आठ साल की बच्ची से बलात्कार करने वाले चार बच्चों के बाप पर किसी तरह का रहम नहीं किया जा सकता।
उसका बच्चों की दुहाई देना महज फरेब है। यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने एक आरोपी की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए की।
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि आरोपी ने आठ साल की बच्ची के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया है। ऐसे में उसकी सजा को कम नहीं किया जा सकता।
जस्टिस बीएस चौहान और जस्टिस दीपक मिश्र की पीठ ने पूर्वी दिल्ली के कल्याणपुरी इलाके में दस साल पहले हुई वारदात के मुजरिम श्याम नारायण की उम्रकैद की सजा बरकरार रखते हुए महिलाओं के साथ हो रहे यौन अपराधों पर गहरी चिंता जताई।
पीठ ने कहा कि अपराधी का आतंक इतना भयानक था कि वारदात के तुरंत बाद बच्ची अपने मां-बाप को सच्चाई भी नहीं बता सकी। घटना के बाद उसने डॉक्टर से कहा कि टॉयलेट में गिरने के कारण उसे चोट आई है।
लेकिन डॉक्टर ने उसकी बात पर यकीन नहीं किया। घटना के दस दिन बाद वह अपनी मां को सच बताने का साहस जुटा सकी।
इस कारण 29 अक्तूबर, 2003 को हुई वारदात की एफआईआर 10 नवंबर को दर्ज हो सकी। सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर दर्ज करने में देरी को जायज ठहराया।
अदालत ने कहा कि आठ साल की बच्ची को इस कदर धमकाया गया था कि वह अपने माता-पिता के सामने भी सच बोलने का साहस नहीं कर पाई।
मुजरिम ने उसे अपनी हवस का शिकार बनाते समय धमकी दी थी कि अगर उसने घटना की जानकारी किसी को दी तो उसे तथा उसके परिवार के सदस्यों को तबाह कर दिया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुजरिम बेहद शातिर है। घटना के बाद वह बच्ची को पहले लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल और फिर जीटीबी अस्पताल भी ले गया। उसका आखिर तक यह प्रयास रहा कि बच्ची सच न बता सके।
आरोपी को आजीवन कारावास के बजाए आईपीसी की धारा 376 के तहत न्यूनतम निर्धारित दस साल की सजा देने की दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आठ साल की बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाकर गुनहगार ने खुशहाल जीवन की उसकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
बलात्कार भयावह अपराध है। पीड़ित इस अपराध की भयावहता से जीवन भर उबर नहीं पाता। इसलिए दरिंदे पर दया का सवाल ही नहीं उठता।