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बिना जुर्म के कैद में बीते 38 साल

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जगजीवन राम यादव ने अपनी जिंदगी के 38 साल जेल में काट दिए, उस जुर्म के लिए जो उन्होंने किया ही नहीं। पढ़ें इन तीन कैदियों की कहानी आखिर क््यों मिली बिना जुर्म की सजा?
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जिंदगी के 38 साल जेल में बिना किसी जुर्म के और बिना किसी सुनवाई के देश भर की जेलों में कई कैदी मौजूद हैं।अदालत के फैसले के इंतजार में इन कैदियों की जिंदगी कालकोठरी में कट रही है।

इनमें से एक ने अपनी जिंदगी के 38 साल जेल में काट दिए, उस जुर्म के लिए जो उन्होंने किया ही नहीं।

जगजीवन राम यादव की उम्र इस वक्त 75 से 80 साल के बीच होगी। उन्होंने अपनी जिंदगी के 38 साल जेल में बिताए हैं और वह भी उस जुर्म के लिए जो शायद उन्होंने किया ही नहीं था।
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वो 1973 से जेल में बंद थे। 5 जुलाई 2005 को जब जेल प्रशासन ने कोर्ट से जगजीवन के केस का हवाला देते हुए दिशानिर्देश मांगा, तब यह मामला सामने आया। कुछ कानूनी कार्रवाई के बाद 18 जनवरी 2006 को जगजीवन राम यादव की रिहाई का आदेश जारी हुआ।

सरकार की क्या जिम्मेदारी बनती है?

आज भी उनके चेहरे पर उदासी ही छायी रहती है। कुछ पूछने पर सिर्फ "हूं-हां" की आवाज निकलती है। घर के लोग बताते हैं कि जबसे वह जेल से छूटकर आए हैं यूं ही खामोश रहा करते हैं।

उनकी पत्नी रति देवी कहती हैं, "हम लोगों ने न जाने कितनी कोशिश की कि ये बोलें, मगर इन्होंने एक लफ्ज नहीं बोला, सिवाए हूं-हां के।" 'पैरवी के लिए भी पैसा चाहिए'।

रति देवी कहती हैं, "यह सरकार की गलती हो या कचहरी वालों की, इनके 38 साल जेल में ही बीत गए। अलबत्ता अदालत ने इतना रहम किया कि इन्हें आजाद कर दिया। मगर सरकार की क्या जिम्मेदारी बनती है? हमें मुआवजा मिलना चाहिए।"

उनका कहना है, "हम लोग इतने गरीब हैं कि अपने गांव से फैजाबाद शहर जाना होता है, तो सोचते हैं कि इतना पैसा खर्च हो जाएगा। खेती से जो आमदनी आती है या मेरा लडका जो मजदूरी से कमाता है, वह खाने-पीने और दवा-इलाज में खर्च हो जाता है। यहां के कुछ लोगों ने हमसे कहा कि मुआवजे के लिए पैरवी करो। मगर पैरवी के लिए भी पैसा चाहिए।"

जगजीवन क्यों गया था जेल?

जगजीवन पर आरोप था कि उन्होंने अपने पडोसी की पत्नी की हत्या की थी। लेकिन उनके खिलाफ आरोप साबित नहीं हो पाया और न उनके घरवाले उनकी जमानत करा पाए।

वह एक जेल से दूसरी जेल में ट्रांसफर होते रहे और फिर लौटकर फैजाबाद जेल में आ गए। आश्चर्यजनक तरीके से उनका रिकॉर्ड गायब हो चुका था। उनके घरवाले जब उनसे मिलने की कोशिश करते तो उन्हें बताया जाता कि इस नाम का शख्स इस जेल में नहीं है।

जगजीवन की रिहाई के आदेश पर दस्तखत करते हुए फैजाबाद के तत्कालीन एडिशनल सेशन जज लालचंद्र त्रिपाठी ने लिखा कि एक से बढ़कर एक भयानक जुर्मों के मुल्जिम बाहर आजाद घूम रहे हैं और यह कितना अफसोसनाक पहलू है कि यह शख्स बगैर किसी सुनवाई के 38 साल से जेल में पड़ा है।

उधर, झारखंड की रांचीजेल में बंद दो भाइयों सनकू नायक और रघुनाथ नायक को भी कोर्ट से जमानत की अनुमति तो मिली, लेकिन जमानत देने वाला नहीं मिल पाया।

जमानत मिली, जमानतदार नहीं

न्यायालय ने पांच-पांच हजार रुपए के दो मुचलकों पर उन्हें जमानत देने को कहा है, लेकिन जमानतदारों के अभाव में दोनों भाई जेल से बाहर आने के दिन गिन रहे हैं, वह भी 16 महीनों से।

दोनों भाई झारखंड में खूंटी जिले के मुरहू थाना क्षेत्र के गोडाडीह गांव के हैं। उन पर गांव के ही एक आदिवासी की हत्या का आरोप है। इस बाबत मरहू थाने में तीन जुलाई 2009 को एफआईआर लिखी गई थी।

25 फरवरी 2011 को इस जुर्म में दोनों को आजीवान कारावास की सजा मिली थी। इसके खिलाफ उन्होंने ऊपरी अदालत में अपील की। इस बीच, 24 जुलाई 2013 को उन्हें झारखंड हाई कोर्ट से जमानत की अनुमति भी मिल गई।

जेल अधिकारियों के मुताबिक दोनों की उम्र 23-24 साल है। रांची केंद्रीय कारागार के अधीक्षक अशोक चौधरी बताते हैं कि सनकू और रघुनाथ जमानतदारों के अभाव में रिहा नहीं हो पाए हैं।
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अधिकारी कहते हैं..आवेदन आएंगे तो करेंगे कार्रवाई

इनके अलावा और भी कुछ बंदी हैं, जो जमानतदारों के अभाव में मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। इस बारे में आला अधिकारियों और झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकार को जानकारी दी गई है। राज्य के कारागार उपमहानिरीक्षक दीपक विद्यार्थी बताते हैं कि इन मामलों को लेकर जेल प्रशासन संवेदनशील है। नए सिरे से बंदियों के आवेदन लेकर जिला और राज्य विधिक सेवा प्राधिकार को भेजे जा रहे हैं, ताकि उनकी जेल से रिहाई के आदेश का पालन हो सके।

हाल ही में ऐसे मामलों में कुछ बंदी रिहा भी हुए हैं। राज्य विधिक सेवा प्राधिकार के सदस्य सचिव एसके दूबे बताते हैं कि सनकू नायक और रघुनाथ नायक के मामले में प्राधिकार की तरफ से ही वकील ने अपील दायर की थी।पिछले साल 24 जुलाई को दोनों की जमानत मंजूर की गई।

रहने को घर नहीं, पलायन करने को हैं मजबूर
सनकू और रघुनाथ के घरवालों से मिलने हम खूंटी के गोडाडीह गांव पहुंचे। पता चला कि इनके पिता चैता नायक ईंट-भट्ठों में काम करने के लिए बाहर गए हैं। चैता नायक मुफलिसी में जीते हैं। इसलिए अक्सर रोजी-रोटी के लिए पलायन कर जाते हैं।

गांव के एक युवक शंकर नायक ने बताया कि अब चैता नायक का कच्चा मकान भी नहीं रहा। शंकर निशानी के तौर पर वह जगह दिखाते हैं, जहां चैता का मकान था। शंकर बताते हैं कि गांव में कभी-कभार चर्चा होती है कि बेटों ने जमानत के लिए जेल से कुछ पैसे भी पिता चैता को भिजवाए थे पर उन्होंने खर्च कर दिए।

गांव के ही सैदू नायक कहते हैं, "चार-छह महीने में चैता नायक कभी-कभार गांव आते हैं। फिर कमाने-खाने बाहर चले जाते हैं। कोई बता रहा था कि सनकू-रघुनाथ को बेल मिली है, लेकिन अब वो आ भी जाएंगे तो रहेंगे कहां।"
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