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कश्मीर हो या पेशावर, भारत ही निशाने पर

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पाकिस्तानी मीडिया में संयुक्त राष्ट्र महासभा के बहाने कश्मीर को लेकर भारत पर निशाना साधा गया है, वहीं अफगानिस्तान में भी उसकी ‘सरगर्मियों’ पर सवाल उठाए गए हैं।
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रोजनामा ‘वक्त’ लिखता है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ साफ कर चुके हैं कि पाक-भारत संबंधों के सिलसिले में कश्मीर एक बुनियादी मुद्दा है और इसे संयुक्त राष्ट्र में उठाया जाएगा।

अखबार लिखता है कि कश्मीर को लेकर दोनों देशों के बीच तीन लड़ाइयां हो चुकी हैं, इसलिए पाकिस्तान चाहता है कि भारत कश्मीर समेत हर मुद्दे पर बात करे, क्योंकि समस्याएं बातचीत से ही सुलझ सकती हैं, जंगों से नहीं।
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अखबार ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कहा है कि वो भारत की आक्रामता पर ध्यान दे और कश्मीर मुद्दे के हल के लिए ‘अपनी किस्मत का फैसला खुद करने के कश्मीरियों के हक’ पर अमल कराए।

कश्मीर में रायशुमारी

दैनिक ‘जंग’ लिखता है कि संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के मुताबिक़ कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद वाला इलाका है जहां जनता को रायशुमारी के जरिए भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का फ़ैसला करना है।

अख़बार लिखता है कि हर साल पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस 14 अगस्त को घाटी में पाकिस्तानी झंडे लहराए जाने और भारत के स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त को काला दिवस के रूप में मनाए जाने से इस रायशुमारी का नतीजा साफ हो जाता है। इसलिए भारत ने इस रायशुमारी से बचने के लिए कश्मीर को अपना अटूट अंग बताया है।

उधर ‘एक्सप्रेस’ लिखता है कि नवाज शरीफ के कार्यकाल का ये उनका तीसरा भाषण होगा जब वो ये बताने की कोशिश करेंगे कि क्षेत्र में शांति के लिए कश्मीर विवाद हल करना कितना जरूरी है।

‘भारत ने मदद से भरमाया’

उधर रोजनामा ‘पाकिस्तान’ ने पाकिस्तानी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अज़ीज़ के इस बयान को प्रमुखता दी है कि पेशावर में सैन्य एयर बेस पर हुए हमले के सिलसिले में सबूत जमा करके अफगानिस्तान को सौंपे जाएंगे।

अख़बार लिखता है कि ये ज‌िम्मेदारी अफगानिस्तान की है कि वो पता लगाए कि उसकी सरजमीन में कहां-कहां पाकिस्तान विरोधी दहशतगर्द छिपे हैं।

अखबार की टिप्पणी है कि ऐसा महसूस होता है कि भारत ने अफगानिस्तान को अपनी मदद में भरमा रखा है और इसलिए वहां उसकी सरगर्मियों पर अफगानिस्तान का कोई कंट्रोल नहीं है।

उधर दैनिक ‘दुनिया’ का संपादकीय है - नाराज बलोच नेताओं से बातचीत में अहम प्रगति। अखबार लिखता है कि नाराज बलोच नेताओं को राष्ट्रीय मुख्यधारा में लाने की सरकार की कोशिशों के सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं।

इस सिलसिले में अखबार ने दर्जनों बलोच लड़ाकों के हथियार छोड़ हिंसा से तौबा करने का ज‌िक्र किया और लिखता है कि स्वनिर्वासन में रहने वाले बचोल नेता भी समझ रहे हैं कि अब हिंसक मुहिम के लिए हालात ठीक नहीं हैं।
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नेपाल के हालात

रुख भारत के उर्दू अखबारों का करें तो ‘सहाफत’ अखबार ने नेपाल में नया संविधान लागू होने और उसके बाद भारत-नेपाल रिश्तों में आई तल्खी को अपने संपादकीय का विषय बनाया है।

अखबार कहता है कि काठमांडू में भारतीय दूतवास को पिछले दिनों इस बात का खंडन करना पड़ा कि गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने मधेसी लोगों की हिंदुस्तानी होने की हैसियत से रक्षा करने की बात कही है।

अखबार कहता है कि इस खंडन से इतना तो साफ है कि अन्य नेपालियों के मुकाबले भारत को मधेसी लोगों की ज्यादा चिंता है, लेकिन नेपाल साफ़ कर चुका है कि देश में नया संविधान लागू करना उसका अंदरूनी मामला और इसमें कोई बाहरी दखल नहीं होना चाहिए।

वहीं ‘जदीद खबर’ लिखता है कि नेपाल में शांतिपूर्ण हालात भारत के लिए अहम हैं क्योंकि नेपाल ऐसा सरहदी देश हैं जहां अशांति के आसार ज्यादा हैं। अखबार के मुताबिक़ नेपाल के कुछ गुटों के संबंध पड़ोसी चीन से होना भारत के लिए पहले ही चिंता का विषय है।

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