उत्तर प्रदेश के माध्यमिक विद्यालयों एवं डिग्री कॉलेजों के शिक्षकों की भर्ती, घोटाले की भेंट चढ़ गई है।
आरोप के घेरे में आने के बाद उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड एवं उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग से पिछले छह वर्षों से कोई भर्ती नहीं हो सकी है, जबकि इन दोनों आयोगों के अधिकारियों, कर्मचारियों, अध्यक्ष और सदस्यों के वेतन पर हर महीने कई लाख रुपये खर्च होते हैं।
शिक्षकों की लगातार भर्ती नहीं होने से प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह से पटरी से उतरी हुई है। इतना ही नहीं, इन दोनों भर्ती आयोगों पर पदों के बेचने के आरोप भी लगे हैं।
चयन बोर्ड एवं उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग में अपनों का चयन नहीं कर पाने की दशा में भर्ती प्रक्रिया को प्रभावित करने की कार्रवाई लगातार जारी है। सरकार पर भी इन भर्ती आयोगों को मदद करने का आरोप लगा है। प्रदेश के माध्यमिक विद्यालयों में 2009-10 में टीजीटी-पीजीटी शिक्षकों की भर्ती के बाद से लगातार कोई पद नहीं भरा जा सका है।
आयोग के लोगों पर पदों के बेचने के लगे आरोप
वर्ष 2011 में उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड की ओर से टीजीटी-पीजीटी के लगभग चार हजार पदों की घोषणा की गई लेकिन पद अब तक नहीं भरे जा सके। इसी बीच 2013 में भी टीजीटी-पीजीटी के लगभग नौ हजार पद घोषित कर दिए गए।
यही हाल उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग का है, जिसमें 2009 के बाद कोई पद नहीं भरा जा सका है। इसके बाद घोषित विज्ञापन संख्या 44, 45 एवं 46 के तहत लगभग तीन हजार पदों पर भर्ती नहीं हो सकी है।
तत्कालीन अध्यक्ष पर उनके सचिव-उपसचिव ने लगाए आरोप
वर्ष 2012 में प्रदेश में नई सरकार के गठन के बाद उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड के पूर्व चेयरमैन को हटाकर सरकार ने 2013 में देवकीनंदन शर्मा को अध्यक्ष बनाया। कैंसर से उनके निधन के बाद का काल चयन बोर्ड के इतिहास में सबसे बदनुमा दाग रहा।
बोर्ड के कार्यवाहक अध्यक्ष डॉ. आशाराम यादव ने बोर्ड की तत्कालीन सचिव नीना श्रीवास्तव की असहमति के बाद भी मनमाने तरीके से प्रधानाचार्य का साक्षात्कार करवा दिया। इस दौरान तत्कालीन सचिव एवं उप सचिव सीएल चौरसिया ने उस दौर के अध्यक्ष सहित अन्य सदस्यों पर प्रधानाचार्य के साक्षात्कार के लिए तैयार सूची में हेराफेरी का आरोप लगाया।
आरोप-प्रत्यारोप के बीच अध्यक्ष पद पर आए डॉ. परशुराम पाल ने व्यवस्था को सु़धारने की कोशिश की जो सरकारी एजेंडे के खिलाफ था। ऐसे में सरकार ने सात महीने के भीतर ही उनसे इस्तीफा ले लिया।
अपनों के चयन के लिए बीच में बदला भर्ती का नियम
उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग पर भर्ती परीक्षा के बीच नियम बदलकर अपने लोगों तक लाभ पहुंचाने का आरोप भी लगा। अभ्यर्थियों ने आयोग की ओर से पहले 1652 पदों के लिए कराई गई भर्ती परीक्षा को प्रभावित करने का आरोप लगाया है।
मूल्यांकन से पहले उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैनिंग करके उनको कोषागार में सुरक्षित रखने के बाद मूल्यांकन को भेजने की बात थी परंतु आयोग की सहमति पर सरकार ने चार जून को इन दोनों नियमों को हटा दिया, इस प्रकार कॉपी के मूल्यांकन से पहले अपने लोगों को मनमाने तरीके से ओएमआर भरने का मौका दिया गया। इस तरह सरकार के इशारे पर पूरी परीक्षा प्रक्रिया को ही प्रभावित करने की कोशिश की गई।
भर्ती आयोग के अध्यक्ष-सदस्य भी काबिल नहीं
प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था के लिए योग्य शिक्षक चुनने की जिम्मेदारी पाने वाले अध्यक्ष एवं सदस्य की काबिलियत को लेकर सवाल खड़ा हो गया है।
पहले उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग और बाद में माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड के अध्यक्ष एवं सदस्य जिस पद का साक्षात्कार ले रहे हैं, उन्हें उस पद के योग्य न पाए जाने पर काम से रोक दिया गया। कोर्ट की ओर से रोके जाने के बाद भी सरकार ने जो अध्यक्ष भेजा, उन्हें भी मानक के अनुरूप नहीं बताया जा रहा है।
भर्ती आयोगों के कर्मचारियों-अधिकारियों की संपत्ति की जांच हो
प्रतियोगी छात्र उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड में अध्यक्ष एवं सदस्यों पर अपने भाई-बहन को बिना परीक्षा चयन कराने का आरोप लग चुके हैं। इसके साथ ही चयन बोर्ड के कुछ कर्मचारियों एवं अधिकारियों की संपत्ति की जांच करा ली जाए तो पता चल जाएगा कि यहां किस प्रकार से पदों को लाखों रुपये में बेचा जाता है। ऐसे ही आरोप उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग पर भी लगाए गए हैं।