प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में भाजपा की एक रैली में आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल का नाम लिए बिना कहा था कि जिन्हें अराजकता करनी हो, वे जंगल में जाएं और नक्सलियों के साथ मिल जाएं।
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केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की राजनीतिक शैली पर किए गए इस कटाक्ष के दिल्ली की सियासत के लिए जो भी अर्थ हों, मगर प्रधानमंत्री के इस बयान को बारीकी से देखने-समझने की जरूरत है।
'अराजकता', 'नक्सली' और 'जंगल' के अलावा भी एक और शब्द है, जिसका जिक्र प्रधानमंत्री ने नहीं किया है। यह शब्द है 'आदिवासी' जिसका ताल्लुक जंगल से तो है ही, नक्सलियों से भी है, क्योंकि उनके सीधे निशाने पर तो वही हैं।
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दिल्ली से करीब 1500 से 1800 किमी दूर देश के मध्य में छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, तेलंगाना, मध्य प्रदेश का छत्तीसगढ़ से सटा हिस्सा और महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जैसे क्षेत्र में जहां, नक्सलियों ने भारत की राजसत्ता को चार दशकों से भी लंबे समय से चुनौती दे रखी है, प्रधानमंत्री के इस बयान के क्या मायने हैं?
इसकी पड़ताल जरूरी है, क्योंकि यूपीए सरकार के दस वर्ष के कार्यकाल के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कई बार नक्सलियों और माओवादियों को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था।
नक्सल मसले पर बीजेपी, कांग्रेस की एक राय
पिछले वर्ष मई में मोदी की अगुआई में केंद्र में बनी एनडीए सरकार के गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी इस राय से इत्तफाक रखते हैं और वे भी मानते हैं कि नक्सली देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। वास्तव में नक्सली हिंसा और विचारधारा से निपटने के मामले में कांग्रेस और भाजपा की सरकारों में कोई विशेष फर्क नहीं है।
जंगल का दोहन करने और उसे बरतने के मामले में यह फर्क भी खत्म हो जाता है। यह किसी से छिपा नहीं है कि पिछली सरकार के गृहमंत्री पी चिदंबरम और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के बीच नक्सलियों से निपटने के तौर-तरीकों को लेकर कोई मतभेद नहीं था।
यहां तक कि जब नक्सलियों के खिलाफ जनजागरण अभियान के नाम पर हथियारबंद सलवा जुड़ूम की शुरुआत हुई, तो छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी कांग्रेस एक ही पाले में खड़ी थीं! इस विवादास्पद अभियान की वजह से 60 हजार से अधिक आदिवासियों को उनके जंगलों से ही बेदखल कर दिया गया और इसे केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के कारण नहीं, बल्कि सर्वोच्च अदालत की कड़ाई के बाद बंद करना पड़ा।
छत्तीसगढ़ में तो पिछले 12 वर्षों से रमन सिंह की अगुआई वाली भाजपा सरकार है। आठ महीने से केंद्र में भाजपा की सरकार है और अब छत्तीसगढ़ से सटे झारखंड में भी भाजपा की सरकार है, इसके बावजूद नक्सलियों से निपटने में अड़चन क्या है?
त्रिक्रोणीय संघर्ष में फंसे आदिवासी
पिछले वर्ष नवंबर में सीआरपीएफ के महानिदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए दिलीप त्रिवेदी ने अपनी अंतिम प्रेस कांफ्रेंस में गंभीर आरोप लगाया था कि कुछ राज्य माओवादी हिंसा को जानबूझकर जारी रखना चाहते हैं, क्योंकि इससे उन्हें बड़े पैमाने पर केंद्रीय फंड हासिल करने में मदद मिलती है!
छत्तीसगढ़ के बस्तर में करीब डेढ़-दो वर्ष पहले हुई कुछ गिरफ्तारियों से यह भी पता चला था कि बड़ी कॉरपोरेट कंपनियां किस तरह माओवादियों को धन मुहैया कराती हैं। बेशक, इस बात की जांच होनी है, लेकिन हकीकत यह है कि इन जंगलों में, जिसे नक्सलियों ने अपना अभयारण्य बन रखा है, आदिवासी त्रिकोणीय संघर्ष में फंसे हुए हैं।
एक ओर केंद्रीय और राज्य सरकार के सुरक्षा बल हैं, दूसरी ओर नक्सली हैं और तीसरी ओर कॉरपोरेट घराने, जिनकी नजर इन जंगलों के नीचे दबे लोहा, कोयला, बॉक्साइट और कोरंडम जैसे कीमती खनिजों के साथ ही दो हजार करोड़ रुपये सालाना से भी अधिक की वनोपज पर भी है।
अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को जंगल जाकर नक्सलियों के बीच रहने की सलाह देते समय प्रधानमंत्री को यह तो पता ही होगा कि देश के 23 फीसदी हिस्से में जंगल है और देश की कुल आबादी में आठ फीसदी की हिस्सेदारी करने वाले आदिवासियों की अधिकांश आबादी इन्हीं जंगलों में रहती है।
छत्तीसगढ़ में 44 फीसदी से अधिक जंगल है, तो ओडिशा में 37 फीसदी और झारखंड में करीब 30 फीसदी भूभाग में जंगल है। इन जंगलों में नक्सली अराजकता से सर्वाधिक प्रभावित इन्हीं तीनों राज्यों में रहने वाले आदिवासी ही हैं।
नवंबर, 2013 में छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव के समय ऐसी ही एक कुहासी सुबह मुझे नक्सली हमले में मारे गए कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा के गांव फरसपाल से दंतेवाड़ा के रास्ते पर राजू इच्छाम नाम का एक आदिवासी युवक मिला था, जिसके गले में वोटर आईकार्ड लटका हुआ था।
जिज्ञासावश मैंने उससे पूछा कि उसने यह कार्ड क्यों गले में लटका रखा है, तो उसका जवाब था, 'इसे नहीं लटकाऊंगा, तो सिक्योरिटी वाले मुझे नक्सली समझ लेंगे!' लोकतांत्रिक लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने वाले इन आदिवासियों की आवाज भी सुनेंगे प्रधानमंत्री जी?