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इंटरनेट से दादा की कब्र तलाश कर अलीगढ़ आए रॉबिन भाईजान

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जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फेसबुक और गूगल के मुख्यालय में डिजिटल इंडिया का डंका बजा रहे थे। गूगल की इंटरनेट मैपिंग में वाराणसी के मनोरम घाट और आगरा का ताजमहल देख रहे थे।
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उसी वक्त न्यूयार्क के रॉबिन को इंटरनेट के जरिए भारत में उनकी खोई हुई दौलत मिल गई। शायद यही डिजीटल इंडिया का मिशन है- सब कुछ एक जगह एक क्लिक पर..।

खैर, दादा-परदादा की यादें रॉबिन को अमेरिका से अलीगढ़ खींच लाईं। मंगलवार को अलीगढ़ पहुंचे रॅबिन को परदादा तो नहीं, लेकिन उनकी कब्र जरूर मिल गई।

पत्नी संग आए रॉबिन परदादा के नाम पर बने कलाटगंज (महावीरगंज बाजार का एक हिस्सा, मुगलकाल से अंग्रेजी हुकूमत तक यहां अनाज की थोक मंडी लगती थी, उस वक्त धनीपुर मंडी नहीं थी) बाजार भी गए।

अमेरिका से 17 लोगों का दल अंजाने में ही सही पितृपक्ष के मौके पर हिंदुस्तान अपने पुरखों की खोज में आया हुआ है।

सर सैय्यद के दोस्त रहे परदादा और दादा

न्यूयॉर्क निवासी रॉबिन किनलोच पत्नी ल्यूरा संग यहां अपने पुरखों की कब्र देखने और उनके लिए प्रार्थना करने आए थे। अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने कहा कि परदादा चॉर्ल्स विलियम किनलोच अंग्रेजी हुकूमत के दौरान यहां स्टेट मैनेजर थे।

उन्हें अलीगढ़ सहित आसपास के जिलों के 19 हजार गांवों से टैक्स वसूलने की जिम्मेदारी मिली हुई थी। सर सैय्यद अहमद उस वक्त न्याय विभाग में थे। दोनों के बीच अच्छी दोस्ती थी।

सर सैय्यद एकेडमी के साजिद नईम की लिखी किताब ‘शना साने सर सैय्यद’ के पेज नंबर 138 में दोनों की दोस्ती का जिक्र  है। यह किताब सर सैय्यद के दोस्तों पर लिखी गई है।

रॉबिन तस्वीर महल स्थित ईसाइयों के कब्रिस्तान गए। वहां दादा वाल्टर अगेस्ट किलोच की कब्र तो मिल गई, पर बहुत ढूंढने के बाद भी परदादा और सर सैय्यद के दोस्त रहे चॉर्ल्स विलियम किनलोच की कब्र नहीं मिली।

कब्रिस्तान में प्रार्थना करने के बाद रॉबिन और उनकी पत्नी ल्यूरा की आंखों में खुशी और श्रृद्धा का भाव था। रॉबिन ने एएमयू परिसर, किला और कलाटगंज सहित साबित खां का मकबरा भी देखा।

महीनों से इंटरनेट पर चल रही रॉबिन की खोज जमीन पर हकीकत में ऐसे ही नहीं उतरी। इसके पीछे गाइड शम्शुउद्दीन की दो दिन की मेहनत भी है। रॉबिन के लिए टूरिस्ट कंपनी को ऐसे गाइड की जरूरत थी जो अलीगढ़ के बारे में जानता हो।

शम्शुउद्दीन एएमयू से पढ़े हुए हैं। उनका अलीगढ़ से  बचपन का नाता है। उन्होंने बताया कि दो दिन पहले यहां आकर उन्होंने रॉबिन के दादा और परदादा के बारे में जानकारी ली थी।

पुरखों की कब्र खोजने मेरठ पहुंचे अंग्रेज

यूपी के मेरठ में आठ साल बाद फिर अंग्रेजों का दल अपने पुरखों की कब्र खोजने क्रांति के उद्गम स्थल पर पहुंचा। लेकिन इस बार वह भूल नहीं की, जिसके चलते उन्हें भारी विरोध के चलते लौटना पड़ा था।

इसी दल ने उस समय लेखानगर कब्रिस्तान में विवादित शिलापट लगाने की कोशिश की थी। हालांकि इस बार दल ने पांच पुरखों की कब्र पहचानने का दावा किया है।

