मेरठ एटीएस और खतौली पुलिस ने बुधवार रात 21 साल से फरार इंडियन मुजाहिदीन से जुड़े रहे आतंकी को गिरफ्तार कर लिया। फिलहाल मुरादाबाद में पहचान छिपाकर रह रहा आरोपी किसी साथी से मिलने खतौली आया था, जहां बस स्टैंड पर एटीएस और पुलिस ने उसे दबोच लिया। आरोपी से मोबाइल और फर्जी आईडी बरामद की गई है। वह वर्ष 1992 और 1993 में मेरठ स्थित पीएसी के कैंपों में हुए बम धमाकों के बाद से फरार चल रहा था।
बुधवार देर रात 12.50 बजे मेरठ एटीएस के इंस्पेक्टर विनोद काकड़ा और खतौली कोतवाली प्रभारी सुनील कुमार त्यागी ने टीम के साथ बस स्टैंड से अधेड़ को गिरफ्तार किया। थाने लाकर आरोपी की तलाशी ली गई तो उसके पास से एक मोबाइल और फर्जी आईडी बरामद की गई। पूछताछ में उसने जो बताया उससे एटीएस और पुलिस की बांछें खिल गईं। इंस्पेक्टर सुनील त्यागी के अनुसार पकड़ा गया अधेड़ मेरठ के लिसाढ़ी गेट थाना क्षेत्र के इस्लामाबाद निवासी सलीम उर्फ पतला पुत्र अब्दुल रहमान है। वह पूर्व में प्रतिबंधित इंडियन मुजाहिदीन से जुड़ा था और मेरठ में वर्ष 1992 और 1993 में पीएसी के दो कैंपों में हुए बम धमाकों के बाद से फरार चल रहा था।
विभागीय सूत्रों के मुताबिक फिलहाल सलीम मुरादाबाद के कटघर थाना क्षेत्र की एकता विहार कॉलोनी के बी-29 मकान में रह रहा था। दिखावे के लिए उसने मोबाइल शॉप खोल रखी थी, लेकिन उसका असली काम चोरी की लग्जरी गाड़ियों को कश्मीर के श्रीनगर में सप्लाई करने का था। आतंकियों के साथ कनेक्शन की आशंका के चलते उसके परिचितों को खंगाला जा रहा है। एसपी सिटी श्रवण कुमार ने बताया कि सलीम उर्फ पतला से पूछताछ की जा रही है। उसकी गिरफ्तारी के संबंध में खतौली कोतवाली में विभिन्न धाराओं में रिपोर्ट दर्ज कराई गई है। उसके आतंकी कनेक्शन के संबंध में भी एटीएस और अन्य खुफिया एजेंसियां जांच कर रही हैं।
25 से अधिक लग्जरी गाड़ियां कश्मीर भेजीं
मेरठ के पीएसी कैंपों में बम धमाकों के बाद से फरार चल रहा सलीम पतला चोरी की लग्जरी गाड़ियों को कश्मीर के श्रीनगर समेत अन्य शहरों में सप्लाई करता था। सूत्रों के अनुसार वह अब तक 25 से अधिक ओडी, डस्टर, फार्चूनर, इनोवा आदि गाड़ियां कश्मीर भेज चुका है। इन गाड़ियों को पश्चिमी यूपी के विभिन्न शहरों के साथ ही दिल्ली से भी चोरी कर मुरादाबाद ले जाया जाता था। वहां से इन्हें फर्जी कागजात तैयार कर कश्मीर ले जाकर बेच दिया जाता था। लग्जरी गाड़ियां किसके लिए कश्मीर ले जाई जाती थीं, इसकी खुफिया एजेंसियां जांच कर रही हैं।
कार मैकेनिक से बना चोरी की कारों का बड़ा सप्लायर
पीएसी कैंप पर बम फेंकने वाला मोटर मैकेनिक सलीम पतला जम्मू-कश्मीर में लूट और चोरी की कारों का बड़ा सप्लायर बन गया था। उसने कई बार दिल्ली से लग्जरी कारें चोरी कराईं और जम्मू-कश्मीर में ले जाकर बेचीं। इसी दौरान वह अपराधियों से साठगांठ के साथ आतंकी संगठन से जुड़े लोगों के भी संपर्क में आया। दिखावे के लिए उसने जम्मू-कश्मीर में मोटर गैराज भी खोल लिया था। हालांकि, उसके परिवार के लोगों का कहना है कि गैराज तो सलीम के भतीजे का था। सूत्रों की मानें तो सलीम पतला आतंकी संगठन अलबर्क तंजीम का भी सदस्य रहा है।
