फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

यूपीः सरकारी वकीलों की नियुक्ति 4 माह में करने के आदेश

Thu, 14 Nov 2013 11:28 AM IST
अमर उजाला, दिल्ली
विज्ञापन
विज्ञापन
जिला स्तर पर सरकारी वकीलों की नियुक्ति के मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को बड़ी राहत देते हुए ताकीद किया है कि नियुक्तियों में किसी राजनीतिक पार्टी का हित नहीं, बल्कि जनहित को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
विज्ञापन


सर्वोच्च अदालत ने राज्य सरकार की अपील को मंजूर करते हुए उसे कानूनी प्रक्रिया के मुताबिक खाली पदों को चार माह में भरने का आदेश दिया है।

साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को दिए फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के गत वर्ष दिसंबर के आदेश को दरकिनार कर दिया है। हाईकोर्ट ने उन सभी वकीलों की नियुक्ति करने को कहा था, जो दस्तावेज दाखिल कर चुके थे।

सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि यूपी सरकार एलआर मैनुअल के प्रावधानों, सीआरपीसी की धारा 24 और सुप्रीम कोर्ट के जोहरीमल मामले में दिए गए फैसले का सख्ती से अनुपालन करते हुए सभी योग्य आवेदकों से खाली पदों को भरे।
विज्ञापन


सीआरपीसी और जोहरीमल के फैसले के मुताबिक जिला जज और जिला मजिस्ट्रेटों की नियुक्तियों में राज्य सरकार का विचार जरूरी है। इसमें पुनर्नियुक्ति के आवेदकों के पिछले कार्य, आचरण और प्रदर्शन के मुताबिक नियुक्ति के संबंध में सिफारिश की जानी चाहिए। यह सिफारिशें वृहद स्तर पर जनहित को ध्यान में रखते हुए की जानी चाहिए, ना कि इसके उलट किसी खास राजनीतिक दल के हित के आधार को देखते हुए।

जस्टिस जीएस सिंघवी की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि राज्य सरकार की ओर से नियुक्तियों की पूरी प्रक्रिया आज से चार माह की अवधि में पूरी की जानी चाहिए। हाईकोर्ट को फैसले की प्रति भेजने का निर्देश रजिस्ट्री को देते हुए पीठ ने फैसले में कहा है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल इसे चीफ जस्टिस के समक्ष प्रस्तुत करें।

हाईकोर्ट चीफ जस्टिस इस पर गौर करें और एक पीठ के समक्ष इससे संबंधित सभी मामलों को लगाकर जल्द निपटारा कराएं।

पीठ ने राज्य सरकार के अधिवक्ता शमशाद आलम के उन तर्कों से सहमति जताई है, जिसमें कहा गया है कि योग्य व्यक्तियों की नियुक्ति जिला जजों से परामर्श के बाद किए जाने का प्रावधान है। इसकी अनुमति राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट की ओर से जोहरीमल व राकेश कुमार केसरी मामले के फैसले में दी गई है। हाईकोर्ट का आदेश राज्य में उपलब्ध प्रावधान और अदालत के फैसले के विपरीत है।

सर्वोच्च अदालत में यह मामला पहले भी पहुंचा था। तब प्रावधानों में तत्कालीन बसपा सरकार में हुए फेरबदल का विवाद था। पूर्ववर्ती सरकार ने 2008 में नियुक्ति के प्रावधानों में एलआर मैनुअल में जो संशोधन किया गया था उसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया था।

इसके खिलाफ तत्कालीन सरकार शीर्षस्थ अदालत पहुंच गई थी, लेकिन सत्ता में आई सपा सरकार ने इस अपील को वापस लेकर हाईकोर्ट के आदेश को स्वीकार कर लिया था। इसके बाद पुनर्नियुक्ति में देरी होने पर वकीलों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। जिस पर हाईकोर्ट ने गत वर्ष 7 दिसंबर को आदेश जारी किया और फिर सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील की। गौरतलब है कि राज्य सरकार ने कहा था कि वह समुचित प्रक्रिया के तहत पुनर्नियुक्ति करने में जुटी है, लेकिन हाईकोर्ट ने उन सभी वकीलों को नियुक्ति देने का आदेश दिया जो दस्तावेज दाखिल कर चुके थे।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें