मोदी सरकार ने सफलतापूर्वक अपना एक साल पूरा कर लिया, पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आए मोदी को शायद ही बीते साल में किसी बड़ी मुश्किल से जूझना पड़ा हो। एकता के अभाव में छितराया विपक्ष तो सालभर में मोदी सरकार के सामने कोई बड़ी चुनौती ही पेश नहीं कर सका।
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हालांकि इस दौरान कुछ ऐसे वाकये जरूर सामने आए जब मोदी अपनों के कारण कई बार कभी घिरते तो कभी जूझते नजर आए। उनके कुछ अपने ही सालभर उनकी राह में कांटे बिछाते रहे। उन पर यह आरोप भी लगे कि वो ऐसे लोगों को शह दे रहे हैं जो देश की अखंडता और साम्प्रदायिक सद्भाव को पलीता लगाने का काम कर रहे हैं।
ऐसे मुद्दों पर मोदी की चुप्पी पर रह रह कर सवाल उठते रहे। मुद्दों के अभाव में जूझते विपक्ष को भी ऐसे लोगों ने बैठे बिठाए मुद्दे दिए तो संसद की कार्यवाही भी कई बार इसके चलते ठप रही।
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चाहे वो घर वापसी जैसा संवदेनशील मुद्दा हो जिसमें उनके मातृ संगठन आरएसएस पर सवाल उठे या फिर कश्मीर में साम्प्रदायिक पार्टी कही जाने वाली पीडीपी के साथ गैर पारपंरिक या बेमेल कहा गया गठजोड़। मोदी सरकार का सालभर पूरा होने पर जानिए ऐसे ही पांच कारणों के बारे में जिन्होंने मोदी की उपलब्धियों की चमक को कुछ फीका किए रखा।
संघ की 'घरवापसी' पर बेबस दिखे मोदी
ठीक-ठाक काम कर रही मोदी सरकार कुछ दिनों पहले अचानक उस समय मुसीबतों में घिरती नजर आई जब उनके मातृसंगठन के विवादास्पद घर वापसी कार्यक्रम के कारण सारा देश उनकी ओर सवालों पर भरी निगाहों से देखने लगा।
आगरा की मुस्लिम बस्ती से शुरू हुआ यह सिलसिला देशभर में कई शहरों में तनाव की वजह बन गया। मुद्दे के अभाव से जूझ रहे विपक्ष को भी मुद्दा मिला तो संसद की कार्यवाही भी कई दिन इसी की भेंट चढ़ गई।
हालांकि पानी सिर से ऊपर चढ़ता देख मोदी को सामने आकर इस मुद्दे पर बयान देकर सरकार और अपनी स्थिति स्पष्ट करनी पड़ी। बात यहीं पर खत्म होती तो बस था, लेकिन भाजपा के हर कामकाज पर निगाह रखने वाला आरएसएस इस दौरान सरकार की नीतियों और कामकाज में अपना हस्तक्षेप करने से भी पीछे नहीं रहा।
गुजरात में शासन के दौरान संघ की राज्य इकाई का कद घटाने वाले मोदी इस मामले में राष्ट्रीय स्तर पर असहाय नजर आए। आरएसएस मुखिया मोहन भागवत के एक के बाद एक दिए कई विवादास्पद बयानों से सालभर मोदी और उनकी सरकार जैसे-तैसे पिंड छुड़ाने में ही लगी रही।
संघ और उसके अनुषांगिक संगठन जहां केन्द्र की भाजपा सरकार को पहली हिंदू सरकार बताकर छाती चौड़ी करने में लगे रहे वहीं मोदी कभी चुप्पी साधकर इस पर मौन सहमति तो कभी बड़ा बयान देकर इसका विरोध करने का प्रयास करते दिखे।
शिवसेना ने हर कदम पर ली मोदी की परीक्षा
केन्द्र में सत्तारूढ़ एनडीए का सबसे पुराना घटक शिवसेना अपने बदले तेवरों के चलते लगातार मोदी के लिए सालभर मुसीबत का सबब बनता रहा। मोदी के प्रचंड़ बहुमत में अपना वजूद खोजते शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे मोदी पर गठबंधन सहयोगियों के अपमान का आरोप लगाते रहे तो मौन मोदी की तरफ से मोर्चा उनके सिपहसलार अमित शाह ने संभाला।
महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में तनातनी इस कदर बढ़ी की कभी सबसे विश्वस्त कहे गए दोनों सहयोगियों को अपनी राह अलग करने में जरा भी देर नहीं लगी। इसके बाद शिवसेना बेशक केन्द्र सरकार में बनी रही और प्रदेश में भाजपा को भी समर्थन भी दिया लेकिन मनों में आई खटास दूर नहीं हो पाई।
शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे आज भी किसी भी मौके पर मोदी सरकार की खिंचाई करने से नहीं चूकते। कश्मीर के प्रमुख अलगाववादी मसर्रत आलम के मुद्दे पर तो शिवसेना कई बार विपक्ष की तरह मोदी सरकार को घेर चुकी है।
वहीं फसलों की तबाही और किसानों की आत्महत्या जैसे संवेदनशील मुद्दे पर शिवसेना लगातार भाजपा और मोदी की राह मुश्किल कर रही है।
पीडीपी से गठबंधन और मसर्रत की रिहाई पर घिरते रहे मोदी
मुस्लिम बहुल और अति संवदेनशील राज्य जम्मू कश्मीर में पहली बार कमल खिलाने के लिए मोदी और उनके खासमखास अमित शाह ने पूरी जी जान झोंक दिया, बावजूद इसके भाजपा घाटी में बहुमत से काफी दूर रह गई।
सत्ता के इतने करीब आकर उससे दूर रहने की कसक भाजपा के प्रदेश और शीर्ष नेतृत्व को लगातार चुभती रही, नतीजतन घाटी में एक ऐसे गठबंधन ने जन्म लिया जिसकी कुछ समय पहले तक कल्पना करना भी मुश्किल था।
भाजपा ने अलगाववादी समर्थक और पाक के प्रति नरम रुख रखने वाली पीडीपी से गठबंधन किया तो ऐसा लगा जैसे राजनीती के दो विपरीत ध्रुव एक साथ आ गए हों। माना जाता है इस गठबंधन के पीछे मोदी और अमित शाह की जिद ही थी जिसने किसी को विरोध करने का मौका भी नहीं दिया।
लेकिन मोदी का यह दांव शायद निशाने से चूक गया। पीडीपी प्रमुख मुफ्ती मोहम्मद सईद ने सत्ता में आते ही उन्हीं नीतियों को लागू करना शुरू कर दिया जिसके लिए वो जाने जाते हैं। सालों से जेल में बंद पाक परस्त अलगाववादी मसर्रत आलम को रिहा कर उन्होंने अपनी सहयोगी भाजपा के साथ ही मोदी की राह में भी कांटे बिछा दिए।
रिहाई के बाद से ही मसर्रत लगातार अपनी जहर उगलती तकरीरों से कश्मीर की फिजां बिगाड़ने का तो काम करता ही रहा उसने मोदी को भी विपक्षियों को भी निशाने पर ला दिया। मसर्रत ने सबसे ज्यादा नुकसान मोदी की उस छवि को पहुंचाया जिसमें वो 56 इंच के सीने के बूते पाकिस्तान को धूल चटाने की बात करते थे।
हालांकि भारी दबाव के बीच मसर्रत को दोबारा जेल भेजा गया तो अब उसका आका गिलानी लगातार देशविरोधी गतिविधियों को अंजाम देने में लगा हुआ है और सरकारें चुप हैं।
गिरीराज, साध्वी और साक्षी महाराज का निदान नहीं ढूंढ पाए मोदी
गत मई में जब मोदी बहुमत के आंकड़े को काफी पीछे छोड़ते नजर आए तो उसमें हिंदुत्व की उस लहर का भी एक बड़ा योगदान माना गया था जिस पर सवार होकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पहली बार भाजपा की सरकार बनाई थी।