सलीम उर्फ पतला का खानदान लिसाड़ी गेट थाना क्षेत्र स्थित मोहल्ला गोला कुआं की गली नंबर एक में रहता है। यहां उसके दो भाइयों सरफराज और इस्लामुद्दीन का परिवार रहता है, जबकि एक भाई शमून लिसाड़ी गेट के उमरनगर मोहल्ले में जाकर बस गया। बड़े भाई इस्लामुद्दीन और उसके एक बेटे का इंतकाल हो चुका है। मोहल्ले के लोगों ने बताया कि सलीम पतला मोटर मैकेनिक रहा है। मेरठ में वह यही काम करता था। इनके बुजुर्गों ने इस्लामाबाद मोहल्ले में पॉवरलूम फैक्ट्री भी लगाई थी। पीएसी कैंप पर बम फेंकने की घटना के बाद वह पत्नी और बच्चों के साथ मेरठ से गायब हो गया। कई साल पहले उसने मुरादाबाद के कटघर थाना क्षेत्र स्थित एकता विहार कॉलोनी में अपना ठिकाना बनाया। लंबे समय से सलीम वहीं रहता था।
2002 में दिल्ली पुलिस ने पकड़ा था:
सलीम उर्फ पतला को दिल्ली पुलिस ने वर्ष-2002 में गिरफ्तार किया था। उसके खिलाफ दिल्ली के अशोक विहार थाने में लग्जरी कार चुराने और उसे ले जाकर जम्मू-कश्मीर में बेचने के आरोप में केस दर्ज हुआ था। तब सलीम पतला ने अपना नाम तो सही बताया, मगर घर का पता गलत बता दिया था। इस वजह से दिल्ली पुलिस मेरठ में उसका आपराधिक रिकॉर्ड खंगालने में नाकाम रही। इसके बाद गुपचुप ढंग से सलीम ने दिल्ली स्थित कोर्ट से अपनी जमानत करा ली और जेल से बाहर निकल आया था।
इन मामलों से सुर्खियों में आया पतला
केस-1:
26 जनवरी 1993 को सिविल लाइन थाना क्षेत्र में पशु चिकित्सालय के पास लगे पीएसी के कैंप पर बम फेंका गया था। इसमें पीएसी जवान महेंद्र सिंह की मौत हो गई थी। इसमें प्लाटून कमांडर रामवीर सिंह ने दो अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कराया था। इस केस में हत्या, कातिलाना हमला, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धाराओं में मुकदमा दर्ज हुआ था। विवेचना में सलीम पतला, अय्यूब और जब्बार सहित आठ लोगों के नाम सामने आए थे। इनमें से जब्बार और अय्यूब को कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुना दी, जबकि सलीम पतला फरार होने के कारण कोर्ट ने भगोड़ा घोषित कर दिया था।
केस दो:
15 मई 1992 को नौचंदी थाना क्षेत्र में हापुड़ अड्डे के पास पीएसी के कैंप पर बम से हमला किया गया। उसकी रिपोर्ट भी अज्ञात आरोपियों के खिलाफ दर्ज हुई, जिसके बाद चार लोगों के नाम प्रकाश में आए। इनमें अब्दुल जब्बार पुत्र अब्दुल रसीद और सलीम पतला पुत्र अब्दुल रहमान निवासी गोला कुआं तथा मोहल्ला इस्लामाबाद निवासी सलीम उर्फ मोटा पुत्र लतीफ उर्फ मंगू और अय्यूब पुत्र हाजी मुंशी आरोपी बने। नौचंदी थाना पुलिस ने सिर्फ दो ही आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। यह मामला एडीजे-11 की कोर्ट में चला, जहां से जब्बार और सलीम उर्फ मोटा को 13 जुलाई 1995 को दोषमुक्त कर दिया गया। इस मामले में भी सलीम पतला पुलिस के हाथ नहीं आया।
आईजी जोन आलोक शर्मा ने बताया कि सलीम उर्फ पतला से पुलिस के साथ ही खुफिया एजेंसियों ने गहन पूछताछ की है। उससे महत्वपूर्ण जानकारियां मिली हैं। फरारी के दौरान उसका संपर्क किस आतंकी संगठन से रहा और संगठन के लिए उसने क्या काम किया, इसकी गंभीरता से छानबीन चल रही है।
बिजनौर से भी जुड़ रहे हैं तार
आतंकी सलीम उर्फ पतला के तार बिजनौर में करीब एक माह पूर्व हुए धमाकों से भी जुड़ रहे हैं। सूत्रों के अनुसार बिजनौर धमाकों के बाद आतंकियों के कमरे से जो सिम बरामद हुए थे, उन्हीं के आधार पर जांच को आगे बढ़ाते हुए एटीएस सलीम उर्फ पतला तक पहुंची है। उसके बिजनौर के आतंकी प्रकरण में भी संलिप्त होने की आशंका जताई जा रही है, जिसकी खुफिया एजेंसियां जांच कर रहीं हैं।
