भले ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने दस साल के कार्यकाल में न जाने कितने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय भव्य रात्रि भोज में शिरकत की हो, लेकिन बुधवार को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की ओर से उनके सम्मान में दिया गया विदाई भोज उनको शायद ही कभी भूलेगा।
हालांकि मनमोहन के विदाई भोज से राहुल गांधी नदारद रहे। मगर सोनिया ने इसे यादगार बनाने की पूरी कोशिश की।
सोनिया ने जहां पूरी पार्टी के साथ एकजुट होकर प्रधानमंत्री के दस साल के कार्यकाल को न सिर्फ शब्दों से सुनहरा बनाया, बल्कि पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने भी उनके सम्मान में कोई कमी नहीं छोड़ी।
मनमोहन सिंह हुए भावुक
सोनिया ने प्रधानमंत्री को शाल ओढ़ाकर उनका सम्मान किया तो साथ ही प्रधानमंत्री की सेवाओं के लिए बाकायदा उन्हें पार्टी की ओर से स्मृति चिन्ह भी दिया। इस स्मृति चिन्ह में दस साल में उनके कार्यकाल में प्रधानमंत्री की सेवाओं की तारीफ की गई है।
सभी केंद्रीय मंत्रियों और पार्टी कार्यसमिति के सदस्यों के स्मृति चिन्ह पर हस्ताक्षर हैं। साथ ही सोनिया इस मौके पर पीएम की पत्नी गुरशरण कौर का सम्मान करना भी नहीं भूलीं। उन्हें साढ़ियां भेंट कर उनका सम्मान किया। चौतरफा शुभकामनाओं के बीच प्रधानमंत्री भी ये माहौल देख भावुक हो गए।
सोनिया ने मनमोहन की जमकर प्रशंसा
उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष के स्नेह और हर मुश्किल की घड़ी में उनको मार्गदर्शन देने के लिए उनका आभार जताया।
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ जनता के बीच नकारात्मक माहौल को लेकर पार्टी के भीतर से भले ही उनके खिलाफ सीधे और परोक्ष रूप से सवाल खड़े हो रहे हों, मगर सोनिया ने मनमोहन की जमकर प्रशंसा की।
प्रधानमंत्री ने सभी केंद्रीय मंत्रियों और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को 17 मई को साढ़े पांच बजे विदाई चाय पार्टी पर बुलाया है।
वहीं राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी प्रधानमंत्री और उनकी कैबिनेट को 17 मई को विदाई भोज देंगे। जबकि लोकसभा चुनाव के नतीजों वाले दिन यानी 16 मई को ही प्रधानमंत्री राष्ट्र के नाम अपने संबोधन के जरिए अपना विदाई भाषण देंगे।
एग्जिट पोल पर नेताओं ने जताया ऐतराज
उधर बुधवार को रात्रि भोज के दौरान चुनावी एग्जिट पोल में कांग्रेस का सफाया दिखाने पर कई बड़े नेताओं ने ऐतराज जताया। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया खाने की टेबल पर सर्वेक्षणों को लेकर जमकर बरसे।
उन्होंने दावा किया कि वह ढाई लाख वोटों से जीतेंगे, जबकि सर्वेक्षण में उन्हें हारते हुए दिखा दिया है। ऐसे ही कई बड़े नेताओं ने चुनावी सर्वेक्षणों के नतीजों को खारिज किया। इसके अलावा टिकट नहीं पाने वाले कई नेता पार्टी की हालत देख कर संतोष जता रहे थे कि अच्छा हुआ कि वे चुनाव नहीं लड़े।