फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

भारतीय सियासत और एक प्याज की 'रामकहानी'

Thu, 27 Aug 2015 12:57 PM IST
पुष्पेश पंत/राजनीतिक विश्लेषक
विज्ञापन
विज्ञापन
हिंदुस्तान की राजनीति के चुनावी गणित में यह समीकरण असरदार तरीके से बार-बार प्रमाणित होता रहा है कि जब-जब प्याज के दाम चढते हैं, सरकारों के गिरने का खतरा बढता जाता है।
विज्ञापन


दिक्कत कुछ ऐसी है कि इससे लोग यह नतीजा निकालने की नादानी कर बैठते हैं कि प्याज आम आदमी की रोजमर्रा की खूराक का अभिन्न अंग है।रोटी-दाल-चावल की तरह इसके बिना हम जिंदा नहीं रह सकते।

यह बात तयशुदा तरीके से नहीं कही जा सकती कि प्राचीन भारत में प्याज आम आदमी के खानपान का हिस्सा था।यों कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि प्याज की खेती तकरीबन पाँच हजार साल से की जा रही है।
विज्ञापन

पलांडु नाम से पुकारा जाने वाला प्याज खास है

यह भी कयास ही है कि प्याज की जन्मभूमि उत्तरी एशिया में कहीं है जहाँ से यह मिस्र के रास्ते यूरोप तक पहुंचा।यह दावा बेबुनियाद है कि पुर्तगाली इसे अपने साथ लाए, उसी टोकरी में, जिसमें मिर्ची, टमाटर, आलू, तंबाकू वगैरह थे।इस गलतफहमी की जड गोवा में पकाया जाने वाला विंडालू है जिसमें प्याज का बेमिसाल मजा मिलता है।

आयुर्वेद के ग्रंथ भावप्रकाश निघंटु में पलांडु नाम से पुकारा जाने वाला प्याज खास है, आम नहीं।पश्चिमी विद्वान यह स्वीकार करते हैं कि ईसा के जन्म से तीन हजार साल पहले इसके सूराग पिरामिडों में मिले हैं।

लेकिन इसका उपयोग खाने के लिए नहीं राजसी शवों के संरक्षण के लिए किया गया था।मध्य युग तक औषधीय गुणों के कारण ही प्याज मशहूर थी।उसके बाद मध्य एशिया और भूमध्य सागर तटवर्ती प्रदेश में इसका जायका सिर पर चढ कर बोलने लगा।

नहीं होगी इसके बिना गुजर

सल्तनत काल में ही हिंदुस्तानियों की जुबान पर प्याज का प्रभुत्व स्थापित हुआ।किसी भी नई चीज की तरह आरंभ में प्याज का उपयोग अभिजात्य शासक वर्ग तक सिमटा रहा।

हम इससे अपरिचित नहीं थे बल्कि मानसिक विकार पैदा करने वाले प्याज से लोग परहेज करते थे।पुरानी हिंदी कहावत है, 'नया-नया मुल्ला ज्यादा प्याज खाता है।'

आज के सांप्रदायिक प्रदूषण से परेशान भारत में इस कहावत की याद दिलाते भी संकोच होता है।पर हकीकत यह है कि इसके बिना गुजर नहीं होती नजर आ रही।

दो प्याजा किस बला का नाम

मुल्ला दो प्याजा के नाम की व्याख्या चाहे जैसे करें- वह हर खाने में दो प्याज खाते थे, या दो प्याजा नामक व्यंजन के फरमाइशी आविष्कारक थे ।ये इसी धारणा को पुष्ट करता है कि अमीर उमरा ही प्याज को मुंह लगाते थे। चलते चलते यह पहेली भी बुझा लें कि दो प्याजा है किस बला का नाम?