हालांकि दोनों लहर में मूल फर्क यह था कि वाजपेयी उस खांटी हिंदुत्व की लहर पर सवार होकर सत्ता में आए थे जो राम मंदिर आंदोलन के गर्भ से निकली थी, जबकि मोदी हिंदुत्व की उस लहर के सहारे बहुमत जुटाने में सफल रहे जो कांग्रेस सरकार की तुष्टिकरण की नीतियों के कारण आम जनता के मन में असंतोष पैदा कर गई थी।
इसी हिंदुत्व की लहर ने भाजपा में कई ऐसे रणबांकुरों को पैदा कर दिया जो उनकी ही पार्टी के लिए गले की फांस बन गए। पूर्व मंत्री साक्षी महाराज, बिहार से सांसद और केन्द्रीय मंत्री गिरीराज सिंह और केन्द्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति के एक के बाद एक विवादास्पद बयानों ने मोदी को माथा पकड़ने पर मजबूर कर दिया।
आलम ये रहा कि मोदी की कई महत्वाकांक्षी विकासपरक योजनाओं की सुर्खियों पर इन तीनों नेताओं के बयानों ने समय समय पर पानी फेरने का काम किया। साक्षी महाराज कभी चार तो कभी चौदह बच्चे पैदा करने की बात करते तो केन्द्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति राजनीतिक दलों में रामजादों और हरामजादों के तर्क पर भेद करने लगती।
लोकसभा चुनावों से पूर्व मोदी विरोधियों को पाकिस्तान जाने की बात कहकर सुर्खियां में आए गिरीराज सिंह के मुंहफट बयानों का सिलसिला सरकार में आने के बाद भी जारी रहा। मोदी एक को चुप कराते तो दूसरा नया बयान लेकर उनकी आफत बढ़ाने के लिए खड़ा हो जाता।
लगातार आते ऐसे विवादास्पद और साम्प्रदायिक बयानों के बीच मोदी पर यह आरोप भी लगे कि मोदी जानबूझकर इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं जिस कारण ही ऐसे लोगों का हौसला लगातार बढ़ता जा रहा है।
केजरीवाल ने दिल्ली में निकाल ही दी मोदी लहर की हवा
मोदी लहर पर सवार होकर लोकसभा चुनावों में बहुमत लाने वाले नरेन्द्र मोदी का जलवा इसके बाद कई चुनावों में भी जारी रहा। हरियाणा में जहां पहली बार भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार आई तो झारखंड और महाराष्ट्र में भी भाजपा को अपनी सरकार बनाने में कोई दिक्कत नहीं रही।
जम्मू कश्मीर में भी तमाम गतिरोधों के बाद भाजपा पीडीपी के साथ गठबंधन कर सत्ता में आ गई लेकिन पार्टी और मोदी की सबसे बड़ी परीक्षा हुई उनकी नाक के नीचे दिल्ली के विधानसभा चुनावों में।
तीन राज्यों में कमल खिला चुकी मोदी लहर को दिल्ली के चुनावों में पूर्व नौकरशाह अरिवंद केजरीवाल से कड़ी चुनौती मिलती नजर आई। भाजपा ने भी इस चुनौती को नाक का सवाल बनाते हुए एक-एक कर अपने सभी तीर तरकश से बाहर निकाल लिए।
मोदी का नाम और किरणबेदी का चेहरा दोनों दिल्ली चुनावों में दांव पर थे, लेकिन केजरीवाल की जननेता की छवि ने पूरी पार्टी को औंधेमुंह जमीन पर ला दिया। एक झटके में मोदी लहर को थामकर जनता के साथ-साथ ही विपक्षियों की आंख का तारा बने केजरीवाल लगातार हर कदम मोदी के लिए चुनौती बने हुए हैं।
केजरीवाल ने मोदी की विकासवादी छवि को तो तोड़ा ही उनकी हर वर्ग में लोकप्रियता के दावों को भी खोखला साबित कर दिया। एकता के अभाव में टुकडों में बंटा विपक्ष आज भी केजरीवाल में अपना वो नायक तलाश करने की कोशिश कर रहा है जो मोदी के विराट होते कदमों को थाम सके और यही कारण है कि केजरीवाल आने वाले समय में उनके लिए और मुसीबतें खड़ी कर सकते हैं।