प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले मंत्रिमंडल विस्तार ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की मुश्किलें और चुनौतियां बढ़ा दी हैं। दरअसल इस विस्तार में प्रधानमंत्री की कैबिनेट को युवा और ऊर्जावान चेहरों से सजाने और राज्यों के सियासी और जातीय समीकरण साधने की रणनीति से संगठन में नेताओं का टोटा हो गया है।
दरअसल मोदी ने अपनी टीम के लिए शाह की टीम के उन चेहरों को तवज्जो दी है, जो कि न सिर्फ संगठन में कई अहम जिम्मेदारियां संभाल रहे थे, बल्कि शाह की रणनीति बनाने वाली टीम के भी अहम हिस्सा थे।
शाह की मुश्किल यह है कि विस्तार में संगठन के लोगों को ऐसे समय में सरकार में शामिल किया गया है, जब महासचिवों और उपाध्यक्षों की टीम में पहले से कई पद रिक्त हैं। जाहिर है कि शाह को न केवल जल्द से जल्द संगठन का विस्तार करना होगा, बल्कि युवा, ऊर्जावान और अनुभवी चेहरे को तलाशने के लिए कड़ी माथापच्ची भी करनी होगी।
अगले हफ्ते संगठन का विस्तार संभव
मोदी मंत्रिमंडल के पहले विस्तार में संगठन के तीन महासचिव जेपी नड्डा, राजीव प्रताप रूडी और रामशंकर कथेरिया के साथ-साथ दो उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी और बंडारू दत्तात्रेय सरकार में शामिल हो गए हैं। जबकि लोकसभा बाद पार्टी की कमान संभालने वाले शाह की नई टीम में पहले से ही एक उपाध्यक्ष और दो महासचिवों के अलावा कोषाध्यक्ष के पद रिक्त थे।
फिलहाल संगठन का ताकतवर चेहरा रहे नड्डा और रूडी की विदाई के बाद न केवल महासचिव राम माधव, भूपेंद्र यादव जैसे नेताओं का कद और बढ़ेगा, बल्कि महज प्रवक्ता और केंद्रीय चुनाव समिति में जगह बनाने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री शाहनवाज हुसैन, प्रवक्ता एमजे अकबर, युवा मोर्चा के अध्यक्ष अनुराग ठाकुर, अनुसूचित जाति मोर्चा के अध्यक्ष फग्गन सिंह कुलस्ते जैसे नेताओं के दिन भी बहुर सकते हैं।
पार्टी सूत्रों का कहना है कि शाह अगले हफ्ते ही संगठन का विस्तार कर रिक्त पदों को भरेंगे। संगठन के इस विस्तार में वर्तमान पद से नाखुश चल रहे नेताओं की सुध लेने के साथ-साथ संगठन में कम महत्व के पदों पर बैठे नेताओं को अहम जिम्मेदारी दी जा सकती है। जबकि राज्य की राजनीति में सक्रिय कई नेताओं को केंद्रीय राजनीति में लाया जा सकता है।