सहारनपुर दंगे की प्रशासनिक जांच रिपोर्ट मंडलायुक्त मेरठ ने शासन को सौंप दी हैं। करीब 90 पेज की रिपोर्ट में प्रशासनिक चूक का खुलासा किया गया है। इस रिपोर्ट के आधार पर शिवपाल कमेटी को जांच रिपोर्ट को विश्वसनीय बनाने के लिए दोनों का मिलान भी कराया जाएगा।
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प्रशासनिक जांच में कमिश्नर की रिपोर्ट ने भाजपा सांसद की ओर भी इशारा है। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि जांच रिपोर्ट के सामने आने के बाद सियासी बवाल मच सकता है। उधर, प्रदेश में हो रहे उपचुनाव के चलते जांच रिपोर्ट के सार्वजनिक होने पर भी अटकलें लगाई जा रही हैं।
गत माह 26 जुलाई को कुतुबशेर थाने के सामने शुरू हुए दंगे की शासन ने प्रशासनिक जांच मेरठ के मंडलायुक्त मेरठ भूपेंद्र सिंह को सौंपी थी। केबिनेट मंत्री शिवपाल यादव के नेतृत्व में गठित मंत्री समूह की रिपोर्ट आने के बाद सियासी तूफान मचा था। इसके बाद से ही मंडलायुक्त की रिपोर्ट पर लोगों की निगाहें टिकी थी।
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चार प्रमुख बिंदुओं पर की गई इस जांच का दायरा भी अफसरों की भूमिका और जलाई हुई संपत्ति के मुआवजा राशि के आंकलन करने के इर्द-गिर्द ही केंद्रित रहा। सूत्रों के अनुसार रिपोर्ट में सबसे बड़ा सवाल प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यशैली पर उठाया गया। तत्कालीन डीएम संध्या तिवारी मौके पर बहुत लेट पहुंची। मौके पर निर्णय लेने में हुई देरी के चलते ही माहौल बिगड़ा और दंगा भड़का। लूटपाट और आगजनी के लिए प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही गिनाई गई है।
पुलिस अधिकारियों को क्लीन चिट
रिपोर्ट में पुलिस अधिकारियों को क्लीन चिट दी गई है। प्रशासनिक जांच में दंगे के दौरान भाजपा सांसद की भूमिका पर इशारा किया गया है। इस बात का जिक्र किया गया है कि अधिकारियों के मना करने के लिए बावजूद सांसद राघव लखनपाल शर्मा शहर में घूमते रहे। वाहन में सवार होकर उन्होंने पूरे शहर का भ्रमण किया। हालांकि सीधे तौर पर सांसद पर टिप्पणी नहीं की गई है।
मंडलायुक्त की इस रिपोर्ट को अब मंत्री समूह की रिपोर्ट से मिलान किया जाएगा। बता दें कि दंगे की जांच के लिए आई शिवपाल यादव की कमेटी ने दंगे के लिए सांसद राघव लखनपाल शर्मा को दोषी करार दिया था। इसके बाद से प्रदेश में सियासी बवंडर मचा हुआ है।
जांच के प्रमुख बिंदु - दंगे में पुलिस और प्रशासनिक अफसरों की भूमिका - दंगे के कारण, नियंत्रण में हुई चूक - दंगा पीड़ितों के नुकसान का आंकलन - भविष्य में दंगा न हो, इसके प्रयास
चुनाव तक सामने नहीं आएगी रिपोर्ट! संभावना जताई जा रही है कि उपचुनाव के कारण शासन इस जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं करेगा। कारण, लोक निर्माण मंत्री की रिपोर्ट के बाद सियासी बवाल मचा था। उधर, भाजपाइयों ने सपा के खिलाफ मोर्चे बंदी शुरू कर दी थी। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि दंगे की रिपोर्ट से भी चुनाव में मतों का ध्रुवीकरण हो सकता है। ऐसे में माना जा रहा है कि चुनाव आयोग के मशविरे के बाद ही यह रिपोर्ट सार्वजनिक होगी। ऐसे माहौल में चुनाव आयोग इस रिपोर्ट को रोकने की हिदायत देगा।
फंसेंगे अफसर और एलआईयू कर्मी
सहारनपुर दंगे की मेरठ के मंडलायुक्त द्वारा की गई जांच रिपोर्ट पर अगर कार्रवाई हुई तो जिले के कई पुलिस व प्रशासनिक अफसरों का नपना तय है। इसके साथ ही स्थानीय अभिसूचना इकाई कर्मियों के खिलाफ भी कार्रवाई तय मानी जा रही है। मंडलायुक्त ने भी अपनी रिपोर्ट में भाजपा सांसद की भूमिका व एक पूर्व पार्षद की भूमिका पर सवाल उठाए हैं।
25 जुलाई 2014 को हुए सहारनपुर दंगे में तीन की मौत हुई, 34 घायल हुए, सैकड़ों दुकान, मकान व वाहन आगजनी की भेंट चढ़े। इस मामले की जांच पूर्व में काबीना मंत्री शिवपाल सिंह की अध्यक्षता में गठित पांच सदस्यीय समिति भी कर चुकी है। इस समिति ने 14 अगस्त को अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को सौंप दी थी। सरकार ने मामले की जांच के लिए मेरठ के मंडलायुक्त भूपेंद्र सिंह की अध्यक्षता में भी एक जांच समिति गठित की थी। मंडलायुक्त ने अपनी जांच हालांकि कुछ दिन पहले ही पूरी कर ली थी, लेकिन इसकी रिपोर्ट उन्होंने सोमवार 25 अगस्त 2014 को ही सौंपी थी।
