सुप्रीम कोर्ट ने कोल ब्लॉक आवंटन पर अपना एक ऐतिहासिक फैसला दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि वर्ष 1993 के बाद सभी कोल ब्लॉक आवंटन मनमाने ढंग से किए गए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता एम एल शर्मा की अर्जी पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सभी आवंटन गैर कानूनी तरीके से व मनमाने ढंग से आवंटित किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 218 कोल ब्लॉक आवंटन को रद्द करने के लिए और सुनवाई की जरूरत है।
कोर्ट के फैसले में क्या कुछ है इसको जानने के लिए हमने मामले के एक और याचिकाकर्ता सुदीप श्रीवास्तव से खास बात की। उन्होंने बताया कि कोल ब्लॉक आवंटन को लेकर पूरी तरह से पारदर्शिता नहीं बरती गई। केंद्र की सरकारों ने इस मुद्दे पर मनमाना रवैया अपनाया।
'आवंटन में केंद्र सरकारों का मनमाना रुख'
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि स्क्रीनिंग कमेटी द्वारा किया गया कोल ब्लॉक आवंटन न्यायसंगत और पारदर्शी नहीं था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कोल ब्लॉकों के आवंटन को रद्द करने से मना कर दिया है।
याचिकर्ता सुदीप श्रीवास्तव के मुताबिक, "कोल ब्लॉक आवंटन में राज्य सरकार की सिफारिशों, मंत्रालय की ओर से दिए गए निर्देशों का भी ध्यान नहीं रखा गया। इसके साथ-साथ इससे जुड़ी गाइडलाइन में भी बदलाव किया गया। इसके साथ ही कोल ब्लॉका आवंटन एडहॉक तरीके से किया गया"
उन्होंने बताया कि कोर्ट ने आवंटन के लिए बनाई गई स्क्रीनिंग कमेटी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं। कमेटी की होने वाली बैठकों का तय समय नहीं होता था। बैठक के मिनट भी तय नहीं होते थे।
1993 से 2010 के बीच किए गए आवंटन पर सवाल
याचिकाकर्ता सुदीप श्रीवास्तव के मुताबिक, "आवंटन को लेकर कोर्ट का फैसला सीधे तौर पर क्रोनी कैपिटलिज्म पर लगाम लगाने की दिशा में एक कदम है।"
वहीं दूसरे याचिका कर्ता वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि पूरी कोल ब्लॉक आवंटन की प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट ने गलत पाया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय के बाद वर्ष 1993 से 2010 के बीच किए गए कोल ब्लॉक आवंटन पर उंगली उठ गई है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने सभी पार्टियों को भी एक साथ कठघरे में खड़ा कर दिया है। हालांकि कोर्ट ने इन आवंटनों को अभी रद्द नहीं किया है। बस इन्हें अवैध करार दिया है।