जनता ने एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार के लिए तो वोट किया ही दिग्गजों को भी धूल चटाने में पीछे नहीं रही। यही कारण रहा कि यहां एक-एक कर अत्प्रत्यशित रूप से चार मुख्यमंत्रियों को हार का मुंह देखना पड़ा।
सबसे बुरी हार रही राज्य के पहले मुख्यमंत्री रहे बाबुलाल मरांडी की जो अपनी दोनों ही सीटों पर हार गए। धनवर सीट पर उन्हें कम्यूनिस्ट पार्टी के राजकुमार यादव ने 10712 वोटों से हराया तो गिरीडीह सीट पर वो मुख्य मुकाबले से बाहर होकर तीसरे स्थान पर खिसक गए।
भाजपा में मुख्यमंत्री पद के दावेदार और पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा का हाल भी कुछ ऐसा ही रहा जिन्हें खरसावा सीट पर झामुमो के दशरथ गागारई ने 11966 वोट से पराजित कर सीएम की रेस से बाहर कर दिया।
वहीं निर्दलीय विधायक के रूप में मुख्यमंत्री का पद संभालने वाले मधु कोडा को भी मंझगांव सीट से हार का मुंह देखना पड़ा। उन्हें झामुमो के निर्मल पूर्ति ने 11182 वोट से शिकस्त दी।
हेमंत सोरेन को भी देखना पड़ा हार का मुंह
हार के दंश से निवर्तमान मुख्यमंत्री और झामुमो सुप्रीमो हेमंत सोरेन भी नहीं बच सके, उन्हें दुमका सीट पर भाजपा के लुईस मरांडी ने कड़े मुकाबले में 5262 वोट से हराया। हालांकि वो दूसरी सीट से जीत दर्ज कर अपनी इज्जत बचाने में सफल रहे।
इसके अलावा भी झारखंड की जनता ने कई और दिग्गजों को इस बार धूल चटा दी। जिनमें भाजपा के सबसे बड़े साझेदार अजासू के अध्यक्ष सुदेश महतो भी रहे। जो सिल्ली सीट से झामुमो के अमित कुमार से 29740 वोट के बड़े अंतर से हार गए।
वहीं राज्य के स्वास्थ मंत्री राजेन्द्र सिंह को भी हार का मुंह देखना पड़ा। संकेत साफ है जनता की सेवा के नाम पर चुनाव जीतने वाले अब ज्यादा दिन तक उन्हें मुर्ख नहीं बना सकते।
बड़े दिग्गजों को झेलनी पड़ी हार
राज्य स्थापना के बाद से ही भ्रष्ट सरकारों का दंश झेल रही झारखंड की जनता ने इस बार स्थायी सरकार के लिए वोट देकर लोकतंत्र का महत्व तो बढ़ाया ही उसने इस बार दिग्गजों को धूल चटाने में भी कोताही नहीं बरती।
बदलाव के लिए चली मतदान की आंधी में तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों को हार का मुंह देखना पड़ा, जबकि निवर्तमान मुख्यमंत्री हेमत सोरेन को भी एक सीट से अपनी हार नहीं बचा सके। इसके अलावा भी कई दिग्गजों को हार नसीब हुई। संदेश साफ है कि जनता जब बदलाव के मूड में आती है तो किसी को नहीं बख्शती।
राजनीतिक रूप से झारखंड़ हमेशा से एक अस्थिर राज्य रहा है। यही कारण है कि पिछले 14 सालों में पूर्ण बहुमत वाली सरकार के अभाव में राज्य की जनता ने एक-एक कर कई मुख्यमंत्री देखे, एक वक्त वो भी आया जब एक निर्दलीय विधायक को मुख्यमंत्री के रूप में इस राज्य की कमान मिली।
लेकिन हर सरकार से आम जनता को निराशा ही मिली। हर बार राजनीतिक दिग्गज जोड़तोड़ कर अपनी सरकार बनाकर आम जनता के बजाय खुद का पेट भरने में लगे रहे, लेकिन इस बार के चुनावों ने झारखंड की फिजा पूरी तरह बदल दी है।