फैमिली इन ब्रिटिश इंडिया सोसायटी (एफआईबीआईएस) के तत्वावधान में यह 15 सदस्यीय दल मंगलवार को दिल्ली से मेरठ पहुंचा। इस टीम का नेतृत्व इंग्लैंड निवासी एलेनी कर रही थीं।

उन्होंने बताया कि करीब नौ महीने की मशक्कत के बाद इस 15 सदस्यीय टीम का चयन हो पाया। इन सदस्यों के पुरखों की कब्र कहां हैं, आज तक इसकी कोई पहचान नहीं हो पाई। न ही यह पता लग पाया कि इन पुरखों की मृत्यु कब और कैसे हुई।

टीम ने मंगलवार को शहर में आरसी चर्च, सेंट जोंस चर्च और लेखानगर स्थित कब्रिस्तान में पूछताछ करते हुए अपने पुरखों की कब्रों की पहचान करने का प्रयास किया। एलेनी ने बताया कि वह अपनी पूर्वजों की छठी पीढ़ी से है।

वे यहां अपने पूर्वजों में ‘लिंच’ जोकि इंग्लैंड की फौज में कार्यरत थे और उनके पुत्र जेम्स ग्रीवर की कब्रों को खोजने आई हैं। इस सोसायटी से जुड़े सदस्य अनुराग ने बताया कि कुछ सदस्यों के पुरखों की कब्र पहचानी गयी है वहीं, एलेनी ने कहा कि पांच पूर्वजों की कब्र की पहचान हुई है।

उनका कहना है कि वे भारत में 28 दिन के टूर पर हैं। मेरठ के अलावा अमृतसर, आगरा, धर्मशाला भी जाएंगे। शहर में भ्रमण के दौरान उन्होंने आबूलेन, सदर और लालकुर्ती आदि स्थानों की फोटोग्राफी भी की।

इन पुरखों की कब्रों की खोज होनी थी

सोसायटी के एक अन्य सदस्य वेलमे वाई ने बताया कि उन्होंने अपने पूर्वज होल्ड-वे और नोरमन की खोज का प्रयास किया वहीं, पेनी एस ने बताया कि उन्होंने अपने पूर्वज जॉन जोजफ होल्ड-वे की कब्र खोजी। वहीं, एलसी लिंडा ने फेलेक्स फ्रेंक ऐंबुरे और थामस इजरा ऐंबुरे की कब्र खोजी। जी नोएल ने भी अपने पुरखों की कब्र खोजी।

टीम लीडर एलेनी ने बताया कि ब्राउन एलीएनार, मॉरिस जेम्स, शिआ जीवीमाह, ब्लैंक थॉमस और ग्रीन वुड जॉजफ की कब्रों की पहचान हुई है। ये किसके पुरखे हैं, इस बारे में उन्होंने बताने से इंकार कर दिया।
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क्रांतिधरा का इतिहास जाना

होटल क्रिस्टल पैलेस में डॉ. अमित पाठक ने पंद्रह सदस्यीय दल को प्रोजेक्टर के जरिये क्रांतिधरा के इतिहास से अवगत कराया। अमित पाठक ने शहर के 200 वर्ष पुराने इतिहास में 1857 की क्रांति के कारण, आवश्यकताओं के साथ परिणाम के विषय में बताया।

किस प्रकार भारतीय मूल के सैनिकों चर्बी युक्त कारतूसों का विरोध किया। सदर, लालकुर्ती के साथ आबू के मकबरा, बेगम समरू महल के चित्र भी दिखाए। अंग्रेजी शासन काल में छावनी की प्रमुख इमारतों की तस्वीर और आज भारतीयों ने उन्हें किस तरह संजोए रखा है, यह भी दिखाया गया।

इस दल के कुछ सदस्य वर्ष 2007 में भी मेरठ में आए थे। यहां छावनी स्थित चर्च में एक विवादित शिलापट लगाने के प्रयास को लेकर विवाद हो गया था। शिलापट पर क्रांति को लेकर विवादित शब्दों का प्रयोग किया गया था। इसको लेकर जन प्रतिनिधियों ने कड़ा विरोध दर्ज कराया था।

हंगामे के चलते इस सदस्यों को शिलापट लेकर वापस विदेशी दूतावास लौटना पड़ा था। इस संबंध में जब एलेनी से पूछा गया तो उनका कहना था कि उनके साथ कुछ अन्य सदस्य वर्ष 2007 में भी मेरठ आए थे। हालांकि शिलापट को लेकर जो हुआ, उसके बारे में कुछ भी कहने से एलेनी ने इंकार कर दिया।
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