाब से तय होता है।' अगस्त में बाला साहेब ने सामना अखबार में अपनी संपादकीय में कहा था।