रियासत-ए-जम्मू कश्मीर में जो परिणाम सामने आए हैं, उसे सत्ता विरोधी नहीं व्यक्ति विरोधी कहना चाहिए।
सबसे बड़े दल पीडीपी ने भले ही 28 सीटें हासिल कीं, लेकिन सत्ता में न होने के बावजूद उसके कई वर्तमान विधायकों को पराजय का सामना करना पड़ा। पिछले छह साल में सरकार ने भले ही अच्छे बुरे काम किए, लेकिन मतदाताओं ने इस बार प्रत्याशियों को आंकने के बाद ही वोट दिए।
वित्त मंत्री अब्दुल रहीम राथर पिछले 35-36 सालों से लगातार चरार-ए-शरीफ से जीत रहे हैं। मंत्री पद पर रहते हुए उन्होंने काम भी किए। लेकिन उनका ज्यादा ध्यान अपने क्षेत्र बांडीपोरा में रहा। इसी वजह से मतदाताओं ने उन्हें नकार दिया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के स्टार प्रचारकों की तमाम कोशिशों के बावजूद भाजपा कश्मीर घाटी में एक भी सीट हासिल नहीं कर पाई। इसके बावजूद इसे भाजपा की हार नहीं मान सकते।
भाजपा का लक्ष्य 2014 विधानसभा चुनाव नहीं थे। उनका टारगेट 2020 चुनाव हैं। घाटी में भाजपा ने कई उम्मीदवार उतारे। कार्यकर्ता भी पैदा किए। कुछ वोट भी हासिल किए। अब अगले छह साल भाजपा घाटी में अपना आधार बनाने की कोशिश करेगी।