एक आरटीआई का जवाब 40 हजार पन्नों में, पढ़कर शायद आप चौंक जाएं, लेकिन जल निगम ने अनुश्रवण समिति के सदस्य डीके जोशी को सूचना का अधिकार के तहत इतने पन्नों में जानकारी उपलब्ध कराई है। यह अलग बात है कि इसका जवाब देने में विभाग को दो साल लग गए। वह भी सूचना आयोग की सख्ती के बाद दिया। इस सूचना के आधार पर डीके जोशी बदहाल होती यमुना की लड़ाई लड़ने के लिए हाईकोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं।
डीके जोशी ने 21 नवंबर 2012 को कार्यालय परियोजना प्रबंधक, यमुना प्रदूषण नियंत्रण इकाई, उत्तर प्रदेश जल निगम से शहर में संचालित सीवेज पंपिंग स्टेशन (एसपीएस) और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) से संबंधित जानकारी मांगी थी। इसमें उन्होंने वर्ष 2000 से सूचना उपलब्ध कराए जाने की तिथि तक विभाग द्वारा शहर में बिछाई गई सीवेज लाइन और ट्रंक लाइन, इन पर खर्च होने वाली धनराशि को उपलब्ध कराने वाली संस्था, शहर में स्थापित एसपीएस और एसटीपी की संख्या और इनकी क्षमता, इनकी देखरेख और संचालन में होने वाले खर्च के अलावा एसपीएस और एसटीपी की लॉग बुक (सीवेज का कितना पानी लिफ्ट किया और कितना ट्रीट किया) का ब्योरा मांगा था।
विभाग ने पांच सूचनाओं में से एक का भी जवाब डीके जोशी को उपलब्ध नहीं कराया। इस पर डीके जोशी ने सूचना आयोग की शरण ली। जहां काफी दिनों तक मामला चलता रहा। डीके जोशी की याचिका पर विभाग के अधिकारी तलब किए गए। आयोग ने फटकार लगाई तो विभाग सक्रिय हुआ।
तमाम कवायद के बाद विभाग ने डीके जोशी को एसपीएस और एसटीपी की लॉग बुक का ब्योरा लगभग 40 हजार पन्नों में उपलब्ध कराया। परियोजना प्रबंधक एवं जन सूचना अधिकारी खालिद अहमद ने 16 फरवरी को 194 नगों में यह सूचना उपलब्ध कराई।