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कहानी उनकी जिनके हाथ काट दिए गए

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पिछले दिसम्बर में ओडिशा के एक छोटे से गांव के दियालु सहित क़रीब 12 लोगों को पास के एक ईंट भट्टे पर काम का लालच दिया गया।
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दियालु के अनुसार उन्हें उनके पड़ोसी बिमल ने फुसलाया था जो ईंट-भट्टों पर मज़दूरी दिलाने वाला एजेंट बनने की कोशिश कर रहा था। मगर पास के ईंट-भट्टे की जगह उन्हें 800 किलोमीटर दूर हैदराबाद के ईंट-भट्टे के लिए ट्रेन में बैठा दिया गया।

जब उन्हें लगा कि वे फंसने वाले हैं, तो वे भाग निकले। लेकिन दियालु और उसका एक दोस्त पकड़े गए और उन्हें ठेकेदार रायपुर ले आया।

ठेकेदार ने उनसे पूछा कि सज़ा के तौर पर अपना एक हाथ कटवाएंगे या पैर या फिर जान देंगे। दोनों ने अपना दांया हाथ कटवाने का फ़ैसला किया। पहले दियालु के दोस्त का हाथ काटा गया, दियालु की आंखों के सामने।
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लगा मैं मर जाऊंगा

वह बताते हैं, ''हाथ को एक पत्थर पर रखा गया। एक ने गर्दन पकड़ी और दो ने हाथ। चौथे ने कुल्हाड़ी चलाई। हाथ यूं उड़ा जैसे मुर्गे की गर्दन।''

इसके बाद उनकी बारी आई। वह बताते हैं, ''इतना दर्द हुआ था कि मुझे लगा मैं मर जाऊंगा।'' बहते खून और दर्द के बीच वे पास के एक गांव पहुंचे और कटे हाथ पर प्लास्टिक बैग बांधकर पास के कस्बे में इलाज के लिए गए।

दियालु को ठेकेदार को सौंपने वाले बिमल को पुलिस ने पकड़ लिया, लेकिन उन्हें ज़मानत मिल गई। बिमल अब दियालु से 'माफ़ी मांगकर' पड़ोसियों की तरह रहना चाहते हैं।

(बिमल को गिरफ़्तार करने के बाद ज़मानत पर रिहा कर दिया गया) मगर दियालु कहते हैं, ''मैं ताज़िंदगी उसे माफ़ नहीं कर सकता।''

और कितने दियालु?

बंधुआ मज़दूरों की मदद के लिए काम करने वाली संस्था इंटरनेशनल जस्टिस मिशन (आईजेएम) के पुनर्वास कार्यक्रम में दियालु हिस्सा ले रहे हैं। इसमें बंधुआ मज़दूरी से छुड़वाए गए 150 बच्चे और महिलाएं हैं। इनमें दो महिलाएं ऐसी हैं, जिनके पेट पर लात मारकर उनका गर्भ गिरा दिया गया था। एक महिला के पति को ट्रेन के नीचे फेंककर मार दिया गया था।

आईजेएम में सलाहकार रोजेन राजन कहते हैं, ''भारत सरकार बंधुआ मज़दूरों को छुड़ाने और कसूरवारों को सज़ा देने में नाकाम है।'' ये अप्रत्यक्ष रूप से भारत के ग्लोबल ब्रांड्स और यहां मल्टीनेशनल कंपनियों के मुनाफ़े की महत्वपूर्ण वजह हैं और भारत को आर्थिक महाशक्ति बनाने में योगदान कर रहे हैं।

दि कंफ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन इंडस्ट्रीज़ (सीआईआई) कंपनियों को क़ानून का पालन करने को कहता है, जिसके अनुसार 1976 से बंधुआ मज़दूरी पर प्रतिबंध है।

'एक भी बंधुआ मज़दूर नहीं है'

सामाजिक कार्यकर्ताओं और शोधकर्ताओं के अनुसार भारत में करीब एक करोड़ बंधुआ मजदूर हैं। मगर कई सरकारी अधिकारी इन्हें ग़लत बताते हैं।

आंध्र प्रदेश के श्रम आयुक्त डॉक्टर ए अशोक ने दिसंबर में मेरे सामने दावा किया था कि उनके इलाक़े में एक भी बंधुआ मज़दूर नहीं है। लेकिन दियालु को उनके कार्यक्षेत्र में ही ले जाया जा रहा था।

डॉक्टर अशोक हैदराबाद के बाहर रंगारेड्डी के ईंट भट्टों का उदाहरण देते हैं। मगर आईजेएम के शिविर में दियालु के साथ मौजूद बहुत से लोग उन्हीं भट्टों से आए हैं और उनके पास सरकारी मुहर वाला सर्टिफ़िकेट है जिसमें लिखा है कि उन्हें बंधुआ मज़दूरी से मुक्त करवाया गया है।
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मानवाधिकार हनन की समस्या बहुत गहरी

एमनेस्टी इंटरनेशनल ब्रिटेन के आर्थिक संबंध कार्यक्रम के निदेशक पीटर फ़्रेंकेन्टेल कहते हैं, "भारत में व्यापार से जुड़ी मानवाधिकार हनन की समस्या बहुत गहरी है और कंपनियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई में क़ानून का पालने करवाने वाली संस्थाएं भी रुचि नहीं लेतीं।"
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