मुंशी प्रेमचंद की मृत्यु 56 की उम्र में हुई। उनकी मृत्यु के कुछ समय पूर्व ही प्रगतिशील लेखक संघ की नींव पड़ी थी। यह विडंबना ही है कि जब यूरोप में मानवीय मूल्य, हालात और संघर्ष साहित्य के केंद्र में आ चुके थे, हिंदी में प्रेमचंद जैसे साहित्यकार इन विषयों को स्थान दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। हालांकि प्रेमचंद ने साहित्य लेखन की एक ऐसी परंपरा का विकास किया, जिसने हिंदी साहित्य की कई पीढ़ियों का मार्गदर्शन किया।
प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, 1880 को बनारस के नजदीक लमही गांव में हुआ। उनका वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। हिंदी में उन्होंने मुंशी प्रेमचंद और उर्दू में नवाब राय के नाम से लिखा। उन्नसवीं सदी के मध्य में एक भाषा के रूप में घुटने के बल चल रही आधुनिक हिंदी का जो साहित्य प्रेमचंद को विरासत में मिला, वह दरअसल राजा-रजवाडों, देवी-देवताओं, भूत-प्रेतों और अयथार्थ का साहित्य था। प्रेमचंद साहित्य को यथार्थ के करीब लाए। वे एक संवेदनशील लेखक थे, मानव प्रेम, संघर्ष, सामाजिक-राजनीतिक वंचना और जीवन सौंदर्य उनके लेखन का केंद्र बने।
आरंभिक दौर में प्रेमचंद उर्दू में लिखते थे। लेकिन 1910 में उनकी रचना 'सोजे-वतन' को अंग्रेज सरकार ने राष्ट्र विरोधी माना और प्रतिबंधित कर दिया। अंग्रेज सरकार ने उनके लिखने पर भी रोक लगा दिया। इस समय तक प्रेमचंद 'नवाब राय' नाम से लिखते थे। उर्दू में प्रकाशित होने वाली जमाना पत्रिका के संपादक मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें 'प्रेमचंद' नाम से लिखने की सलाह दी। इसके बाद से वह प्रेमचंद के नाम से लिखने लगे। उन्होंने आरंभिक लेखन जमाना पत्रिका में ही किया।
प्रेमचंद की पहली हिंदी कहानी सरस्वती पत्रिका के दिसंबर अंक में 1915 में 'सौत' नाम से प्रकाशित हुई और अंतिम कहानी 1936 में कफन नाम से। स्त्री और दलित जैसे हिंदी साहित्य के आधुनिक विमर्शों की जड़ें कहीं न कहीं प्रेमचंद के साहित्य में ही पहली बार दिखती हैं। सहित्य को लेकर उनका नजरिया भी अपने कई समकालीनों से अलहदा था। प्रेमचंद का मानना था कि साहित्यकार देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।
प्रेमचंद ने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में भी सक्रिय भागीदारी निभाई। 1919 में उन्होंने महात्मा गांधी के आह्वान पर अपनी नौकरी छोड़ दी। कुछ महीने उन्होंने मर्यादा पत्रिका का संपादन किया। छह साल तक माधुरी नामक पत्रिका का संपादन किया, 1930 में बनारस से अपना मासिक पत्र हंस शुरू किया और 1932 के आरंभ में जागरण नामक एक साप्ताहिक और निकाला। उन्होंने लखनऊ में 1936 में अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन की अध्यक्षता की। उन्होंने मोहन दयाराम भवनानी की अजंता सिनेटोन कंपनी में कहानी-लेखक की नौकरी भी की। 1934 में प्रदर्शित मजदूर नामक फिल्म की कहानी लिखी और कंट्रेक्ट की साल भर की अवधि पूरी किए बिना ही दो महीने का वेतन छोड़कर बनारस लौट गए।
प्रेमचंद ने हिंदी में करीब तीन सौ कहानियां, लगभग एक दर्जन उपन्यास और कई लेख लिखे। उन्होंने कुछ नाटक भी लिखे और कुछ अनुवाद कार्य भी किया। प्रेमचंद के उपन्यास न केवल हिंदी उपन्यास साहित्य में बल्कि संपूर्ण भारतीय साहित्य में मील के पत्थर हैं। वह उर्दू का संस्कार लेकर हिंदी में आए थे और हिंदी के महान लेखक बने। हिंदी को अपना खास मुहावरा और खुलापन दिया। कहानी और उपन्यास दोंनो में युगांतरकारी परिवर्तन किए।
कहना गलत न होगा कि प्रेमचंद आम भारतीय के रचनाकार थे। उनकी रचनाओं में वे नायक हुए, जिसे भारतीय समाज अछूत और घृणित समझा था। उन्होंने सरल, सहज और आम बोल-चाल की भाषा का उपयोग किया और अपने प्रगतिशील विचारों को दृढ़ता से तर्क देते हुए समाज के सामने प्रस्तुत किया। जीवन के अंतिम दिनों में वे गंभीर रुप से बीमार पड़े। लंबी बीमारी के बाद 8 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हो गया।