पूर्व सॉलिसिटर जनरल एवं वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रह्मण्यम ने उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने से इनकार कर दिया है। उन्होंने देश के मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा को पत्र लिखकर शीर्ष अदालत के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति की सिफारिश वापस लेने का आग्रह किया है।
उन्होंने अपने पत्र लिखने की वजह बताते हुए कहा कि एक जज को शक के दायरे से परे और निष्कलंक होना चाहिए। मुझ पर लगे सभी आरोप बेबुनियाद हैं लेकिन मैंने पद की गरिमा के लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पद की उम्मीदवारी छोड़ना सही समझा।
सरकार की ओर से कोलेजियम की सिफारिश लौटाने के मसले पर लगे सभी कथित आरोपों को नकारते हुए सुब्रह्मण्यम ने यह स्वीकार किया कि इस घटनाक्रम से उन्हें और उनके परिवार को बहुत तकलीफ हुई है।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश पद नियुक्ति का है मामला
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पद पर अपनी नियुक्ति को लेकर सरकार के नकारात्मक रुख पर सीधे तौर पर कुछ नहीं कहते हुए पूर्व सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि सरकार में कुछ साल से ऐसा चलन देखने को मिला है कि उसे हर पद पर ऐसे लोग चाहिए जो मित्रवत हों लेकिन मैं ऐसा नहीं हूं।
सोहराबुद्दीन मामले में अदालत के सहायक की भूमिका के चलते सरकार का रुख नकारात्मक रहने के सवाल पर उन्होंने कहा कि मैं यह तो नहीं कह सकता कि ऐसा किस वजह से हुआ लेकिन मैंने बिना राग-द्वेष के वकील के रूप में अपने फर्ज को अंजाम दिया है।
यदि मैं किसी को दुश्मन लगता हूं तो क्या किया जा सकता है। याद रहे कि सुब्रह्मण्यम ने चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के तौर पर उनकी उम्मीदवारी की सिफारिश वापस लेने का आग्रह किया है।
क्या है विवाद
सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम ने सर्वोच्च अदालत में जजों की नियुक्ति के लिए सिफारिश सरकार को भेजी थी। सरकार की ओर से गोपाल सुब्रह्मण्यम के नाम पर कोलेजियम से पुनर्विचार करने को कहा गया।
इसके पीछे कुछ नकारात्मक कारण सरकार की ओर गिनाए जा रहे हैं। खास बात यह है कि कोलेजियम की ओर से दोबारा वरिष्ठ अधिवक्ता के नाम की सिफारिश किए जाने पर सरकार उसे नहीं लौटा सकती है।
गोपाल सुब्रह्रण्यम के मुताबिक न्यायाधीश के पद की एक गरिमा होती है। एक जज को शक, संदेह से परे और निष्कलंक होना चाहिए। मुझ पर लगे आरोप बेबुनियाद हैं लेकिन मैंने पद की गरिमा को ध्यान में रखते हुए इसे नहीं स्वीकार करना ही सही समझा।
जो हुआ बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण और बहुत तकलीफदेह है। यही नहीं मेरे परिवार को भी इस पूरे घटनाक्रम से बड़ी वेदना हुई है। लेकिन जज के पद की महत्ता के अनुरूप मैंने अपनी उम्मीदवारी को वापस लेने का आग्रह किया है।
अमित शाह का मामला एक अहम वजह
गोपाल सुब्रह्मण्यम सोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर मामले में एमिकस क्यूरी थे और उनकी सिफारिश पर ही इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए गए थे।
इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खासमखास अमित शाह को आरोपी बनाया गया था और उनके गुजरात प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई थी। सुब्रह्मण्यम के नाम पर सरकार की आपत्ति को यह एक अहम वजह माना जा रहा है।
पत्र में क्या लिखा
गोपाल सुब्रह्मण्यम ने 9 पृष्ठों में लिखे अपने पत्र में कहा है कि हाल के दिनों में जान बूझकर उनके खिलाफ खबरें प्लांट की जा रही हैं। आईबी और सीबीआई की कथित नकारात्मक रिपोर्टें लीक की जा रही हैं।
उनकी विश्वसनीयता और सच्चाई पर प्रश्नचिन्ह लगाए जा रहे हैं। गत 15 मई को आईबी की रिपोर्ट उनके पक्ष में थी, लेकिन कानून मंत्रालय ने जानबूझकर सीबीआई को इस मामले में जांच का जिम्मा थमाया, जिसका मुख्य उद्देश्य उनके खिलाफ कुछ खामियां निकालना था।
मोदी सरकार पर भी साधा निशाना
उन्होंने परोक्ष रूप से मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए लिखा है कि पिछले कुछ सप्ताह के घटनाक्रमों पर नजर डालने से मेरे मन में इस बात का संशय उठता है कि मौजूदा कार्यपालिका में न्यायपालिका की अखंडता, स्वतंत्रता और न्यायिक क्षमता का सम्मान करने की क्षमता नहीं है। मुझे ऐसी उम्मीद नहीं कि आने वाले समय में इस प्रकार के रवैये में कोई सुधार भी आएगा।
क्या है कोलेजियम सिस्टम
सुप्रीम कोर्ट ने 1993 में 9 जजों की बेंच ने आदेश पारित कर कोलेजियम सिस्टम की शुरुआत की थी। इसी के तहत हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए नाम भेजा जाता है।
हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए एक चीफ जस्टिस और दो सीनियर जजों को मिलाकर बना हाईकोर्ट कोलेजियम नाम भेजता है। इन नामों पर सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम विचार करता है।
सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया और 4 सीनियर जस्टिस होते हैं। नामों पर विचार के बाद उसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। वहीं सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए नाम खुद सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम तय करता है और उसे राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजता है।