महाराष्ट्र में गठबंधन टूटने के बावजूद शिवसेना भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए से बाहर नहीं होगी। मंगलवार को शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने यह संकेत दिया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका से लौटने के बाद वह इस संबंध में उनसे बात करेंगे, उसके बाद फैसला करेंगे।
उद्धव ठाकरे ने कहा कि एनडीए गठबंधन में शामिल होना और फिर उससे बाहर निकलना आसान नहीं है। पार्टी के जीते हुए सांसदों को भाजपा और शिवसेना दोनों का वोट मिला है। यह जनादेश है। मोदी से बातचीत और समर्थकों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए फैसला लिया जाएगा।
सोमवार को उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री मोदी के स्वदेश लौटने के बाद भारी उद्योग मंत्री अनंत गीते इस्तीफा दे देंगे। मोदी सरकार में गीते शिवसेना के इकलौते मंत्री हैं। कयास लगाया जा रहा था कि गीते के इस्तीफे के बाद शिवसेना एनडीए से भी बाहर हो जाएगी। पर, अब उसने यू टर्न ले लिया है। इससे संभव है कि महाराष्ट्र में बीजेपी का साथ छूटने के बाद भी शिवसेना केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए के साथ बनी रह सकती है।
... तो क्या राज-उद्धव में हो गया है गुप्त समझौता
भाजपा से गठबंधन टूटने के बाद शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे को भाई राज ठाकरे की याद आ गई है। चर्चा है कि शिवसेना और मनसे ने आपस में समझौता कर लिया है। वैसे तो चुनाव बाद दोनों भाई के साथ आने की चर्चा राजनीतिक हलकों में पहले से थी, लेकिन बदले समीकरण की तस्वीर देखकर अंदाजा लगाया जाने लगा है कि दोनो भाइयों में गुप्त समझौता हो गया है।
राज ठाकरे ने रविवार को कांदिवली से चुनाव प्रचार की शुरुआत करते हुए उद्धव ठाकरे पर वह तल्खी नहीं दिखाई जो वे पहले दिखाते रहे हैं। राज ने शिवसेना को महज लाचार पार्टी करार दिया, जबकि भाजपा को अविश्वसनीय पार्टी बताते हुए दीमक तक कह डाला। राज ने राज्य में भाजपा से गठबंधन टूटने के बाद उद्धव ठाकरे को केंद्र से भी नाता तोड़ने की नसीहत दी तो दूसरे दिन ही इसका असर दिखाई दे गया।
उद्धव ठाकरे ने घोषणा कर दी कि प्रधानमंत्री के स्वदेश लौटने पर अनंत गीते केंद्रीय कैबिनेट से इस्तीफा दे देंगे। इस घटनाक्रम से ठाकरे परिवार के करीबियों की बांछें खिल गई हैं। ऐसे लोग पिछले सात साल से दोनो भाइयों को साथ लाने के लिए प्रयासरत थे, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल रही थी। बहरहाल, अब उम्मीद की किरण दिखाई देने लगी है।
मुंबई में आपस में उलझे उत्तर भारतीय
भाजपा-शिवसेना और कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन टूटने के बाद मुंबई समेत पूरे महाराष्ट्र की राजनीतिक काफी बदल गई है। इसके चलते मुंबई महानगर में उत्तर भारतीयों का महत्व अचानक बढ़ गया है। उत्तर भारतीयों को पार्सल भेजने की भाषा बोलने वाली मनसे और शिवसेना ने भी इस बार उत्तर भारतीय चेहरों को मैदान में उतारा है। इससे उत्तर भारतीयों का गणित बिगड़ गया है। आपस में भिड़ने की वजह से उत्तर भारतीय मतों का बंटना तय माना जा रहा है।
मुंबई और ठाणे के उत्तर भारतीय पहले कांग्रेस के साथ थे, लेकिन लोकसभा चुनाव में भाजपा की साथी बन गए। अब विधानसभा चुनाव में हर दल से उत्तर भारतीय उम्मीदवारों के मैदान में आने से संकट खड़ा हो गया है। कांग्रेस ने कालीना (सांताक्रुज) क्षेत्र से उत्तर भारतीय नेता कृपाशंकर सिंह को फिर उम्मीदवार बनाया है, लेकिन उनके सामने भाजपा ने अमरजीत सिंह और एनसीपी ने पार्टी प्रवक्ता नवाब मलिक के भाई कप्तान मलिक को मैदान में उतार दिया है। इसी तरह दिंडोशी सीट से कांग्रेस उम्मीदवार राजहंस सिंह के मुकाबले में भाजपा ने मुंबई उत्तर भारतीय मोर्चा के अध्यक्ष मोहित कंबोज को टिकट दिया है। कंबोज खुद को बनारस निवासी बताते फिर रहे हैं।
चांदिवली सीट से शिवसेना ने उत्तर भारतीय संघ के अध्यक्ष आर.एन. सिंह के बेटे संजय सिंह को उम्मीदवार बनाया है। इस सीट से भाजपा ने पूर्व नगरसेवक सीताराम तिवारी को टिकट दिया था जिससे मुकाबला रोचक होने की संभावना थी, लेकिन सोमवार को तिवारी की उम्मीदवारी रद्द हो गई। कांदिवली में कांग्रेस के रमेश सिंह ठाकुर के सामने मनसे ने अखिलेश चौबे और एनसीपी ने श्रीकांत मिश्र को मैदान में उतार दिया है, जिससे उत्तर भारतीय आपस में उलझ गए हैं। मराठी बाहुल्य भांडुप सीट से एनसीपी के एल.बी. सिंह अकेले उत्तर भारतीय हैं, लेकिन स्थिति उनके अनुकूल नहीं है। अंधेरी पूर्व उत्तर भारतीय बाहुल्य सीट से एनसीपी ने अखिलेश सिंह को टिकट दिया हैं, लेकिन यहां महाराष्ट्र पुलिस के पूर्व अधिकारी और एंकाउंटर स्पेशलिस्ट प्रदीप शर्मा के निर्दल मैदान में उतरने से तस्वीर बदल गई है।