आंध्र प्रदेश में 20 चंदन तस्करों की कथित पुलिस मुठभेड़ में मौत के बाद से स्थानीय अधिकारियों को कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन का भूत फिर सताने लगा है।
क़रीब दो दशक तक वीरप्पन का आतंक दक्षिण भारत के दो राज्यों में फैला रहा और इस दौरान कई पुलिस और वन्य अधिकारियों की हत्या भी हुई।
वीरप्पन के मरने के करीब नौ साल बाद अब चंदन और हाथी दांत का अवैध कारोबार धीरे-धीरे तीन राज्यों में फैला चुका है।
एक तरफ तो कर्नाटक और तमिलनाडु सीमा से लगे जंगलों में बहुमूल्य दांतों के लिए हाथियों का शिकार अधिकारियों के लिए सिरदर्द बना हुआ है। वहीं दूसरी तरफ आँध्र प्रदेश में चंदन के पेड़ों की अवैध कटान जारी है।
दांत के लिए हो रहा है हाथियों का शिकार
स्थानीय अधिकारियों की माने तो चंदन के पेड़ों की कटान और हाथियों के शिकार का ढंग आज भी वही है जैसे वीरप्पन किया करता था। और इसलिए जब भी कहीं ऐसी घटनाएं होती हैं, प्रशासन का पहला शक वीरप्पन के पुराने साथियों पर ही जाता है।
क्षेत्रीय वन्यजीव अपराध निरोधक ब्यूरो के उपनिदेशक वेंकटेश मूर्ति ने बीबीसी से कहा, "कामकाज करने का ढंग वीरप्पन जैसा ही है। लेकिन फ़िलहाल हम निश्चित तौर पर यह नहीं कह सकते कि वीरप्पन गैंग का कोई सदस्य फिर से सक्रिय हो गया है। अभी छानबीन चल रही है, लेकिन वाकई यह एक गंभीर मामला है।"
कन्नड सिनेमा के सुपरस्टार राजकुमार को अगवा कर वीरप्पन ने कई महीने तक बंधक रखा था। उन्हें कर्नाटक सरकार के साथ समझौते के बाद रिहा किया गया था।
इसके कुछ ही दिन बाद वीरप्प्न ने राज्य के एक पूर्व स्वास्थ्य मंत्री की हत्या कर दी थी। इसके बाद तमिलनाडु पुलिस के एक विशेष दस्ते ने मुठभेड़ में वीरप्पन को मार गिराया।
वन कर्मचारियों को ट्रेनिंग
आंध प्रदेश के विशेष वन सरंक्षक एसबीएल मिश्र कहते हैं कि वे इस आशंका की जांच कर रहे हैं कि क्या वीरप्पन गैंग के कुछ लोगों ने फिर से गिरोह बना लिया है।
तस्करों की तरफ से खतरों का इशारा करते हुए वो कहते है, "अब हम अपने कर्मचारियों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग दे रहे हैं ताकि मुठभेड़ की हालत वे अपनी सुरक्षा कर सकें।''
पिछले साल दिसंबर में तस्करों ने दो वन अधिकारियों की हत्या कर दी थी। इसके बाद क़रीब सौ लोगों को तमिलनाडु और कर्नाटक के निकटवर्ती ज़िलों से गिरफ़्तार किया गया था।
लाल चंदन के पेड़ ज़्यादातर आंध्र प्रदेश के चार जिलों - चित्तूर, कडपा, कुरनूल और नेल्लोर में फैले शेषाचलम पहाड़ी क्षेत्र में ही उगते हैं। अंतराष्ट्रीय बाज़ार में इसकी कीमत क़रीब 25 लाख रुपए प्रति टन है।