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आखिर कौन भेज रहा है मोदी के खिलाफ चिट्ठी?

Thu, 09 Jul 2015 11:06 AM IST
एम संजय/ अमर उजाला, नई दिल्ली
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संघ और केंद्र सरकार के शीर्ष नेतृत्व के बीच एक-दूसरे को साथ देने का बेशक फैसला लिया गया है। मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार से संघ के स्वयंसेवकों का विश्वास भी डगमगाने लगा है।
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पहले यही स्वयंसेवक दलील देते थे कि सरकार को यूपीए के 10 साल के कुशासन की गंदगी साफ करनी है। इसलिए इसे समय मिलना चाहिए। मगर सरकार के कार्यकाल का एक साल पूरा होने के बाद स्वयंसेवकों का सब्र भी जवाब देता दिख रहा है।

इस बात के संकेत सरकार के क्रियाकलाप के खिलाफ संघ मुख्यालय नागपुर में पहुंच रहे पत्रों के मजमून से मिल रहे हैं। इन दिनों मोदी सरकार के कामकाज पर सवाल उठाते हुए स्वयंसेवकों के खत संघ प्रमुख मोहन राव भागवत के नाम धड़ल्ले से पहुंच रहे हैं।
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4 से 5 हजार तक आ चुकें हैं शिकायती पत्र!

बीते दिनों संघ चिंतक गोविंदाचार्य ने भी सार्वजनिक रूप से कहा था कि मोदी सरकार से संघ स्वयंसेवकों का विश्वास कम हुआ है।  सूत्र बताते हैं कि बीते तीन-चार माह से सरकार के कामकाज के खिलाफ पत्रों के आने का सिलसिला शुरू हुआ है।

आलम यह है कि बीते महीने में इन पत्रों की संख्या 4 से 5 हजार हो गई है। बताया जा रहा है कि इन पत्रों में स्वयंसेवकों की शिकायत सरकार के मौलिक मद्दों से भटकाव और सरकार में संगठन को तरजीह न मिलने को लेकर है।

संघ के एक शीर्ष अधिकारी ने सरकार के कामकाज के खिलाफ आने वाले पत्रों की संख्या में बढ़ोतरी की बात स्वीकार करते हुए कहा कि स्वयंसेवक अपने मन की बात सीधे सरसंघ चालक से करते हैं। इसके लिए पत्र भी एक अहम माध्यम है।
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अन्य सरकारों की तरह चल रही है मोदी सरकार

सूत्रों की मानें तो जो पत्र संघ मुख्यालय नागपुर पहुंच रहे हैं वे मुख्य रूप से चार अहम बाते हैं। स्वयंसेवकों की सबसे बड़ी चिंता सरकार के मौलिकता को लेकर है। उनका मानना है कि मोदी सरकार भी अन्य सरकारों की तरह चल रही है।

हर सरकार जब सत्ता में आती है तो कुछ न कुछ करती है। ठीक उसी तरह वर्तमान सरकार भी अपना कामकाज सामान्य रूप से कर रही है। सरकार के कामकाज में मौलिकता का अभाव है। मौलिक चिंतन का समावेश नहीं झलक रहा है।

दूसरी चिंता पार्टी और संघ के लिए त्याग, तपस्या और बलिदान देने वाले कार्यकर्ताओं की उपेक्षा को लेकर है। स्वयंसेवकों की दलील है कि अवसरवादी लोगों को सरकार में तरजीह दी जा रही है।

इनसे मूल्यों के रक्षा की उम्मीद नहीं की जा सकती है। तो कुछ पत्र व्यक्तिगत आकांक्षा वाले भी हैं। नेतृत्व में सामूहिकता के अभाव को भी निशाना बनाया जा रहा है। तो संघ प्रमुख को खत भेजकर राज्य सभा सांसद और बोर्डों में जगह के लिए दावेदारी भी जताई जा रही है।
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