राजनीति में सत्ता साध्य है या साधन, ये एक अलग बहस का मुद्दा है लेकिन इतना ज़रूर है कि ये वो चीज़ है जो अपने आस-पास मौजूद लोगों को बांधे रखती है। सत्ता रहती है तो समर्थक साथ में रहते हैं और सब कुछ सही ही लगता है लेकिन ज्यों ही सत्ता गई कि चीज़ें अचानक से बदल जाती हैं।
विज्ञापन
सोलहवीं लोकसभा में सत्ता के हाशिए पर धकेल दी गई कांग्रेस पार्टी के साथ कमोबेश कुछ ऐसा ही हो रहा है। 'परिवार ही पार्टी है और पार्टी में परिवार के इतर कुछ भी नहीं' का भाव कमज़ोर पड़ता दिख रहा है। सुविधा और दुविधा की राजनीति में फंसी कांग्रेस पार्टी के हाल का जायज़ा ले रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय
सौ साल पुरानी पार्टी
अवध के गांव-गिरांव में एक क़िस्सा अक्सर कहा-सुना जाता है। क़िस्सा यूं है... दो दोस्त आपस में बात कर रहे थे। एक ने कहा, "हमरे बप्पा बहुत बहादुर रहे। एक दफ़ा शेर से भिड़ गए।"
विज्ञापन
दूसरे ने पूछा, "फिर काव भवा?" पहले ने कहा, "भवा काव, शेरवा चीर-फारि डारिस।" अवध की लंतरानी छोड़ दीजिए तो मूलतः यह कथा क्लिक करें साहस और दुस्साहस का फ़र्क़ बयान करती है। यह मात्र लफ़्फ़ाज़ी से आगे जाती है। उसे किसी माहौल पर जस-का-तस चस्पां किया जा सकता है।
भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर भी उसे हू-ब-हू देखा जा सकता है। सवा सौ साल पुरानी राजनीतिक पार्टी से लेकर साल भर पहले वजूद में आई सियासी जमात तक।
शेर और बप्पा
सबके पास बहादुर बप्पा हैं और सबके पास शेर हैं। विज्ञान से इतर यह संभवतः अकेला ऐसा सिद्धांत है, जिसका कोई अपवाद नहीं। सारे राजनीतिक दल-राष्ट्रीय से लेकर राज्य स्तर तक- इस पर अमल करते हैं। छिटपुट जमातें तो बनती ही इसी तरह हैं।
पहले शेर बनता है, फिर बप्पाओं की फ़ौज खड़ी होती है और एक व्यवस्थित जंगलराज चल निकलता है। सारे फ़ैसले शेर और बप्पा करते हैं। बाक़ी को कभी-कभार पूछ लिया जाता है। कुछ से छठे-छमासे, कुछ से पांच साल बाद।
इस सिद्धांत का दूसरा बड़ा आख्यान यह होता है कि एक राजनीतिक दल में शेर एक ही रहेगा। दूसरा शेर पैदा नहीं होने दिया जाएगा।
कांग्रेस पार्टी के समर्थक सुनिश्चित किया जाता है कि कोई बप्पा इतना बड़ा न हो कि शेर को चुनौती देने की स्थिति में आ जाए। राजनीतिक जंगल में शेर को पराजित-परास्त करना फ़िलहाल कल्पनातीत है। शेरों की शिनाख़्त इन जंगलों में बहुत आसानी से की जा सकती है।
उनका पता-ठिकाना सबको मालूम होता है लेकिन उस माँद में दाख़िल होने की हिम्मत विरले ही जुटा पाते हैं। शेर नागपुर में रहता है कि जनपथ पर, मुंबई में या पंजाब में या तमिलनाडु में, उसकी औक़ात हमेशा शेर की मानी जाती है।
चुनौती देना तो दूर
चुनौती देना तो दूर, किसी ने शेर की तरफ़ उंगली उठाई तो सारे बप्पा अचकचाकर टूट पड़ते हैं। पूरा रक्षाकवच खड़ा हो जाता है। जैसे उन्हें अहसास हो कि शेर नहीं होगा तो उनका जंगल भी नहीं रहेगा। शीराज़ा बिखर जाएगा।
शायद इसलिए, किसी अलिखित सिद्धान्त की तरह, शेर आपस में नहीं भिड़ते। सीधे तो बिलकुल नहीं। कुछ बप्पा गुर्रायें, तो गुर्रा लें। गाहे-बगाहे शेर दहाड़ लेता है। हमला करने के अंदाज़ में दो क़दम पीछे जाता है तो बस वहीं रुक जाता है।
तब सारे बप्पा अनुनय-विनय करके उसे मना लेते हैं और वह लौटकर अपने सिंहासन पर बैठ जाता है। शेर के बूढ़ा होने पर नया शेर खड़ा करने की सलाहियतें प्रायः उसकी औलादों में देखी जाती हैं, गुण-सम्पन्नता न हो तब भी।
बार-बार सियासी दंगल में पिट जाता हो, इसके बावजूद। दरअसल, शेरत्व पर सवाल उस वक़्त ज़्यादा उठते हैं जब वह पछाड़ खाने लगे। तब कई बप्पा मुँह खोलने लगते हैं।
इसमें शेर बनने की उम्मीद कम, यह भावना अधिक दिखती है कि वे गिरे शेर को एक लात लगा दें। इसे उनकी ज़ुबान में साहस कहा जाता है। आजकल, ख़ासतौर पर लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद, कांग्रेस पार्टी में यही हो रहा है।
कोई शेर को गीदड़ कहता है, कोई छुट्टी पर जाने की सलाह देता है तो कोई नया शेर तजवीज़ करने का इशारा। पार्टी के बप्पाओं की फ़ौज विभाजित है। तय नहीं कर पा रही है कि अपने शेर को पछाड़ना ठीक होगा या दूसरे शेर के पीछे लग जाना।
कुछ को लगता है कि शेर के पुराने साथी थके-चुके लोग हैं। उन्हें हटना चाहिए कि नए लोगों को बप्पागीरी का मौक़ा मिले। कांग्रेस पार्टी के सूत्रों की मानें तो इसी पर चर्चा के लिए एक बैठक होने को है। इसमें कुछ वर्तमान और कुछ भविष्य के बप्पा मिलेंगे।
यह इक्का-दुक्का बप्पाओं की भड़ास से भिन्न होगा लेकिन उनकी हुआँ-हुआँ कितनी अलग होगी, पता नहीं। वे मिलेंगे ज़रूर, लेकिन सामूहिक रूप से इस डर से ऊपर उठ जाएंगे कि शेर कहीं उन्हें चीर-फाड़ न डाले, इसपर संदेह है।
इतिहास उनके साथ खड़ा दिखाई नहीं देता। साहसी लोग इसकी परवाह कहां करते हैं! पर दुस्साहस? वे यक़ीनन नहीं करेंगे।