नरेंद्र मोदी की ताजपोशी के बाद से ही कोपभवन में गए भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी एक समय खुद भी मोदी के बड़े प्रशंसक रहे हैं। गुजरात दंगों के दौरान वह आडवाणी ही थे, जो मोदी के लिए ढाल बनकर खड़े रहे थे।
मोदी का विरोध कर आडवाणी खुद को एक धर्म निरपेक्ष विकल्प के रूप में पेश करने में कितने कामयाब होंगे, यह तो समय ही बताएगा।
मगर पांच साल पहले जब उन्होंने अपने दिल की बात अपनी आत्मकथा ‘मेरा जीवन मेरा देश’ में उड़ेली थी, तो पूरा एक अध्याय उन्होंने गुजरात सांप्रदायिक हिंसा को समर्पित किया था।
इसमें उन्होंने साफ तौर मोदी को क्लीन चिट देते हुए माना था कि नरेंद्र मोदी योजनाबद्ध दुष्प्रचार अभियान के शिकार रहे हैं।
इस पुस्तक में गुजरात संबंधी अपने लेख में आडवाणी ने लिखा है, ‘मैंने पार्टी के भीतर विभिन्न मंचों पर नरेंद्र मोदी के त्यागपत्र के लिए की गई मांग का भी विरोध किया। हमें इस बात की खुशी है कि बाद के घटनाक्रम ने उनमें मेरे विश्वास को पूरी तरह सही सिद्ध किया।’
मोदी को निष्ठावान, साहसी और समर्थ नेता बताते हुए उन्होंने लिखा कि लोगों के समर्थन से दुष्प्रचार के निजी अभियान को पराभूत किया जा सकता है।
गुजरात में मोदी को मिलने वाली जीत के आधार पर आडवाणी ने कहा, ‘मैंने पिछले साठ वर्षों के दौरान भारतीय राजनीति में ऐसा कोई नेता नहीं देखा, जिसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर निरंतर इतने घृणित तथा अनैतिक रूप से बदनाम किया गया हो, जितना मोदी को वर्ष 2002 से किया गया। सोनिया गांधी ने तो सारी मर्यादाएं तोड़कर उन्हें ‘मौत का सौदागर’ तक कह दिया। मुझे खुशी है कि गुजरात के लोगों ने ऐसी विषैली राजनीति करने वालों को सटीक उत्तर दिया।’
इतना ही नहीं, मोदी के नेतृत्व में गुजरात की जीत को आडवाणी ने भाजपा की संसदीय चुनावों में विजय हासिल करने का निर्णायक बिंदु भी बताया था।
उनका कहना था, ‘हमारे देश में विभिन्न राज्यों में विधानसभा चुनाव होते रहते हैं। लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में किसी राज्य विशेष में जनता का फैसला निर्णायक बिंदु बहुत कम बनता है। मुझे तनिक भी संदेह नहीं है कि गुजरात में हमारी पार्टी की जीत वास्तव में एक निर्णायक बिंदु बनेगी क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा का पुनरुत्थान होगा और उसे विजय प्राप्त होगी।’