वह माँसाहारी व्यंजन जिसमें माँस से दोगुना प्याज डाला जाता है या दो तरह का (कच्चा हरा और पका लाल) प्याज इस्तेमाल होता है या पकाने के दौरान दो बार अलग-अलग वक्त पर प्याज पडता है।

पाक विद्या विषाद सालाना नरेश की मानें तो दो प्याजा बिना प्याज के भी पकाया जा सकता है किसी दूसरी सब्जी के साथ!जान पडता है प्याज की बढती कीमत का पूर्वानुमान कर उन्होंने यह नायाब नुस्खा ईजाद किया था।

गया वो जमाना

यानी इस गलतफहमी से फौरन छुटकारा पाने की जरूरत है कि प्याज आम हिंदुस्तानी की खूराक का अनिवार्य हिस्सा है या हमेशा से रहा है। वह जमाना कब का बीत चुका जब एक मुहावरे में यह ज्ञान दान दिया जाता था कि गरीब आदमी सिर्फ प्याज की एक गाँठ के सहारे सूखी रोटी निगल कर बसर कर सकता है।

लगातार आसमान छूती कीमतों ने प्याज को बहुत पहले आम आदमी की पहुंच के परे कर दिया था।हालांकि देश की आबादी का एक हिस्सा पारंपरिक रूप से प्याज से परहेज करता है मसलन अधिकाँश जैन, कुछ वैश्य और ब्राह्मण। अनेक शाकाहारी व्यंजनों में प्याज इस्तेमाल नहीं होता- हरी सब्जियाँ हों अथवा कद्दू, लौकी, तुरई, सेम या अन्य फलियाँ।मसाले या दाल के तडके में भी बहुत कम मात्रा में प्याज डाला जाता है।

और अगर अभाव हो तो बहुत आसानी से विकल्पों का उपयोग देश कि विभिन्न प्रदेशों में होता रहा है।मजेदार बात तो यह है कि कुछ स्वादिष्ट माँसाहारी व्यंजन भी मजे के लिए प्याज पर निर्भर नहीँ। विभाजन के बाद पंजाबी शरणार्थी जायके का प्रभुत्व स्थापित करने वाले ढाबों की मेहरबानी से ही उत्तर भारत के शहरों और कस्बों में प्याज का चलन बेहिसाब बढा है।

कड़वा सच है ये

वरना राजस्थानी कादे की सब्जी से इतर प्याज की अकेली छटा कहीं और नहीं देखने को मिलती।प्याज की उपयोगिता संगत देने वाले साजिंदे सरीखी रही है- सजावटी लच्छों और सिक्के में डूबे अचारी प्याज जैसी।अधिकांश मौसमी चटनियों में प्याज की घुसपैठ हाल ही के वर्षों में बढी है।

इसका तामसिक जोडीदार लहसुन यह तो कह सकता है कि मेरी खीर भी बनती है!एक और बात विचारणीय है। भारत दुनिया में प्याज का दूसरा सबसे बडा उत्पादक है और एक प्रमुख निर्यातक। फिर क्यों बार-बार हमें इस संकट का सामना करना पडता है।बहाना कभी मानसून की तुनक मिजाजी का सुनने को मिलता है तो कभी फसल को लगी लाइलाज बीमारी का।

कडवा सच ये है कि इस आपदा के लिए कुदरत नहीं, इंसान जिम्मेदार हैं।यहाँ तत्काल यह जोडना जरूरी है कि इस बहस में राजनैतिक दलगत पक्षधरता से परहेज करने की सख्त जरूरत है। प्याज पैदा करने वाले सूबों में अधिकाँश में आज गैर कांग्रेसी दल राज कर रहे हैं।
विज्ञापन

छिपे हैं रहस्य

इसलिए यह आरोप लगाना आसान है कि यहां के काला बाजारिए जमाखोर मौजूदा प्याज संकट के लिए जिम्मेदार हैं।और भाजपा-एनडीए अपने समर्थक व्यापारियों की नाक में नकेल कसने से हिचक रहे हैं।

जब शरद पवार खाद्य मंत्री थे तब प्याज की कीमतें चढने का ठीकरा उनके सर फोडा गया।यह लांछन लगा कि वह महाराष्ट्र में अपने लोगों को लाभ पहुँचाने के लिए निर्यात को बढावा देकर प्याज मंहगा करवा देते हैं।

फिर देश में प्याज की तंगी दूर करने के एलानिया मकसद से आयात का एलान कर अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्याज की कीमत चढा देते हैं!जो भी हो, सोने-चाँदी की गद्दी पर जा बैठे प्याज को छीलते, आँसू बहाते हमें यही एहसास हो रहा है कि प्याज अपना नहीं, पराया है।

जो गंगा जमनी धार नैनों से बह निकला है वह आत्मीय से विदा लेते वक्त की पीर से नहीं उपजा है।इसकी अनगिनत परतों में जाने कितने रहस्य छुपे हैं!
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें