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UPSC के खिलाफ छात्रों का आमरण अनशन

Sun, 13 Jul 2014 10:44 PM IST
दिलनवाज पाशा/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
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दिल्ली यूनिवर्सिटी के नॉर्थ कैंपस से सटे मुखर्जी नगर में छात्र आमरण अनशन पर बैठे हैं। इसकी वजह है संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की सिविल सेवा परीक्षा में सी-सैट की परीक्षा, जिसका हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं के छात्र विरोध कर रहे हैं।
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इसकी वजह है 2013 की परीक्षा में कामयाब हुए 1122 छात्रों में सिर्फ 26 हिंदी माध्यम के हैं।

छात्र इसके लिए 2011 में लागू हुई सी-सैट परीक्षा प्रणाली को जिम्मेदार मानते हैं। उनके आंदोलन को सियासी समर्थन भी मिल रहा है।

पढें, संवाददाता की रिपोर्ट विस्तार से..

मुखर्जी नगर के बॉयज हॉस्टल के दस गुणा आठ फीट के कमरे में बैठे जॉली मित्तल किताबों और कपडों के बीच पढने की कोशिश कर रहे हैं। परीक्षा के नए स्वरूप ने जॉली जैसे छात्रों के लिए सफलता के रास्ते सीमित कर दिए हैं।

हिंदीभाषी छात्र मानते हैं कि सी-सैट परीक्षा अंग्रेजी माध्यम में इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की पढाई करने वाले छात्रों के लिए ज्यादा अनुकूल है।

गिरती छात्र संख्या

2013 की सिविल सेवा परीक्षा में सफल हिंदी छात्रों का प्रतिशत मात्र 2.3 ही है। जबकि 2003 से 2010 के बीच ऐसे छात्रों का प्रतिशत हमेशा 10 से ज्यादा रहा है। 2009 में यह प्रतिशत 25.4 तक था।

हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में परीक्षा देने वाले छात्र इसके लिए सी-सैट परीक्षा प्रणाली को जिम्मेदार मानते हैं।

नीलोत्पल निडाल और पवन कुमार पांडेय सी-सैट हटाने की मांग को लेकर आमरण अनशन पर हैं।

हिन्दी भाषियों के साथ साथ भेदभाव

आंदोलन में शामिल छात्र चितरंजन कुमार कहते हैं, "अंग्रेजी में बनाए गए पेपर का अक्सर बेहद जटिल और भ्रामक हिंदी अनुवाद किया जाता है। मानक उत्तर पुस्तिका भी सिर्फ अंग्रेजी में ही बनती है। इन्हें सरल किया जाना चाहिए।"

उनका कहना है कि यूपीएससी साक्षात्कार के दौरान छात्रों को अंग्रेजी में जवाब देने के लिए मजबूर करती है। तर्क दिया जाता है कि सिविल सेवा परीक्षा में कौशल और प्रतिभा के दम पर कामयाबी मिलती है।

अनशन पर बैठे नीलोत्पल निडाल कहते हैं, "सवाल कौशल या प्रतिभा का नहीं, मुद्दा अभ्यास की पृष्ठभूमि का है। मानविकी या कला वर्ग के छात्रों के लिए सी-सैट परीक्षा इसलिए मुश्किल है क्योंकि यह उनकी पृष्ठभूमि पर आधारित नहीं है। अंग्रेजी और गणित के छात्रों के लिए आसान है क्योंकि वे हमेशा से इसी में अभ्यास करते रहे हैं। यह समान अवसर के सिद्धांत के खिलाफ है। ज्ञान को कसौटी बनाने के बजाय अभ्यास के तरीके को कसौटी बना दिया गया है।"

ग्रामीण छात्रों की मुश्किलें

आंकडे बताते हैं कि सी-सैट से पहले मुख्य परीक्षा में बैठने वाले छात्रों में हिंदी और अन्य भाषाओं के छात्रों का प्रतिशत 40 से ज्यादा होता था, जबकि सी-सैट के बाद इसमें भारी गिरावट आई है।

2011 में मुख्य परीक्षा में बैठने वाले कुल छात्रों में से 82.9 प्रतिशत अंग्रेजी के थे। 2012 में यह संख्या 81.8 प्रतिशत थी। इसीलिए हिंदी और दूसरी भाषाओं के छात्र इसे अपने साथ अन्याय मानते हैं।

यूपी के एक गांव से तैयारी करने दिल्ली आए पंकज कुमार बताते हैं, "गरीब परिवार अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल नहीं भेज पाते। न वे उन्हें इंजीनियरिंग या मेडिकल की महँगी शिक्षा दे पाते हैं। वे उन्हें सिविल सेवा परीक्षा के लिए प्रेरित करते हैं, पर सी-सैट ने इसे भी मुश्किल कर दिया है।"
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यूपीएससी समिति ने माना

यूपीएससी की निगवेकर समिति ने 2012 में अपनी रिपोर्ट में छात्रों के इन तर्कों को स्वीकारा था। रिपोर्ट में कहा गया था कि सी-सैट परीक्षा शहरी क्षेत्र के अंग्रेजी माध्यम के छात्रों को फायदा पहुंचाती है।

सी-सैट हटाओ आंदोलन को अब सियासी समर्थन भी मिल रहा है। समाजवादी पार्टी सांसद धर्मेंद्र यादव ने इसे संसद में शून्यकाल के दौरान उठाया है।
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