नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिजनों का दावा है कि राज्य सरकार के पास नेताजी से जुड़ी कुछ और फाइलें हो सकती हैं। हालांकि कोलकाता पुलिस ने इस दावे का खंडन किया है। नेताजी के परिजन चंद्र कुमार बोस और एक शोधार्थी डॉ. जयंत चौधरी का कहना है कि सरकार की अलमारियों में नेताजी से संबंधित कुछ और गोपनीय फाइलें हो सकती हैं।
उनका दावा है कि नेताजी की रहस्यमय गुमशुदगी की जांच करने वाले मुखर्जी आयोग के सामने पेश की गई कम से कम नौ फाइलें अब तक सार्वजनिक नहीं की गई हैं। बोस का कहना है कि अगर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की जानकारी में यह बात आती है, तो वह इन फाइलों को भी सार्वजनिक कर सकती हैं, क्योंकि उनको इससे कोई नुकसान नहीं होगा।
नेताजी चेतना मंच के डॉ. जयंत चौधरी का दावा है कि अभी कम से कम 12 फाइलें सार्वजनिक नहीं की गई हैं। इन फाइलों में साल 1941-42 के दौरान क्रांतिकारियों की गतिविधियों का ब्योरा है। वहीं, दूसरी ओर कोलकाता पुलिस के आयुक्त सुरजीत कर पुरकायस्थ का कहना है कि नेताजी से संबंधित तमाम गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक कर दिया गया है। सरकार के पास अब ऐसी कोई भी फाइल नहीं है।
दो लाख लोग विस्थापित
वहीं पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से आजादी से पहले हुई मंत्रिमंडल की बैठकों से संबंधित दस्तावेजों से उस दौर की राजनीतिक तस्वीर सामने आती है। इनसे पता चलता है कि विभाजन की ओर बढ़ रहे देश में प्रशासन के समक्ष कैसी चुनौतियां थीं।
24 अगस्त 1946 को हुई ऐसी एक बैठक में सांप्रदायिक तनाव के बीच ईद के त्योहार के करीब आने पर चिंता जताई गई है। आजादी के साल भर पहले करीब दो लाख लोग विस्थापित हो चुके थे।
उस समय पलायन इतने बड़े पैमाने पर हो रहा था कि एक बारगी लगने लगा था कि कुछ पेशे एवं कारोबार महानगर से गायब ही हो जाएंगे। पूर्वी और पश्चिमी बंगाल में दंगे और लूटपाट की घटनाएं आम हो गई थीं। दोनों ओर बहुसंख्यक आबादी लूटपाट और अत्याचार में जुटी थी।
भड़के थे दंगे
राइटर्स बिल्डिंग में सुबह 10 बजे शुरू हुई इस बैठक में बंगाल के
गवर्नर प्रेडरिक जान बोरो ने सांप्रदायिक तनाव को ध्यान में रखते हुए ईद के
दौरान सुरक्षा बरतने की सलाह दी थी। तब राजधानी में धारा 144 लागू थी।
अल्पसंख्यकों को नमाज पढ़ने के लिए सुबह छह बजे से दोपहर तक इसमें छूट दी
गई थी।
एचएस सोहरावर्दी की अगुवाई वाले मंत्रिमंडल ने लोगों को नमाज के लिए
पांच-पांच के समूह में जाने की अनुमति दी थी। जुलूसों पर भी पाबंदी लगा दी
गई थी। ईद के दौरान संवेदनशील इलाकों में पुलिस एवं सेना के जवानों को
तैनात करने का भी फैसला किया गया था।
उस साल मंत्रिमंडल की बैठक से कई
सप्ताह पहले 16 अगस्त की रात को बड़े पैमाने पर दंगे भड़के थे। हिंसा बढ़ते
देख सोहरावर्दी ने रात को दो बजे सेना उतारने का फैसला किया था। डर और
आतंक के चलते लोगों ने घरों से बाहर निकलना बंद कर दिया था। करीब दो लाख
लोगों ने डेढ़ सौ शरणार्थी शिविरों में शरण ले रखी थी। राहत सचिव सिरिल
गर्नर ने बेघरों की सहायता के लिए सस्ती राशन दुकानें खोलने और सस्ता चावल
सप्लाई करने की सलाह दी थी, जिसे सरकार ने मान लिया था। (फाइल फोटो)
था मतभेद
दस्तावेजों से
पता चलता है कि हालात से निपटने के तरीकों पर ब्रिटिश एवं भारतीय
अधिकारियों में मतभेद भी था। मंत्रियों को यह समझ में नहीं आ रहा था कि
आखिर दो दिनों तक पुलिस को पूरी तरह बैरकों में क्यों भेज दिया गया था?
हालात बेकाबू होने के बाद ही जवानों को दोबारा सड़कों पर उतारा गया था।
लेकिन बोरो ने इस पर चर्चा करने की बजाय तमाम मंत्रियों को राहत उपायों पर
ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी थी।
उस समय शुरू हुई हिंसा देश के आजाद
होने तक जारी रही। यही वजह रही कि उसके बाद हुई मंत्रिमंडल की 44 बैठकों
में से हर बैठक में हिंसा के मुद्दे पर चर्चा हुई।