यूपीए 2 ने आज सत्ता के चार साल पूरे कर लिए हैं। सरकार और कांग्रेस संगठन में खुशी का माहौल भले है, लेकिन उससे भी अहम सवाल सामने खड़ा है। अगले साल संभावित आम चुनाव में पार्टी के लिए उसकी उपलब्धियां काम आएंगी या फिर नाकामियों का पिटारा सरकार के शासन पर फुल स्टॉप लगा देगा, जानिए इस खास रिपोर्ट में।
नाकामियों का पिटारा
नेहरू मेमोरियल म्यूजियम व लाइब्रेरी की फेलो मनीषा प्रियम के मुताबिक यूपीए सरकार की कोई भी उपलब्धि नहीं। बकौल मनीषा, 'सदन के लिए जिस आत्मविश्वास की जरूरत होती है, वह मनमोहन सिंह में कतई नहीं है। उन्हें मौन मोहन सिंह कहना ज्यादा ठीक होगा।'
वह कहती हैं कि निर्भया कांड हो या कोलगेट, रैली व जुलूस 10 जनपथ की ओर ही निकाले गए। सवाल उठता है कि सत्ता की असली बागडोर किसके हाथ में है। रोजगार विहीन विकास हो रहा है। अगले 4-5 वर्षों में बेरोजगारी अपने चरम पर होगी। इसकी वजह केवल राजनीतिक कारण हैं।
वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई कहते हैं कि यूपीए-2 का राजनीतिक प्रबंधन बेहद खराब रहा। देशवासियों से संवादहीनता से भी सरकार की छवि खराब हुई। सरकार न सिर्फ नकारात्मक धारणा रोकने में विफल साबित हुई, बल्कि नैतिक साहस दिखाने में बुरी तरह नाकाम रही।
पूर्व वित्त सचिव सी. एम. वासुदेव के मुताबिक, अव्यवस्थित शासन के चलते निवेशकों का विश्वास बुरी तरह डगमगाया। घरेलू कंपनियां विदेश में तो निवेश कर रही हैं पर अपने घर में हिम्मत नहीं जुटा पा रही हैं।
बकौल वासुदेव, 'इससे आम आदमी भी मरा और खास भी। आम इसलिए क्योंकि उसके लिए जिंदगी बसर करना मुश्किल हो रहा है। और खास इसलिए क्योंकि उसकी कमाई स्थिर है और खर्च बढ़ता चला जा रहा है।'
वह कहते हैं कि जब 2009 में कांग्रेस को 200 से ज्यादा सीटें मिलने के बाद उम्मीद लगाई जा रही थी कि आर्थिक सुधारों की गाड़ी अब सरपट दौड़ेगी। पर इस मोर्चे पर सरकार ने काफी निराश किया।
कई आर्थिक फैसलों के पीछे राजनीति हावी रही। लोकलुभावनी योजनाओं और कई अहम विधेयक के पारित न होने के चलते अर्थव्यवस्था का घाव नासूर बनता चलता गया।
एक नजर उपलब्धियों पर भी
राशिद किदवई की नजर में प्रधानमंत्री का स्वच्छ व्यक्तित्व बड़ी उपलब्धि है। वह इसे भी पार्टी की खूबी मानते हैं कि राहुल-सोनिया की ओर से सीधे दखलंदाजी नहीं होती। इसके अलावा, आर्थिक सुधार के साथ लोक-कल्याणकारी कार्यक्रमों को वह यूपीए की बड़ी उपलब्धि के रूप में देख रहे हैं।
सी. एम. वासुदेव कहते हैं कि खुदरा बाजार में एफडीआई के मामले पर कितना भी हंगामा क्यों न बरपा हो, पर सरकार का यह कदम किसानों और आम उपभोक्ताओं दोनों के लिए बेहतर साबित होगा। निजी कंपनियां कोल्ड स्टोरेज बनाएंगी तो फल और सब्जियों की भयानक बरबादी रुकेगी।
बकौल वासुदेव, तमाम उठापटक के बावजूद यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। आर्थिक हालात के लिए इसे एक सकारात्मक कदम माना जाना चाहिए।
वासुदेव मानते हैं कि गांव-देहात को ध्यान में रखते हुए बनाई गई योजनाएं भले ही ज्यादा सफल न रही हों, लेकिन इस हकीकत से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि ग्रामीण इलाकों में धन का प्रवाह बढ़ा। ग्रामीण इलाकों में स्थित बैंकों में जमा होने वाले धन में इजाफा हुआ है, जिससे इस बात की पुष्टि होती है।
इतना नहीं नहीं, वह यह भी कहते हैं कि मजबूरी में ही सही पर सब्सिडी कम करने के लिए सरकार की तरफ से उठाए गए कदम अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए फायदेमंद साबित होंगे। आने वाले वक्त में इसके नतीजे दिखने लगेंगे।