चेहरे पर शराफत, इरादे खौफनाक
52 साल की ढलती उम्र। जहीन चेहरा। सामान्य कद काठी। बातचीत में मानों सलीम पतला के चेहरे से शराफत टपकती है। यही वजह रही कि 21 साल खुला घूमने में सलीम को कोई दिक्कत पेश नहीं आई। गिरफ्तार करने के बाद जैसे ही एटीएस ने उससे सवाल दागे तो उसने यह कहकर बचने की कोशिश की कि शायद आप गलती से मुझे उठा लाए हैं।
पीएसी कैंप पर बम विस्फोट के बाद सलीम की दहशत खाकी में साफ देखी जाती थी। कई सालों तक पुलिस उसकी खाक छानती रही, लेकिन वह ऐसा भूमिगत हुआ किसी को भनक तक नहीं लगी। दिन, महीने और साल गुजरते गए। सलीम कानून के हाथों से फिसलता गया। सलीम ने पूछताछ में खुलासा किया कि मेरठ बम धमाके के बाद उसने कश्मीर का रुख किया। कुछ दिन वहां की आबोहवा परखी और फिर संदिग्ध लोगों के संपर्क में आ गया। यहां उसकी लोकेशन एक गैराज में ट्रैस हुई तो उसने ठिकाना बदलने में देर नहीं की। लगभग तीन साल गुजारने के बाद सलीम भागकर दिल्ली आ गया। दिल्ली के सीलमपुर इलाके में वह किराए पर कमरा लेकर रहने लगा। दिल्ली बम धमाकों के बाद पुलिस और खुफिया एजेंसियां सक्रिय हुईं तो उसने वहां से भागना ही उचित समझा। इसके बाद वह उत्तराखंड पहुंच गया। यहां कई जगह उसके ठिकाने रहे।
खुफिया एजेंसियां उसे पहाड़ों और कश्मीर में तलाशती रहीं, जबकि इस बार उसने मेरठ के नजदीक ही मुरादाबाद में अपना आसरा बना लिया। एकता विहार के बी-29 में वह पत्नी और सात बच्चों के भरे-पूरे परिवार के साथ रह रहा था। बीच-बीच में बाहर आता-जाता रहता था। यहां उसने मोबाइल रिचार्ज की दुकान भी खोल रखी थी, जिस पर अधिकांश उसका बेटा बैठता था। सलीम बताता है कि अब उसे भी विश्वास नहीं था कि कानून के हाथ उस तक पहुंच जाएंगे। 21 साल में उसकी शक्ल भी इतनी बदल गई कि उसे मेरठ के लोग पहचानते भी नहीं थे। सलीम ने यह भी स्वीकारा कि वह कई बार मेरठ भी होकर चला गया। फरारी के दौरान आतंकी संगठनों से संबंधों के सवाल पर सलीम चुप्पी साधे रहा। वह इस बारे में खुफिया एजेंसियों के सवालों को वह गर्दन हिलाकर इंकार करता रहा।
मुरादाबाद में मिला भरा-पूरा परिवार
सलीम के परिवार में उसकी पत्नी और सात बेटों के अलावा तीन पुत्रवधू समेत भरा पूरा परिवार है। बड़ा बेटा शारिक (35) मुरादाबाद में ही किराना की दुकान करता है। दूसरा बेटा तारिक (32) मोबाइल शॉप चलाता है। तीसरा बेटा सादिक (30) दिल्ली के एक कॉल सेंटर में नौकरी करता है। चौथा बेटा दानिश (28) अपने पिता के साथ कार चोरी करता है। पांचवां बेटा आजिब क्रिकेट का शौकीन है। छठा बेटा जुबेर भी दिल्ली में नौकरी करता है, जबकि सबसे छोटा बेटा अरबान (14) पढ़ाई कर रहा है।
दो दशक में सिर्फ चार दबिश, कैसे आता हाथ
पीएसी कैंप पर बम फेंकने वाला सलीम पतला फरारी के दौरान आतंकी संगठन से जुड़ गया, मगर पुलिस और खुफिया एजेंसियां हाथ पर हाथ धरे बैठी रहीं। उसकी गिरफ्तारी के लिए कोई खास प्रयास नहीं किया गया। शुरुआती दौर को छोड़ दें तो दो दशक में सिर्फ दो-चार बार ही पुलिस ने सलीम पतला की तलाश में दबिश दी। खुफिया एजेंसियां सिर्फ कागजों पर उसकी खोजबीन दर्शाती रहीं।
