जब अतीत की यादें आती हैं, तो दर्द भी पैदा करती हैं। यही वजह है कि भारी संख्या में लोग एचएमटी घड़ियों की दुकानों के सामने कतार लगाए लगाए हुए हैं और एक दो नहीं बल्कि कई घड़ियां खरीद रहे हैं, खासकर हाथ से चाबी भरने वाली घड़ियां।
बेंगलुरू में पिछले दो दिनों में ही एचएमटी घड़ियों की बिक्री में तीन से चार गुना बढ़ोत्तरी हो गई है। यह वही शहर है जहां 53 वर्ष पहले कभी सार्वजनिक क्षेत्र की इस कंपनी ने अपनी पहली फैक्ट्री लगाई थी। और सही मायनों में यह तब तक 'देश का वक्त' बनी रही, जब तक निजी कंपनियों के आगे इसने हथियार नहीं डाल दिए।
एचएमटी घड़ियाँ इकट्ठा करने वाले इतिचंदा पोनप्पा ने बीबीसी हिंदी को बताया, ''लोगों को जागरूक करने के लिए कि एचएमटी अभी जिंदा है, तीन सौ सदस्यों वाला एक फेसबुक पेज बनाया गया था, जिसमें ब्रिटेन के भी सदस्य थे। लोग पहले ही मान बैठे थे कि यह कंपनी बंद हो चुकी है''।
चाहने वालों को झटका
इसीलिए, जब केंद्र सरकार ने पिछले हफ्तें इसे बंद करने का निर्णय लिया तो किरण बाबू जैसे दुकानदार में भी ग्लानि पैदा हो गई।
बाबू कहते हैं, ''जब मैंने अखबारों में खबर पढ़ी तो मुझे बहुत दुख हुआ। हमने बीते सालों में एक भी एचएमटी घड़ी नहीं खरीदी थी। मैंने अपनी दुकान बंद की और मैं चाबी से चलने वाली घड़ी खोजने निकल पड़ा। एक घड़ी के लिए मैंने 200 रुपए अधिक दिए''।
पोनप्पा के पास 650 एचएमटी घड़ियों का कलेक्शन है जिसमें नब्बे प्रतिशत हाथ से चाबी वाली घड़ियाँ हैं। कुछ और घड़ियां पाने की चाहत में वह बेंगलुरू के केंद्र में स्थित एचएमटी शोरूम के आस-पास मंडरा रहे थे। चाबी वाली घड़ियों में ऐसा क्या है?
एचएमटी घड़ियों के शौकीन
इतिचंदा पोनप्पा एचएमटी घड़ियां इकट्ठा करने के शौकीन हैं और उनके पास ऐसी 650 घड़ियां हैं पोनप्पा कहते हैं, ''एक घड़ी की अहमियत समय से ज्यादा होती है। ऐसी एक घड़ी में 120 पुर्जे होते हैं।
आपने यदि इन्हें अलग कर दिया तो फिर आप इन्हें जोड़ नहीं पाएंगे। एक आम आदमी के लिए यह बहुत ही जटिल होता है। यही इसकी खासियत है। आपको इसकी चाबी 12 बार घुमानी पड़ती है और यह 24 घंटे चलती रहती है। इसकी टिक-टिक-टिक सुनना भी बहुत दिलचस्प होता है''।
वह बहुत दुखी हैं, ''मुझे उन लोगों पर बहुत तरस आता है जो बहुत ही महंगी घड़ियाँ खरीदते हैं। एचएमटी घड़ियों को मैं उनकी सादगी के लिए पसंद करता हूं''।