कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले से संबंधित सीबीआई की जांच रिपोर्ट का निरीक्षण करने के मामले में फंसे कानून मंत्री अश्वनी कुमार ने अब इस मसले पर संसद के दोनों सदनों में एक ही सवाल के अलग-अलग जवाब दिए हैं।
बीते बृहस्पतिवार को लोकसभा में उन्होंने इस मुद्दे में कार्मिक मंत्रालय से जानकारी मंगाने का अटपटा जवाब दिया था। अब सोमवार को राज्य सभा में उन्होंने कहा कि कानून मंत्रालय को कानूनी सलाह देने के लिए न्यायालय के समक्ष पेश होने वाली किसी भी विभाग या मंत्रालय से संबंधित जांच रिपोर्ट को देखने का कानूनी अधिकार प्राप्त है।
सरकार के सूत्रों का कहना है कि सीबीआई के हलफनामे पर आठ मई को सर्वोच्च अदालत में होने वाली सुनवाई में भी सरकार यही तर्क देगी। भाजपा के राज्यसभा सांसद प्रभात झा ने पूछा कि जांच रिपोर्ट का पुनरीक्षण किस आधार पर किया गया।
इस पर कानून मंत्री ने कहा कि भारत सरकार के कारबार आवंटन नियम 1961 के आदेश के तहत मंत्रालय को लंबित मामलों में अदालत के समक्ष पेश होने वाली रिपोर्टों को कानूनी सलाह देने का अधिकार प्राप्त है। इसके दायरे में सीबीआई ही नहीं बल्कि कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) सहित सरकार के सभी विभाग शामिल हैं।
लोकसभा में ठीक यही सवाल सांसद नीरज शेखर और यशवीर सिंह ने किए थे। तब इसका गोलमोल जवाब देते हुए कानून मंत्री ने कहा था कि इस बारे में कार्मिक मंत्रालय से जानकारी एकत्र करने के बाद जानकारी दी जाएगी।
उधर सरकारी सूत्रों का कहना है कि आठ मई की सुनवाई में सरकार की ओर से अटार्नी जनरल अदालत को बताएंगे कि कानून मंत्रालय ने सीबीआई रिपोर्ट का पुनरीक्षण कानूनी अधिकार प्राप्त होने के नाते किया है।