सूत्र बताते हैं कि मंडलायुक्त की रिपोर्ट में भी कमोबेश वही तथ्य उजागर किए गए हैं जो पूर्व में शिवपाल सिंह समिति ने पाए। लेकिन जिले में तैनात कुछ अधिकारियों के ऊपर तक तार जुड़े होने की वजह से उनके खिलाफ कोई निर्णय नहीं हो सका। सूत्रों के अनुसार दोनों ही जांच रिपोर्ट में एक बात समान है। वह यह कि समय रहते स्थिति पर सही तरीके से काबू नहीं पाया गया। अधिकारी मौके पर देर से पहुंचे और स्थानीय अभिसूचना इस मामले में पूरी तरह फेल रही।
बहरहाल, इस रिपोर्ट को लेकर गृह विभाग के अफसर चुप्पी साधे हुए हैं। गृह सचिव कमल सक्सेना ने मंगलवार को भी कहा कि रिपोर्ट सोमवार देर शाम आ गई थी लेकिन इसका परीक्षण चल रहा है। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट खासी मोटी है। जानकारों के मुताबिक रिपोर्ट 90 पेज से अधिक है। गृह सचिव ने कहा कि वह रिपोर्ट के तथ्यों को लेकर अभी कोई टिप्पणी नहीं कर सकते हैं। रिपोर्ट के परीक्षण के बाद ही वह इस बाबत कुछ बता सकेंगे।
सहारनपुर मामले में मुख्यमंत्री कार्रवाई करें: भाजपा
भाजपा सहारनपुर दंगे पर पहले वरिष्ठ मंत्री शिवपाल सिंह यादव की जांच रिपोर्ट और अब आई कमिश्नर की रिपोर्ट को एक-दूसरे की कार्बन कापी करार दिया है। भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा कि दोनों रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रशासनिक लापरवाही के चलते सहारनपुर में दंगा भड़का। प्रशासनिक स्तर पर हुई इस लापरवाही के उच्च स्तर पर भी तो कोई जिम्मेदार होगा। मुख्यमंत्री को इसका पता लगाना चाहिए।
पाठक ने सवाल उठाया कि जब वरिष्ठ मंत्री की रिपोर्ट आ चुकी है तो कमिश्नर की रिपोर्ट का कोई मतलब नहीं रह जाता। प्रवक्ता पाठक ने कहा कि सहारनपुर की घटना को जातीय संघर्ष बताने वाले मुख्यमंत्री, अब यह तो बताएं कि जब मंत्रियों व कमिश्नर की रिपोर्ट में प्रशासनिक लापरवाही की बात साबित हो चुकी है तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही।
सहारनपुर में वर्ष 2013 में हुए दंगे के बाद एक ही समुदाय के लोगों के शस्त्र लाइसेंस मनमाने तरीके से निरस्त करने के मामले में हाईकोर्ट ने डीएम सहारनपुर पर 35 हजार रुपये का हर्जाना लगाया है। हर्जाना प्रति याचिका पांच हजार रुपये की दर से कुल सात याचिकाओं में लगाया गया है। यह याचिकाएं शस्त्र लाइसेंस निरस्त करने के खिलाफ दाखिल की गई थी। हालांकि हाईकोर्ट द्वारा इस मामले में जवाब तलब करने के बाद सरकार ने निरस्तीकरण का आदेश वापस ले लिया है। इसके मद्देनजर याचिकाएं अर्थहीन होने के आधार पर खारिज कर दी गई हैं। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल कर रहे हैं।
सहारनपुर के राकेश, ब्रह्म सिंह सहित अन्य लोगों ने याचिकाएं दाखिल कर डीएम के आदेश के चुनौती दी थी। कहा कि वर्ष 2013 में हुए दंगे के बाद सरकार ने एक वर्ग विशेष के लोगों के ही शस्त्र लाइसेंस निरस्त किए जबकि याचीगणों के खिलाफ दंगे में शामिल होने या असलहे के दुरुपयोग का कोई साक्ष्य नहीं है। प्रशासन की कार्रवाई एकतरफा और मनमानापूर्ण है। हाईकोर्ट ने इस याचिका पर प्रदेश सरकार से जानकारी मांगी। ऐसे सभी लोगों की पुलिस रिपोर्ट और अन्य ब्यौरा भी देने के लिए कहा था जिसके आधार पर लाइसेंस निरस्त करने का निर्णय लिया गया।
मौजूदा डीएम इंद्रवीर सिंह द्वारा दाखिल जवाब में बताया गया कि देवबंद थाने से एक वर्ष के दौरान 3887 शस्त्र लाइसेंस दिए गए। 72 लोगों केलाइसेंस पुलिस रिपोर्ट के आधार पर निरस्त किए गए थे। 11 अगस्त को इन सभी की व्यक्तिगत सुनवाई के बाद आदेश वापस ले लिया गया। कोर्ट ने कहा कि जब दंगे में दोनों समुदाय शामिल थे तो प्रशासन ने सिर्फ एक के खिलाफ ही कार्रवाई क्यों की। डीएम के इस हलफनामे के बाद याचिकाएं अर्थहीन हो जाने के आधार पर खारिज कर दीं। मगर याचीगणों को बेवजह परेशान करने के कारण प्रति याचिका पांच हजार रुपये का हर्जाना डीएम पर लगाया है।