यही वजह है कि 21 साल तक सलीम उर्फ पतला पुलिस के शिकंजे से दूर रहा। मुरादाबाद में जाकर बस गया, मगर वहां की पुलिस को भी इसके कारनामों की खबर नहीं लगी। सवाल मेरठ पुलिस और खुफिया एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर उठता है कि उसकी गिरफ्तारी को लेकर गंभीरता क्यों नहीं दिखाई गई। बृहस्पतिवार को एटीएस की टीम ने खतौली में सलीम पतला को गिरफ्तार कर लिया, नहीं तो और जाने कितने समय तक वह फरार रहता। गोला कुआं स्थित उसके मकान के आसपास रहने वालों से जब पूछा गया कि क्या पुलिस सलीम को गिरफ्तार करने के लिए दबिश देती थी, तो उनका कहना था कि शुरुआती दौर में दबिशें पड़ी थीं। उसके बाद तो दो-चार बार ही पुलिसकर्मी आए।
मुश्किल है सलीम से सच उगलवाना:
फरारी के इन दो दशक में सलीम पतला ने अपनी जड़ें कहां तक फैला लीं, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। पुलिस अधिकारियों की मानें, तो सलीम पतला आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन से जुड़ चुका था। आतंकी संगठन के लिए उसने क्या-क्या किया। मेरठ और आसपास के जिलों में सलीम पतला का आवागमन रहा। इस दौरान वह कितने लोगों से मिला और उनसे मिलने का मकसद क्या रहा, ये सच्चाई उससे उगलवाना काफी मुश्किल होगा। वैसे इन तमाम सवालों के जवाब तलाशने के लिए शुक्रवार को मेरठ से भी इंटेलीजेंस की टीम खतौली (मुजफ्फरनगर) गई। इसके अलावा आईबी, इंटेलीजेंस की विशेष शाखा, पुलिस और एटीएस ने भी सलीम पतला से लंबी पूछताछ की।
सलीम इसलिए हुआ ‘पतला’:
दरअसल, पीएसी कैंप पर बम फेंकने वालों में सलीम नाम के दो आरोपी बने। इसी वजह से दोनों की अलग-अलग पहचान के लिए पुलिस ने तरकीब निकाली। एक सलीम पुत्र लतीफ कद-काठी में मोटा था, तो उसे सलीम मोटा नाम दे दिया, जबकि दूसरे सलीम पुत्र अब्दुल रहमान को दुबला-पतला होने पर उसके नाम में उर्फ पतला जोड़ दिया गया।
और भी हैं ऐसे मामले:
जिस तरह से पुलिस ने सलीम पतला को गिरफ्तार करने में शिथिलता बरती, वैसे ही लापरवाही के मामले और भी हैं। मई माह में तीरगरान में सांप्रदायिक हिंसा के दौरान आरोपी बने खालिद उर्फ अंडा तथा सुल्तान को गिरफ्तार करने में पुलिस के हाथ-पांव फूल गए। अंडा तो गिरफ्तार हो गया, मगर सुल्तान अब तक फरार है। इसके अलावा सिवाल खास निवासी शादाब का नाम नकली नोटों के सप्लायर के रूप में सामने आया। छह माह पूर्व सिवाल खास और आसपास के गांवों में पशु खरीदने के लिए कई लोगों ने पशु पालकों को 1.20 लाख रुपये के नकली नोट थमा दिए थे। तभी यह खुलासा हुआ था कि शादाब ने नकली नोट लाकर दिए। शादाब की शामली के कैराना में भी रिश्तेदारी बताई जाती है। पुलिस शादाब को भी भूल गई है।
आतंकियों के कनेक्शन खंगालने में हर बार नाकामी
वेस्ट यूपी आतंकियों के रडार पर है। खासकर मेरठ जोन में आतंकी गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं। आतंकी आते हैं और खरीदारी करके चले जाते हैं, मगर किसी को भनक नहीं लगती। पुलिस और खुफिया एजेंसियां नाकामी और लापरवाह की चादर तानकर ऊंघ रही हैं। आखिर कब पुलिस ऐसे मामलों की गंभीरता समझेगी? कब तक जनता भगवान भरोसे रहेगी? वेस्ट यूपी को शरणस्थली बना चुके आतंकियों ने इसी इलाके में वारदातें शुरू दीं तो पुलिस और खुफिया एजेंसियों के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाएगी।
यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि बिजनौर में रहकर सिलेंडर बम तैयार करने वाले चार आतंकी मेरठ में पीएल शर्मा रोड पर आकर लैपटॉप खरीदकर ले गए। बिजनौर में उपचुनाव के ऐन पहले सिलेंडर से ब्लास्ट हो गया और आतंकी फरार हो गए। इसके बाद ही खुलासा हुआ कि आतंकी मेरठ आए थे, उससे पहले तक पुलिस और खुफिया एजेंसियों को पता तक नहीं चला। इसके अलावा मोहल्ला पूर्वा फैय्याज अली निवासी आसिफ अली के बारे में दिसंबर-2013 में ही खुफिया एजेंसियों को जानकारी प्राप्त हो चुकी थी।
तब कोलकाता में सेना के जेसीओ मदनमोहन पाल (रिटायर्ड) को आईएसआई से संपर्क रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद चार अगस्त 2014 को जेसीओ पीके पोददार को गिरफ्तार गिरफ्तार किया, तब भी यही खुलासा हुआ कि मेरठ निवासी आसिफ ने उनके खातों में रुपये पहुंचाए। दिसंबर से जानकारी होने के बावजूद आसिफ को 17 अगस्त को पूरे आठ महीने बाद गिरफ्तार किया गया।
यही नहीं बोध गया में हुए आतंकी विस्फोट में नेशनल इंवेस्टीगेशन एजेंसी ने खुलासा किया था कि ब्लास्ट में इस्तेमाल हुए छोटे सिलेंडर मेरठ की किसी फैक्ट्री से बने थे। ताज्जुब है कि करीब एक साल बाद भी ये पता नहीं चल सका कि सिलेंडर किस फैक्ट्री से बने थे और खरीदकर ले जाने वाला कौन था।
सलीम आतंकी है...सन्न रह गई एकता कालोनी
क्या, सलीम भाई और आतंकी? हमने तो सपने में भी नहीं सोचा था...। कटघर की एकता विहार कालोनी के बी ब्लाक में सलीम के पड़ोसियों को जैसे ही खबर मिली वे सन्न रह गए। बीस साल से कालोनी के बी-29 मकान में रह रहे 55 साल के सलीम के बारे में किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि वे एक आतंकी के पड़ोसी हैं। वहीं सलीम के परिवार में खामोशी है। उसकी पत्नी और बेटे मुजफ्फरनगर रवाना हो गए हैं।
सलीम अहमद और उसके परिवार को लोग काफी अच्छा मानते हैं। पड़ोसी एडवोकेट ने कहा कि वह दिन रात कालोनी में निकलते बैठते हैं। कभी सलीम या उसके परिवार के सदस्य की ऐसी कोई हरकत नहीं देखी, जिससे यह लगे कि उनका किसी आपराधिक गतिविधि में हाथ होगा। सलीम की पत्नी शहनाज भी सबसे हंसकर बात करती हैं। किसी भी पड़ोसी को सलीम के अतीत के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।
मोहल्ले वालों ने बताया कि उन्होंने जब मकान बनवाया था। उससे पहले से सलीम अहमद का मकान बना हुआ है। पहले एक मंजिला मकान था और दो-तीन साल पहले उसने एक मंजिल और बनवा ली। उसके आठ बेटे हैं, जिसमें से एक बेटा दिल्ली में बीपीओ में काम कर रहा है। घटना के बाद से परिवार वाले चुप्पी साधे हैं। दिल्ली से आया बेटा ही किसी से कुछ बात कर रहा है।
खुफिया विभाग ने आकर की पूछताछ
मुजफ्फरनगर में पकड़े गए आतंकी सलीम की गिरफ्तारी की सूचना पर परिवार में हड़कंप मचा है। इधर, सूचना पाकर खुफिया टीम ने भी एकता विहार में उसके घर पर पहुंचकर पड़ताल की। सलीम के दो बेटों से बात की। तब बेटों ने अपने राशन कार्ड, पहचान पत्र समेत तमाम दस्तावेज दिखाए। बेटों ने बताया कि उनके अब्बू कई सालों से प्रापर्टी डीलिंग का काम कर रहे हैं। रामपुर दोराहे पर सलीम के दो बड़े बेटों तारिक और शारिक की दुकाने हैं। टीम ने दुकान के आसपास रहने वालों से भी पूछताछ की। कुछ पड़ोसियों के भी बयान लिए। इसके बाद दस्तावेज लेकर टीम रवाना हो गई।