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बर्खास्तगी पर प्रणब ने क्यों लगाई मुहर?

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मिजोरम के राज्यपाल कमला बेनीवाल को हटाने के मामले पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने बुधवार को मुहर लगाई, लेकिन इसकी इबारत 2012 से ही लिखी जा रही थी।
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दरअसल, तीन मई 2012 को राष्ट्रपति भवन ने भाजपा नेता नितिन गडकरी और सांसद किरीट सोमैया के आरोपों का जवाब केंद्रीय गृह मंत्रालय से मांगा था। इन सांसदों का आरोप था कि बेनीवाल ने गुजरात की राज्यपाल रहते हुए राजस्थान के सामूहिक कृषि को-ऑपरेटिव सोसायटी की जमीन की खरीद फरोख्त में हिस्सेदारी की थी और उसका फायदा भी उठाया था। 

राष्ट्रपति प्रणब सरकार ने ताजा फैसले से पहले सरकार से पूरी जानकारी ली।

यूपीए ने नहीं ‌दिया संतोषजनक जवाब

इस कवायद में राष्ट्रपति भवन कार्यालय ने अटॉर्नी जनरल मुकल रोहतगी और कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद से पिछले 15 दिनों में कम से कम पांच बार जवाब तबल किया। मुखर्जी ने बेनीवाल की बर्खास्तगी के फैसले से पहले यूपीए सरकार और एनडीए सरकार के साथ लंबी जांच पड़ताल की।

यूपीए के कार्यकाल में गृह मंत्रालय की ओर से राष्ट्रपति भवन को इस बाबत कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।

बेनीवाल का मोदी से छत्तीस का आंकड़ा

मोदी सरकार के गठन के बाद जब यूपीए सरकार के दौरान नियुक्त राज्यपालों को हटाए जाने की कवायद शुरू हुई तो बेनीवाल का नाम सबसे ऊपर था। माना जा रहा है कि इसका वजह बेनीवाल का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ छत्तीस का आंकड़ा रहा।

उस दौरान मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। सूत्रों के मुताबिक बेनीवाल पर राज्यपाल पद के दुरुपयोग के कई आरोप हैं। लेकिन राजस्थान को-ऑपरेटिव सोसायटी का मामला सबसे गंभीर है। इसके अलावा जुलाई में गुजरात के मुख्य सचिव ने केंद्र को बेनीवाल के खिलाफ शिकायतों की लंबी फेहरिस्त भेजी थी। 

लोकायुक्त के मुद्दे पर सीधा टकराव हुआ

नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उनका कमला बेनीवाल से लोकायुक्त के मुद्दे पर सीधा टकराव हुआ था। बेनीवाल ने बिना प्रदेश सरकार से सलाह लिए जस्टिस आरए मेहता को गुजरात का लोकायुक्त नियुक्त कर दिया था। तब भाजपा ने इसे असंवैधानिक करार दिया था।

तत्कालीन प्रदेश की मोदी सरकार ने राज्यपाल के फैसले को कोर्ट में चुनौती दी थी। हालांकि कोर्ट ने भी जस्टिस आरए मेहता की नियुक्ति को सही कहा था।
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मोदी सरकार ने बेनीवाल का ‌किया ट्रांसफर

लेकिन बाद में जस्टिस मेहता ने लोकायुक्त बनने के इनकार कर दिया था। केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद से ही यूपीए शासन के दौरान नियुक्त किए गए अधिकतर राज्यपालों को पद छोड़ने के लिए कह दिया गया था।

इन राज्यपालों में गुजरात की राज्यपाल कमला बेनीवाल भी थीं। कमला बेनीवाल ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया था। इसके बाद उन्हें गुजरात से मिजोरम ट्रांसफर कर दिया गया। एक महीने के अंदर ही बेनीवाल को मिजोरम से भी बर्खास्त कर दिया गया।
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