भारत के मुस्लिम समाज में विवादास्पद जबानी तलाक या 'ट्रिपल तलाक' के खिलाफ धीरे धीरे माहौल तैयार हो रहा है। पिछले हफ्ते देश की मुस्लिम उलेमा काउन्सिल ने 'एक साथ तीन तलाक' के रिवाज को खत्म करने की मांग की। पिछले महीने भारतीय मुस्लिम्स महिला आंदोलन के एक सर्वे में करीब 92 प्रतिशत महिलाओं ने ट्रिपल तलाक को खत्म करने पर जोर दिया।
ऐसा लगता है कि देश के मुस्लिम युवाओं में विवादास्पद जबानी तलाक के खिलाफ आम सहमति बन रही है। लेकिन इस राह में सब से बड़ी रुकावट है ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड। बोर्ड ने ट्रिपल तलाक की प्रथा को जारी रखने का ऐलान किया है। बोर्ड ने अपने फैसले को पुख्ता बनाने के लिए कुरान का हवाला भी दिया। बोर्ड का तर्क ये है कि जबानी तलाक देना जुर्म है लेकिन अगर एक मुस्लिम मर्द ने अपनी बीवी को एक ही साथ तीन बार तलाक कह दिया तो तलाक पूरा समझा जाएगा। बोर्ड का फैसला मुस्लिम महिला विरोधी है। क्या बोर्ड ऐसी कोई पवित्र संस्था है कि इसका हर फरमान भारतीय मुसलमानों पर लागू होना ही चाहिए?
भारत की युवा पीढ़ी से कटी इस संस्था की मुसलमानों पर उतनी मजबूत गिरफ्त नहीं है जितनी सरकार और मीडिया समझती है। बोर्ड मुस्लिम समुदाय से काफी कट चुका है। मैं ऐसे किसी मुस्लिम व्यक्ति को नहीं जानता जो किसी मजहबी मसले पर बोर्ड से सलाह लेने गया हो। भारतीय मुस्लिम महिला समाज के सर्वे में ये पता चला कि 95 प्रतिशत महिलाओं को मुस्लिम्स पर्सनल बोर्ड के वजूद की जानकारी थी ही नहीं।
मुसलमानों से जुड़ाव
बोर्ड एक तरह से मुस्लिम हितों की हिफाजत का दावा करने वाली एक संस्था है जिसकी स्थापना 1973 में हुई थी। बोर्ड मुस्लिम अधिकारों को मनवाने के लिए सरकार से लॉबी करने का दावा भी करता है। बाबरी मस्जिद/राम जन्म भूमि के विवाद और शाह बानो केस में बोर्ड ने एक ठोस भूमिका निभाई थी, लेकिन भारतीय मुस्लिम समाज के धार्मिक और सामाजिक हितों की रक्षा करने का दावा करने वाली ये संस्था मुसलमानों की बुनियादी समस्याओं का हल निकालने में बुरी तरह से नाकाम रही है।
बोर्ड के सदस्यों के बारे में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सफिया नियाज कहती हैं ये मुस्लिम मजहब और समाज के ठेकेदार हैं, लेकिन ये जमीनी हकीकत से दूर हैं। वो कहती हैं, "हम मुस्लिम समुदाय में सालों से काम कर रहे हैं। हम इनकी सोच क्या है अच्छी तरह जानते हैं।" सफिया नियाज ने बोर्ड को नजर अंदाज करते हुए सर्वे के नतीजे को आम मुसलमानों तक पहुँचाने का काम शुरू कर दिया है।
बोर्ड की उलेमा पर अब भी पकड़ मजबूत है और उलेमा की आम मुसलमान पर। प्रसिद्ध दारुल उलूम देओबंद मदरसे के आलिम मुफ्ती शमून कासमी कहते हैं कि ट्रिपल तलाक अपने आप में सही है। मुस्लिम मर्द इसका गलत इस्तेमाल कर रहे हैं जिसे रोकना चाहिए।
उनके मुताबिक, 'हत्या के लिए 302 का मुकदमा लगता है और जेल होती है। अगर 302 हटा दें तो हत्या करना जुर्म नहीं रहेगा। इसी तरह अगर तीन तलाक हटा दें तो कोई भी किसी समय तलाक देता फिरेगा।'
जागरूक महिला
जब उनसे ये कहा गया कि पाकिस्तान, इंडोनेशिया, मलेशिया और दूसरे कई मुस्लिम देशों में ट्रिपल तलाक का रिवाज नहीं है तो उन्होंने कहा कि उन्हें दूसरे मुस्लिम देशों में क्या हो रहा है उससे मतलब नहीं है। मुफ्ती साहब ये जरूर स्वीकार करते हैं कि बोर्ड को मुसलमानों के अंदर जागरूकता फैलाने की जरूरत है।
झारखंड के आलिम सैयद फुरकान इमाम कहते हैं कि बोर्ड मुसलमानों को गुमराह कर रहा है, "जिस कुरान के हवाले से ये लोग ट्रिपल तलाक को सही ठहराते हैं उसी कुरान और हदीस से मैंने सीखा है कि तीन तलाक के बीच एक-एक महीने का फासला होना चाहिए।"
ट्रिपल तलाक पर चर्चा जितनी पुरानी है उतनी ही पेचीदा भी। सऊदी अरब और कुछ खाड़ी देशों को छोड़ कर लगभग सभी मुस्लिम देशों ने इसे रद्द कर दिया है। भारत में ये एक संवेदनशील मुद्दा है। सरकार मुस्लिम समुदाय के आपसी मामले में नहीं पड़ेगी।
भारत का मुस्लिम समुदाय पढ़ाई और कमाई में पीछे है, लेकिन इसकी युवा पीढ़ी की उमंगें और परिवर्तन की चाह वैसी होती जा रही है जैसी देश के दूसरे समुदायों के युवाओं की। अब बोर्ड को भारत के मुस्लिम समुदाय में खुद को योग्य बनाये रखना है तो बदलना पड़ेगा। मुस्लिम युवाओं में बदलाव को ध्यान में रखना पड़ेगा। मुस्लिम महिलाओं को उनके अधिकार देने होंगे। वरना अगले दस सालों में बोर्ड की मुसलमानों को जरूरत ही न पड़े।