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नेताजी की फाइलें सार्वजनिक होने से किसका दिल टूटा?

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आखिरकार नेताजी सुभाष चंद्र बोस से संबंधित गोपनीय दस्तावेज लोगों के सामने आ ही गए।चौंसठ फाइलों की एक खेप पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार ने सितंबर 2015 में इंटरनेट पर डाली थी। अब नरेंद्र मोदी की सरकार ने दिल्ली में 100 फाइलों का पुलिंदा सार्वजनिक कर दिया है।
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मोदी सरकार ने यह भी आश्वासन दिया है कि हर महीने 100 फाइलें इंटरनेट पर डाली जाएँगी। पिछले साठ सालों से यह मान्यता बनी रही है कि नेताजी कहीं छुपे हुए हैं या फिर उन्हें किसी ने छिपा रखा है। सबसे पहली बात तो यह थी कि अनेक लोग यह मानने को तैयार ही नहीं थे कि नेताजी जैसे हीरो का अंत इतना सामान्य होगा।

अगस्त 1945 में, बंबई से छपने वाले 'टाइम्स ऑफ इंडिया' में हवाई दुर्घटना की खबर छपी थी। सूत्रों के हवाले से बताया गया था कि ताइवान के फौजी हवाई अड्डे पर सुभाष बाबू अपने दो खास लोगों के साथ पहुँचे। जापानी फौज इस इलाके को छोडकर पीछे हटे और अंग्रेज फौज यहाँ कब्जा करे, इसके पहले ही सुभाष बाबू को सुरक्षित स्थान पर भेजा जाना जरूरी था।
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इस सूचना के बाद आईएनए में आ गई जान

स्थानीय जापानी फौज के कमांडर ने सुभाष बाबू के लिए एक छोटा फौजी विमान उपलब्ध कराया। विमान में दो और जापानी अफसर भी जा रहे थे। सो नेताजी के साथ उनका एक ही साथी, हबीब उर रहमान जा सका। हवाई जहाज उडने के साथ ही डगमगाया, वापस जमीन पर उतरा और उसमें आग लग गई।

अंदर बैठे लोग बाहर भागे। बाकी लोग तो बच गए पर बाहर निकलते-निकलते सुभाष बाबू का बदन काफी झुलस गया। उनके साथियों ने उन्हें अस्पताल पहुँचाया, लेकिन अगले दिन वे चल बसे। पास ही में उनकी अंत्येष्टि कर दी गई और अस्थियों को सादर सहेज कर टोक्यो रवाना कर दिया गया।

फिर दिसंबर 1945 में आईएनए के कुछ लोगों ने बात फैलाई कि उन्होंने सुना है कि चीन के रेडियो पर नेताजी सुभाष बोस बोलेंगे। सरकार के गुप्तचरों की लाख कोशिश के बाद भी उन्हें यह प्रसारण सुनने को नहीं मिला। न ही यह पता चल सका कि क्या किसी ने भी इसे सुना हो। पर आईएनए के पूर्व सैनिकों को मानो नई जान मिल गई।

सुभाष बाबू अब भी हमारे बीच हैं, यह कहानी धीरे-धीरे तूल पकडने लगी। सच जानने के लिए सरकार ने जुलाई 1946 में कर्नल जॉन फिगेस को हिदायत दी कि वे सच का पता लगाएँ। काफी जाँच-पडताल के बाद फिगेस ने नेताजी के मौत हो जाने की खबर की पुष्टि की। पर हिंदुस्तान में कई लोग ऐसे थे जिनका दिल नहीं माना।

आने लगी मांग की नेहरू सरकार सुभाष बाबू को खोज ले

देश की स्वतंत्रता के बाद माँग आने लगी कि नेहरू सरकार सुभाष बाबू को खोज निकाले। बोस परिवार के कुछ लोग भी इस माँग का समर्थन करने लगे। जब सरकार ने थोडी आना-कानी की तो यह कहा जाने लगा कि भारत की सरकार ही कुछ छिपाने में लगी है। अपनी जान बचाने के लिए सरकार ने जाँच आयोग बैठा दिया।

पहले एक, फिर दूसरा, फिर तीसरा। हर जाँच आयोग के सामने कुछ नई अफवाहें सबूत के तौर पर पेश की जाती रहीं।शाहनवाज आयोग के सामने जैसे यह कहा गया कि नेताजी को संयुक्त राष्ट्र ने युद्ध अपराधी का दर्जा दिया है। संयुक्त राष्ट्र युद्ध अपराध आयोग दुनिया भर के युद्ध अपराधों पर नजर रखता है, उसने सुभाष बाबू के बारे में ऐसा कुछ नहीं कहा था।

पर नेताजी के बारे में एक और अफवाह ने जन्म ले लिया था।यदि एक आयोग नेताजी के चल बसने की पुष्टि करता तो दूसरा कहता कि इसके बारे में जब तक ठोस सबूत ना आ जाएं तब तक कुछ भी कहना ठीक नहीं। इस बीच बात से बात उलझती गई और नेताजी के मौत की कहानी ज्यादा से ज्यादा रहस्यमयी बनती गई।
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अपने ही जाल में उलझती गई सरकार

आने वाले सालों में कई लोग यह शक करने लगे कि शायद भारत सरकार ही कुछ छिपा रही है। भारत सरकार अपने ही गोपनीयता के जाल में उलझती चली गई। फिर एक समय आया जब लोग यहाँ तक कहने लगे कि शायद सरकार का तंत्र कांग्रेस के नेताओं के काले कारनामे छिपाने में लगा है।

संदेह हुआ कि जरूर नेहरू ने सुभाष बाबू के साथ कुछ गडबड किया है तभी नेताजी से संबंधित कागजात छिपाए जा रहे हैं। अब जब वे गोपनीय दस्तावेज प्रकाशित होने लगे हैं तो बहुत सारे लोगों का दिल टूटा। वे आस लगाए बैठे थे कि गोपनीय दस्तावेजों से सुभाष बाबू की रहस्यमय गुमशुदगी की कहानियों के बारे में कुछ नया जानने को मिलेगा, और कुछ नहीं तो यही पता चलेगा कि कांग्रेस पार्टी क्यों कर इतने सालों से इन कागजात को छुपा कर रखना चाह रही थी।

ऐसा ना हुआ। हुआ यह कि इन फाइलों में छुपे राज कुछ इतने बेमानी निकल रहे हैं कि अब लोग इस सोच में पड गए हैं कि आखिर 60 सालों तक सरकार ने इन्हें क्यों गोपनीय रखा?इन दस्तावेजों से यह जरूर साबित हो गया कि भारत के नौकरशाह रहस्य गढने में माहिर हैं।

जहाँ कुछ भी छुपाने की बात न थी वहाँ ये दफ्तरी शेर इस तरह की गोपनीयता बरतने लगे कि लोगों को शक होने लगा कि कोई षड्यंत्र रचा जा रहा है।यह कहना गलत न होगा कि जब लोगों का तात्कालिक सरकार से विश्वास उठना शुरू हुआ तो उसमें इस तरह की फालतू गोपनीयता ने भी जरूर योगदान दिया होगा। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)
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