खेल में कई बार जीत जितनी यादगार नहीं होती, जीतने के जज्बे के साथ मुकाबला करते हुए मिली हार भी चैंपियन के तमगे से कम नहीं होती। विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में खिताबी मुकाबला हार कर भी दुनिया की नंबर वन खिलाड़ी बनी साइना नेहवाल की उपलब्धि भी कुछ इसी तरह की है। बड़े मुकाबलों में एक शानदार हार भी किसी खिलाड़ी को हीरो बना देती है। ऐसा होते हुए हमने पहले कई बार देखा है।
1960 के रोम ओलंपिक में विश्व रिकॉर्ड तोड़ने के बावजूद मिल्खा सिंह भारत के लिए पदक नहीं जीत पाए थे। उन्हें चौथे स्थान पर संतोष करना पड़ा था लेकिन उस प्रदर्शन के लिए हर हिंदुस्तानी ने उन्हें जो प्यार दिया था वो किसी गोल्ड मेडल से भी बढ़कर था। ठीक इसी तरह 1984 के लॉस एंजलिस ओलंपिक में पीटी ऊषा भी हारकर हीरोइन बनी थी और लोगों ने उन्हें 'उड़न परी' का खिताब दिया था। 400 मीटर की बाधा दौड़ में वो 1/100 सेकेंड से कांस्य पदक से वंचित हुई थीं। जकार्ता में साइना नेहवाल ने 'उड़ती चिड़िया' (शटल) के साथ ऐसा खेल खेला, जो कोई हिंदुस्तानी खिलाड़ी अब तक नहीं दिखा सका था। भले ही उन्हें रजत पदक से संतोष करना पड़ा लेकिन फिर भी भारत के लिए यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। किसी भारतीय खिलाड़ी का विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में अब तक का यह सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है।
भारत की एक बेटी के तौर पर ओलंपिक पदक विजेता साइना नेहवाल की यह उपलब्धि इसलिए भी बड़ी है क्योंकि पिछले 38 सालों के विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप के इतिहास में उन्होंने उस पायदान को छुआ है जहां तक महान प्रकाश पादुकोण भी नहीं पहुंच सके। साइना के रजत पदक से पहले 1983 में मिले प्रकाश पादुकोण के कांस्य पदक को मिलाकर विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में भारत केवल चार कांस्य पदक ही जीत सका था। साइना ने देश के लिए रजत पदक जीतकर, गोल्ड जीतने की उम्मीदें भी अब स्वर्णिम कर दी हैं।
अफसोस इस बात का है कि साइना की इस बड़ी कामयाबी का देश को जैसा जश्न मनाना चाहिए था, वैसा नहीं मनाया गया। क्रिकेट के दीवाने इस देश ने एक बेटी की ऐतिहासिक कामयाबी को शायद इसलिए नजरअंदाज कर दिया कि वो खिताब तक नहीं पहुंच पाई। भारत के अब तक के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के बावजूद कुछ लोग फाइनल मुकाबले में उसकी मानसिक मजबूती पर भी सवाल उठा रहे हैं। क्या इस बेटी के स्वागत के लिए एयरपोर्ट पर देश प्रेमी-खेल प्रेमी हिंदुस्तानियों का हुजूम नहीं उमड़ना चाहिए था। क्या यह बेटी क्रिकेटरों की तरह किसी रथ में सवार होकर जुलूस की हकदार नहीं थी। इस बेटी की कामयाबी महज एक दो मंत्रियों के 140 अक्षरों के शुभकामना संदेशों से कहीं ज्यादा जश्न की हकदार तो जरूर थी। (फोटो: ट्विटर पेज से)