सर्वोच्च अदालत ने दहेज हत्या के एक मामले में दोषी सास से कहा कि उसे खुद को खुशकिस्मत समझना चाहिए कि उसे महज सात साल की सजा सुनाई गई है। अदालत ने कहा कि जिस तरह का यह अपराध है, उसके हिसाब से सजा बहुत कम है। शादी के करीब एक साल बाद ससुराल में महिला की मौत दर्शाता है कि ससुराल वालों ने उसका जीना किस कदर दूभर कर रखा था।
न्यायमूर्ति एफएम आई. कलीफुल्लाह की अध्यक्षता वाली पीठ ने ताराबाई को बहू की मौत का दोषी ठहराते हुए उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली उसकी याचिका खारिज कर दी। पीठ ने कहा कि दहेज के लिए बहू को परेशान करना, मारना-पीटना बेहद गंभीर बात है।
इस तरह के अपराध के लिए सात साल की सजा कम है। इसके लिए और अधिक सजा सुनाई जा सकती थी। पीठ ने कहा है कि सास की प्रताड़ना से परेशान होकर शादी के करीब आठ महीने बाद महिला का मौत को गले लगाना खुद हालात बयां करता है।
ऐसे में सास के साथ किसी तरह की रियायत या संवेदना दिखाने का कोई मतलब नहीं है। वास्तव में इस मामले में सास ही है जो पूरी तरह से बहू की मौत के लिए जिम्मेदार है।