बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा की हाईटेक रणनीति पर महागठबंधन का जातीय-सामाजिक समीकरण भारी पड़ गया है। जंगलराज का भय दिखा कर धार्मिक ध्रुवीकरण के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश में जुटी भाजपा राजद-जदयू के जातीय गणित और सामाजिक समीकरण में उलझ कर रह गई।
अब तक आक्रामक चुनाव प्रचार के सहारे जीत हासिल करने वाली भाजपा को संघ प्रमुख मोहन भागवत की आरक्षण की समीक्षा की मांग ने पूरे चुनाव के दौरान हमला करने के बदले सफाई पेश करते रहने पर मजबूर कर दिया। रही सही कसर पप्पू यादव की जनाधिकार पार्टी और एआईएमआईएम जैसी पार्टियों के फीके प्रदर्शन ने पूरी कर दी।
पार्टी की चुनाव प्रचार की यात्रा विकास से शुरू होते हुए वाया जंगलराज गाय पर जा कर रुकी। इससे पार्टी के समर्थक मतदाताओं में भी संदेश गया कि जमीनी स्तर पर मुकाबले में भाजपा महागठबंधन के सामने टिक नहीं पा रही है।
इसके अलावा दिल्ली विधानसभा चुनाव की तर्ज पर सूबे में चुनाव प्रबंधन का जिम्मा राज्य के बाहरी नेताओं पर डालना भी भाजपा के लिए महंगा सौदा साबित हुआ। सूबे के बाहरी नेता स्थानीय कार्यकर्ताओं से तालमेल बिठाने में नाकामयाब रहे।
लालू पर हमला करना महंगा पड़ गया
चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा नेता भले ही दबे सुर में इसके लिए संघ प्रमुख की आरक्षण की समीक्षा की मांग को एक अहम कारण मान रहे हैं। मगर हकीकत यह है कि पार्टी नेतृत्व को स्थानीय नेताओं पर भरोसा न करने और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद पर जरूरत से ज्यादा हमला करना महंगा पड़ गया।
लालू पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अध्यक्ष अमित शाह और स्थानीय नेतृत्व के एकजुट हमले के बाद नाराज यादव मतदाता न केवल राजग के पक्ष में गोलबंद हुए, बल्कि जदयू के पक्ष में भी जमकर वोट किया।
धार्मिक ध्रुवीकरण की आक्रामक कोशिश से अल्पसंख्यक मतदाता तो आरक्षण खत्म होने के भय से पिछड़ा वर्ग के मतदाता भी महागठबंधन के पक्ष में गोलबंद हो गए। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सीमांचल में असदुद्दीन ओवैसी तो कोसी में पप्पू यादव की पार्टी को मुंह की खानी पड़ी।
भाजपा तिरहुत क्षेत्र जैसे अपने गढ़ में भी महागठबंधन पर बढ़त हासिल नहीं कर पाई। भाजपा को मिथिला क्षेत्र की 42 सीटों में से महज 7, तिरहुत की 51 सीटों में से महज 26, सीमांचल की 23 में से 5, मगध की 50 में से 10, भोजपुर की 54 में से 14 और अंग क्षेत्र की 23 में से महज 5 सीटें ही हासिल हो पाई।
क्यों हारा राजग
महंगाई : हाल के दिनों में प्याज और दाल की कीमतों में हुई बेतहाशा वृद्धि भी राजग के खिलाफ रही। आम जनता महंगाई से त्रस्त थी और इसके लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार मान रही थी।
कमजोर क्षेत्रीय पार्टियां : हम, लोजपा और रालोसपा दलित, पिछड़े और अति पिछड़े मतदाताओं को आकर्षित करने में विफल रहे, इनका कोई मजबूत जनाधार नहीं था।
घटक दलों में चुनाव से पहले गतिरोध : राजग के घटक दलों में चुनाव से पहले सीटों को लेकर खींचतान देखी गई और ये एक-दूसरे के प्रति बयान भी देते नजर आए।
कमजोर चुनावी मुद्दे : विकास से शुरू हुआ राजग का चुनाव प्रचार गोमांस, तांत्रिक और अल्पसंख्यकों के आरक्षण पर जाकर अटका जिसका कोई असर महागठबंधन पर नहीं हुआ।
बड़बोले नेता : शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आजाद, आरके सिंह जैसे भाजपा नेता अपनी ही पार्टी के खिलाफ बयानबाजी कर रहे थे। इससे राजग को नुकसान हुआ।
नहीं दिखा विकास : विकास की बात कहने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह साबित नहीं कर पाए कि केंद्र में आने बाद उन्होंने विकास के कौन-कौन से काम किए, जबकि जनता नीतीश के विकास की गवाह थी।